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Thursday, June 25, 2009

रिश्तों से अब डर लगता है

रिश्तों से अब डर लगता है।
टूटे पुल-सा घर लगता है।

चहरों पे शातिर मुस्कानें
हाथों में ख़ंजर लगता है।

संग हवा के उड़ने वाला
मेरा टूटा पर लगता है।

हथियारों की इस नगरी में
जिस्म लहू से तर लगता है।

जीवन के झोंकों पर तेरा
साथ हमें पल भर लगता है।

सारा जग सिमटा घर में तो
घर जग के बाहर लगता है।

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4 comments:

M VERMA said...

wah kya anubhuti hai ---
bahut sunder

Anonymous said...

nice

Anonymous said...

Kya socte he 1

Anonymous said...

इस बड़े जहाँ में किस शहर जाएँ कि कोई अपना मिल जाए,
नींद तो रोज़ आती है, वो कौन सी रात सोयें कि कोई सपना दिख जाए।

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