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Tuesday, December 31, 2019

पतियों के लिए सुखी जीवन के मंत्र

पतियों के लिए सुखी जीवन के मंत्र
1)
पत्नी बहुत बोलती हो तो? पढ़ने की आदत डालें।
2)
पत्नी यदि सुबह की चाय नियमित नहीं बनाती हो तो? चाय बनाना सीख लें।
3)
रोज रोज की मगजमारी न कर के पूरी तनख्वाह पत्नी के हाथ में दे देनी चाहिए। हाँ अपना खर्चा काट के।
4)
बच्चों के स्कूल की डायरी बच्चों की माँ को ही पढ़ने दें।
5)
मकान-मालिक से कब क्या कहना है, पत्नी को स्वयं कहने दें।
6)
दफ्तर पहुँचने के बाद शाम लौटने से पहले घर फ़ोन ना करें।
7)
बच्चों को डाँटे नहीं उसकी माँ से शिकायत करें।
8)
उसकी सहूलियत के सामान जैसे कि वाशिंग मशीन, फ्रीज, वैक्यूम क्लीनर जरूर खरीद दें। टीवी होना चाहिए (आप ही के काम आएगा)।

 

 

और जिंदगी के रोज के अनथक संघर्ष के बीच कभी-कभी बेमानी-सा कुछ भी अच्छा लगने लगता है, लेकिन उन कुछ भी कहे जाने वाले लम्हों में जिंदगी के बेशकीमती 'मायने' निहित होते हैं यह हमें बहुत बाद में समझ आता है। जैसे पढ़‍िए :

हाँ कुछ अच्छा भी हुआ था आज
मैंने बिटिया को स्कूल छोरा(छोड़ा)
और बेटे के साथ की थोरी(थोड़ी) मस्ती
दफ्तर को निकलने से पहले बीवी को क्या(किया) प्यार
बहुत अच्छा लगा ये सब बहुत दिनों के बाद।


लिखना न मेरा शौक है, न ही मेरा पेशा। यह तो बस समय के गिरते टुकड़े हैं जो चुन लिया करता हूँ। साथ ही सम्मिलित हैं कुछ जानकारियाँ जो किसी न किसी के काम आ सकती है।

 आशा है आपको कुछ पसंद आएगा।


 

 

 

 

 

   

 

 

Friday, September 13, 2019

इश्क भी क्या चीज़ है

"अरे इतनी सी बात पे परेशान होने की क्या जरुरत ये लो तुम मेरी फाइल दिखा देना,हाँ मेरी राइटिंग थोडी गन्दी है" अनुराग ने मुस्कुराते हुए सुबह से परेशान भावना की ओर अपनी फाइल बढ़ा दी, भावना को समझ नहीं आ रहा था की वो क्या करे| "अरे ! नहीं अनुराग तुमने साल भर मेंहनत कर के ये फाइल बनायीं है और अगर आज मेरी लापरवाही की वजह से तुम्हारे लिए कोई परेशानी होगी तो शायद मुझे अच्छा नहीं लगेगा| अगर मैंने ध्यान रखा होता तो वो फाइल गुम ना हुई होती " अरे! come-on भावना बच्चो जैसी बात मत करो आज तुम्हे जरुरत है इसलिए दे रहा हूँ ऐसे भी मेरा टर्न कल है तब तक मैं बना लूँगा फाइल" शायद इस अपनेपन को भावना नकार नहीं सकती थी ऊपर से जरुरत ने उसे और मजबूर कर दिया | "अरे चलो कैंटीन में कुछ खाते हैं यार मुझे बहुत भूख लग रही है" अनुराग के इस बात से सब सहमत हो गए उनके पूरे छ: लोगो का ग्रुप कैंटीन की कोने वाली टेबल पर बैठ के आर्डर का इंतजार करने लगा|

भावना आज खामोश थी उसके सर का बोझ तो हट गया था पर दिल बहुत भारी था| लोग अपनी बातो में मस्त थे पर वो लगातार अनुराग को देखे जा रही थी | जुबान से खामोश मगर अन्दर जाने कितना तूफान | आखिरकार आँखों ने अनुराग के सामने सवाल उढ़ेल ही दिए "क्यों तुम मुझे एहसान से लादे जा रहे हो पहले के एहसान क्या कम हैं मुझ पर जो आज एक और दे दिया | क्यों नहीं कभी कुछ मांग लेते मुझसे, क्यों नहीं मेरे दिल को ये एहसास होने देते की मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकती, इतना प्यार करते हो पर कभी अपनी आँखों से भी नहीं ज़ाहीर होने देते | हाँ, मैं कुछ नहीं दे सकती तुम्हे पर मैं ये एक बार तुम्हारे सामने स्वीकार करना चाहती हूँ | तुम्हारे एहसानो का बोझ बहुत भारी है | इसे लेके अब और नहीं चला जाता मुझ से "

भावना के दिमाग की इन सारी बातों को जैसे अनुराग ने साफ सुन लिया हो | बहुत ही सहज भाव से उसने भावना की आँखों में देख एक हल्की सी मुस्कराहट से ही जवाब दे दिया "हाँ मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ पर क्या प्यार बस पाने का ही नाम है अगर हाँ तो तुमसे बहुत ज्यादा मैंने पाया है तुम्हारे लिए कुछ भी कर पाने का सुकून मुझे जाने कितने दिनों तक खुश रखता है | तुमसे मांग मैं प्यार को छोटा नहीं कर सकता मैं तुम्हे, तुम्हारी मजबूरिया सब कुछ समझता हूँ | मुझे जो चाहिए वो मुझे तुम अनजाने में ही दे देती हो| तुम्हारी ख़ुशी से ज्यादा मुझे क्या चाहिए होगा | तुम्हारी ख़ुशी शायद तुम्हे भी उतना खुश न करती हो जितना मुझे कर देती है | और इस वक़्त भी मैं तुम्हे हँसता हुआ देखना चाहता हूँ | सच में बस एक बार मुस्कुरा दो ना मेरे लिए, लो मांग भी लिया अब न कहना की कुछ माँगा नहीं "| बात आँखों में हुई थीं पर भावना की आँखों में आंसू और होठो पे मुस्कान थी

……….. ये इश्क भी क्या चीज़ है |

यूँ तो इश्क हो जाता है बस चन्द कदम साथ चलकर के
पर ये मोम नहीं जो खत्म हो जाये बस थोडी देर जल कर के
लकडी जल कर कुछ देर में ही कोयला हो जाया करती है
पर कोयले से हीरा बनता है सैकडो साल घुटन सह कर के

 

Friday, March 8, 2019

लघुकथा

प्रशिक्षु : दृश्य एक

डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के उपरांत एक साल के प्रशिक्षु कार्य के लिए मन में उमंग लिए हुए उसने एक वृहदाकार, प्रसिद्ध, निजी अस्पताल में अपनी सेवा देना चाहा। पहले ही दिन उसकी रात्रिकालीन ड्यूटी के दौरान नगर के एक प्रतिष्ठित, सम्पन्न परिवार के मुखिया को आकस्मिकता में अस्पताल लाया गया। मरीज को दिल का भयंकर दौरा पड़ा था और मरीज के अस्पताल पहुँचने से पहले ही यमदूत अपना काम कर गए थे। उसने मरीज की नब्ज देखी जो महसूस नहीं हुई, दिल की धड़कनें सुनीं जो गायब थीं और घोषित कर दिया कि मरीज को अस्पताल में मृत अवस्था में लाया गया।

मरीज के सम्पन्न परिवार जनों को यह खासा नागवार ग़ुजरा और उन्होंने हल्ला मचाया कि मरीज का इलाज उचित प्रकार नहीं हुआ और एक प्रशिक्षु के हाथों ग़लत इलाज से मरीज को बचाया नहीं जा सका।

अगले दिन अस्पताल के मालिक-सह-प्रबंधक ने उस प्रशिक्षु को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

प्रशिक्षु: दृश्य दो

डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के उपरांत एक साल के प्रशिक्षु कार्य के लिए मन में उमंग लिए हुए उसने एक वृहदाकार, प्रसिद्ध, निजी अस्पताल में अपनी सेवा देना चाहा। पहले ही दिन उसकी रात्रिकालीन ड्यूटी के दौरान नगर के एक प्रतिष्ठित, सम्पन्न परिवार के मुखिया को अस्पताल लाया गया। मरीज को दिल का भयंकर दौरा पड़ा था और मरीज के अस्पताल पहुँचने से पहले ही यमदूत अपना काम कर गए थे। उसने मरीज की नब्ज देखी जो महसूस नहीं हुई, दिल की धड़कनें सुनीं जो नहीं थी। उसका दिमाग तेज़ी से दौड़ा। मरीज का परिवार शहर का सम्पन्नतम परिवारों में से था। उसने तुरंत इमर्जेंसी घोषित की, मरीज के मुँह में ऑक्सीजन मॉस्क लगाया, दो-चार एक्सपर्ट्स को जगाकर बुलाया, महंगे से महंगे इंजेक्शन ठोंके, ईसीजी, ईईजी, स्कैन करवाया, इलेक्ट्रिक शॉक दिलवाया और अंतत: बारह घंटों के अथक परिश्रम के पश्चात् घोषित कर दिया कि भगवान की यही मर्जी थी।

मरीज के सम्पन्न परिवार जन सुकून में थे कि डाक्टर ने हर संभव बढ़िया इलाज किया, अमरीका से आयातित 75 हजार रुपए का जीवन-दायिनी इंजेक्शन भी लगाया, पर क्या करें भगवान की यही मर्जी थी।

अगले दिन अस्पताल के मालिक-सह-प्रबंधक ने मरीज के बिल की मोटी रकम पर प्रसन्नतापूर्वक निगाह डालते हुए उसे शाबासी दी- वेल डन माइ बॉय, यू विड डेफ़िनिटली गो प्लेसेस।