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Friday, December 31, 2010

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ!!

नये साल की शुभकामनाएँ!

खेतों की मेड़ों पर धूल-भरे पाँव को,

कुहरे में लिपटे उस छोटे-से गाँव को,

नए साल की शुभकामनाएँ!

 

जाते के गीतों को, बैलों की चाल को,

करघे को, कोल्हू को, मछुओं के जाल को,

नए साल की शुभकामनाएँ!

 

इस पकती रोटी को, बच्चों के शोर को,

चौंके की गुनगुन को, चूल्हे की भोर को,

नए साल की शुभकामनाएँ!

 

वीराने जंगल को, तारों को, रात को,

ठण्डी दो बन्दूकों में घर की बात को,

नए साल की शुभकामनाएँ!

 

इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल को,

सिगरेट की लाशों पर फूलों-से ख्याल को,

नए साल की शुभकामनाएँ!

 

                                 रचना : सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

 

नववर्ष की अनंत शुभकामनाएँ नए वर्ष की नई दिशा हो, नई कामना, नई आस हो, नई भावना, नई सोच हो,

आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ!!


Friday, November 19, 2010

A person in power and responsibility

A person in power and responsibility must use his influence to enrich the lives of those who are the most deserving.
 Nepotism and favoritism should be avoided because they are antithesis to a life of morality.
 Man in power has to be sensitive enough to hear the subtle voice of conscience.
 The indication of his conscience should guide his way of life.
 He must be Idealistic and must have all conscious considerations before implementing a decision.
 Power comes with enormous responsibilities. A person who discharges his responsibilities in conformity with moral principles
becomes an invincible life force for the humanity. The life of Mahatma Gandhi is a beacon light to such high standards of human existence.
What does our political leaders and bureaucrats do? Don't their hearts bleed at the sight of the poverty and wretchedness of life?
 Why do they turn a deaf ear when the deprived mass cry with empty stomach and heart full of grievances? Is it not their moral responsibility
to endeavor honestly to sort out the problems of the common mass who have reposed their faith on the legislature and bureaucracy?
The irony is that a person in power often goes into a deep slumber in his air-conditioned cosy chamber.
And the high hopes of the deprived mass dash to the grounds.

Monday, November 15, 2010

स्वाभिमानी बालक

किसी गाँव में रहने वाला एक छोटा लड़का अपने दोस्तों के साथ गंगा नदी के पार मेला देखने गया। शाम को वापस लौटते समय जब सभी दोस्त नदी किनारे पहुंचे तो लड़के ने नाव के किराये के लिए जेब में हाथ डाला। जेब में एक पाई भी नहीं थी। लड़का वहीं ठहर गया। उसने अपने दोस्तों से कहा कि वह और थोड़ी देर मेला देखेगा। वह नहीं चाहता था कि उसे अपने दोस्तों से नाव का किराया लेना पड़े। उसका स्वाभिमान उसे इसकी अनुमति नहीं दे रहा था।

उसके दोस्त नाव में बैठकर नदी पार चले गए। जब उनकी नाव आँखों से ओझल हो गई तब लड़के ने अपने कपड़े उतारकर उन्हें सर पर लपेट लिया और नदी में उतर गया। उस समय नदी उफान पर थी। बड़े-से-बड़ा तैराक भी आधे मील चौड़े पाट को पार करने की हिम्मत नहीं कर सकता था। पास खड़े मल्लाहों ने भी लड़के को रोकने की कोशिश की।

उस लड़के ने किसी की न सुनी और किसी भी खतरे की परवाह न करते हुए वह नदी में तैरने लगा। पानी का बहाव तेज़ था और नदी भी काफी गहरी थी। रास्ते में एक नाव वाले ने उसे अपनी नाव में सवार होने के लिए कहा लेकिन वह लड़का रुका नहीं, तैरता गया। कुछ देर बाद वह सकुशल दूसरी ओर पहुँच गया।

उस लड़के का नाम था 'लालबहादुर शास्त्री'।

 

 

Thursday, November 11, 2010

छठ पूजा आज से शुरू

 मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई इलाके में आयोजित की जाने वाली चार दिवसीय छठ पूजा आज शुरू हो गई। पूजा के पहले दिन गुरुवार को छठव्रती 'नहा-खा' करते हैं। इसके तहत व्रतधारी स्नान करने के बाद पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। दूसरे दिन व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे 'खरना' कहा जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। 'खरना' के बाद व्रतधारी अगले दिन शाम को डूबते सूर्य को अघ्र्य और उसके अगले दिन सुबह उगते सूर्य को अघ्र्य देते हैं। उगते सूर्य को अघ्र्य देने के साथ ही पवित्र छठ पूजा संपन्न हो जाती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं और वे पानी भी ग्रहण नहीं करते। छठ पर्व मूलत: सूर्य की आराधना का पर्व है, जिसे हिंदू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिंदू धर्म के देवताओं की सूची में सूर्य ही एक मात्र देवता है जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है। बाकी सभी देवताओं को कल्पना के आधार पर आकार दिया गया है। व्रतधारियों के मुताबिक छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। पुत्र की चाहत रखने वाली और पुत्र की सकुशलता के लिए महिलाएं सामान्य तौर पर यह व्रत रखती हैं। वैसे तो छठ का व्रत पुरुष भी पूरे मनोभाव से रखते हैं। इस बारे में राजधानी दिल्ली के मंडावली इलाके में रहने वाली एक छठ व्रतधारी सुनीता सिंह कहती हैं कि वह अपने बेटे की सकुशलता के लिए छठ का व्रत करती हैं। ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की और इसके बाद से यह पर्व आज तक मनाया जा रहा है। वैसे कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा सूर्य की पूजा करने की बात भी उल्लिखित है। बिहार के औरंगाबाद जिले के देव स्थित प्रसिद्ध सूर्य मंदिर के मुख्य पुजारी सच्चिदानंद पाठक के मुताबिक राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा शुक्ल पक्ष की षष्ठी को हुई थी। अखिल भारतीय विद्वत परिषद के मगध प्रमंडल के अध्यक्ष आचार्य लालभूषण मिश्र ने बताया कि छठ व्रत के दौरान हम सूर्य की आराधना करते है। उन्होंने बताया कि सूर्य की शक्तियों का मुख्य स्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। वास्तव में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अघ्र्य देकर दोनों का नमन किया जाता है।


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आस्था का महा पर्व छठ आज से .

वर्ष भर इंतजार के बाद छठ पूजा का पर्व बुधवार (आज) से शुरू हो रहा है। श्रद्धालु और व्रती छठ मैया को मनाने में जुट जाएंगे। चार दिन तक पर्व चलेगा। मुख्य रूप से यह भोजपुर क्षेत्र का त्योहार माना जाता है, लेकिन धीरे-धीरे पूरे देश के साथ विदेशों में भी यह पर्व मनाया जाने लगा है।
 
बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली समेत देश के विभिन्न क्षेत्रों में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को पूरे भक्तिमय वातावरण में सूर्य की उपासना का पर्व छठ मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत द्वापर काल से होने का उल्लेख है।

छठ पूजा के इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो इसका प्रारंभ महाभारत काल में कुंती द्वारा सूर्य की आराधना व पुत्र कर्ण के जन्म के समय से माना जाता है। मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर ( तालाब ) के किनारे यह पूजा की जाती है। प्राचीन काल में इसे बिहार और उत्तर प्रदेश में ही मनाया जाता था। लेकिन आज इस प्रान्त के लोग विश्व में जहाँ भी रहते हैं वहाँ इस पर्व को उसी श्रद्धा और भक्ति से मनाते हैं।

छठ का पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है। इसे छठ से दो दिन पहले चौथ के दिन शुरू करते हैं जिसमें दो दिन तक व्रत रखा जाता है। इस पर्व की विशेषता है कि इसे घर का कोई भी सदस्य रख सकता है तथा इसे किसी मन्दिर या धार्मिक स्थान में न मना कर अपने घर में देवकरी ( पूजा-स्थल) व प्राकृतिक जल राशि के समक्ष मनाया जाता है। तीन दिन तक चलने वाले इस पर्व के लिए महिलाएँ कई दिनों से तैयारी करती हैं इस अवसर पर घर के सभी सदस्य स्वच्छता का बहुत ध्यान रखते हैं जहाँ पूजा स्थल होता है वहाँ नहा धो कर ही जाते हैं यही नही तीन दिन तक घर के सभी सदस्य देवकरी के सामने जमीन पर ही सोते हैं।

पर्व के पहले दिन पूजा में चढ़ावे के लिए सामान तैयार किया जाता है जिसमें सभी प्रकार के मौसमी फल, केले की पूरी गौर (गवद), इस पर्व पर खासतौर पर बनाया जाने वाला पकवान ठेकुआ ( बिहार में इसे खजूर कहते हैं। यह बाजरे के आटे और गुड़ व तिल से बने हुए पुए जैसा होता है), नारियल, मूली, सुथनी, अखरोट, बादाम, नारियल, इस पर चढ़ाने के लिए लाल/ पीले रंग का कपड़ा, एक बड़ा घड़ा जिस पर बारह दीपक लगे हो गन्ने के बारह पेड़ आदि। पहले दिन महिलाएँ अपने बाल धो कर चावल, लौकी और चने की दाल का भोजन करती हैं और देवकरी में पूजा का सारा सामान रख कर दूसरे दिन आने वाले व्रत की तैयारी करती हैं।

छठ पर्व पर दूसरे दिन पूरे दिन व्रत ( उपवास) रखा जाता है और शाम को गन्ने के रस की बखीर बनाकर देवकरी में पांच जगह कोशा ( मिट्टी के बर्तन) में बखीर रखकर उसी से हवन किया जाता है। बाद में प्रसाद के रूप में बखीर का ही भोजन किया जाता है व सगे संबंधियों में इसे बाँटा जाता है।

तीसरे यानी छठ के दिन 24 घंटे का निर्जल व्रत रखा जाता है, सारे दिन पूजा की तैयारी की जाती है और पूजा के लिए एक बांस की बनी हुई बड़ी टोकरी, जिसे दौरी कहते हैं,  में पूजा का सभी सामान डाल कर देवकरी में रख दिया जाता है। देवकरी में गन्ने के पेड़ से एक छत्र बनाकर और उसके नीचे मिट्टी का एक बड़ा बर्तन, दीपक, तथा मिट्टी के हाथी बना कर रखे जाते हैं और उसमें पूजा का सामान भर दिया जाता है। वहाँ पूजा अर्चना करने के बाद शाम को एक सूप में नारियल कपड़े में लिपटा हुआ नारियल,  पांच प्रकार के फल, पूजा का अन्य सामान ले कर दौरी में रख कर घर का पुरूष इसे अपने हाथों से उठा कर नदी, समुद्र या पोखर पर ले जाता है। यह अपवित्र न हो जाए इसलिए इसे सिर के उपर की तरफ रखते हैं। पुरूष, महिलाएँ, बच्चों की टोली एक सैलाब की तरह दिन ढलने से पहले नदी के किनारे सोहर गाते हुए जाते हैं :-
काचि ही बांस कै बहिंगी लचकत जाय
भरिहवा जै होउं कवनरम, भार घाटे पहुँचाय
बाटै जै पूछेले बटोहिया ई भार केकरै घरै जाय
आँख तोरे फूटै रे बटोहिया जंगरा लागै तोरे घूम
छठ मईया बड़ी पुण्यात्मा ई भार छठी घाटे जाय


नदी किनारे जा कर नदी से मिट्टी निकाल कर छठ माता का चौरा बनाते हैं वहीं पर पूजा का सारा सामान रख कर नारियल चढ़ाते हैं और दीप जलाते हैं। उसके बाद टखने भर पानी में जा कर खड़े होते हैं और सूर्य देव की पूजा के लिए सूप में सारा सामान ले कर पानी से अर्घ्य देते हैं और पाँच बार परिक्रमा करते हैं। सूर्यास्त होने के बाद सारा सामान ले कर सोहर गाते हुए घर आ जाते हैं और देवकरी में रख देते हैं। रात को पूजा करते हैं। कृष्ण पक्ष की रात जब कुछ भी दिखाई नहीं देता श्रद्धालु अलस्सुबह सूर्योदय से दो घंटे पहले सारा नया पूजा का सामान ले कर नदी किनारे जाते हैं। पूजा का सामान फिर उसी प्रकार नदी से मिट्टी निकाल कर चौक बना कर उस पर रखा जाता है और पूजन शुरू होता है।

सूर्य देव की प्रतीक्षा में महिलाएँ हाथ में सामान से भरा सूप ले कर सूर्य देव की आराधना व पूजा नदी में खड़े हो कर करती हैं। जैसे ही सूर्य की पहली किरण दिखाई देती है सब लोगों के चेहरे पर एक खुशी दिखाई देती है और महिलाएँ अर्घ्य देना शुरू कर देती हैं। शाम को पानी से अर्घ देते हैं लेकिन सुबह दूध से अर्घ्य दिया जाता है। इस समय सभी नदी में नहाते हैं तथा गीत गाते हुए पूजा का सामान ले कर घर आ जाते हैं। घर पहुँच कर देवकरी में पूजा का सामान रख दिया जाता है और महिलाएँ प्रसाद ले कर अपना व्रत खोलती हैं तथा प्रसाद परिवार व सभी परिजनों में बांटा जाता है।

छठ पूजा में कोशी भरने की मान्यता है अगर कोई अपने किसी अभीष्ट के लिए छठ मां से मनौती करता है तो वह पूरी करने के लिए कोशी भरी जाती है इसके लिए छठ पूजन के साथ -साथ गन्ने के बारह पेड़ से एक समूह बना कर उसके नीचे एक मिट्टी का बड़ा घड़ा जिस पर छ: दिए होते हैं देवकरी में रखे जाते हैं और बाद में इसी प्रक्रिया से नदी किनारे पूजा की जाती है नदी किनारे गन्ने का एक समूह बना कर छत्र बनाया जाता है उसके नीचे पूजा का सारा सामान रखा जाता है। कोशी की इस अवसर पर काफी मान्यता है उसके बारे में एक गीत गाया जाता है जिसमें बताया गया है कि कि छठ मां को कोशी कितनी प्यारी है।
रात छठिया मईया गवनै अईली
आज छठिया मईया कहवा बिलम्बली
बिलम्बली - बिलम्बली कवन राम के अंगना
जोड़ा कोशियवा भरत रहे जहवां जोड़ा नारियल धईल रहे जहंवा
उंखिया के खम्बवा गड़ल रहे तहवां

छठ पूजा का आयोजन आज बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त देश के हर कोने में किया जाता है दिल्ली, कलकत्ता, मुम्बई चेन्न्ई जैसे महानगरों में भी समुद्र किनारे जन सैलाब दिखाई देता है पिछले कई वर्षों से प्रशासन को इसके आयोजन के लिए विशेष प्रबंध करने पड़ते हैं। इस पर्व की महत्ता इतनी है कि अगर घर का कोई सदस्य बाहर है तो इस दिन घर पहुँचने का पूरा प्रयास करता है। मात्र दिल्ली से इस वर्ष 6 लाख लोग छठ के अवसर पर बिहार की तरफ गए। देश के साथ-साथ अब विदेशों में रहने वाले लोग अपने -अपने स्थान पर इस पर्व को धूम धाम से मनाते हैं। पटना में इस बार कई लोगों ने नए प्रयोग किए जिसमें अपने छत पर छोटे स्वीमिंग पूल में खड़े हो कर यह पूजा की। उनका कहना था कि गंगा घाट पर इतनी भीड़ होती है कि आने जाने में कठिनाई होती है और सुचिता का पूरा ध्यान नहीं रखा जा सकता। लोगों का मानना है कि अपने घर में सफाई का ध्यान रख कर इस पर्व को बेहतर तरीके से मनाया जा सकता है। छठ माता का एक लोकप्रिय गीत है--

केरवा जे फरेला गवद से ओह पर सुगा मंडराय
उ जे खबरी जनइबो अदिक से सुगा देले जुठियाए
उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरझाय
उ जे सुगनी जे रोवे ले योग से आदित होइ ना सहाय

 
 

कहते हैं कि लोग उगते हुए सूर्य को प्रणाम करते हैं लेकिन यह ऐसा अनोखा पर्व है, जिसकी शुरुआत डूबते हुए सूर्य की अराधना से होती है। इस साल हालांकि महंगाई के जोर पकड़ने के बावजूद लोगों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। जानी मानी भोजपुरी लोक गायिका प्रो. शारदा सिन्हा छठ की महिमा एवं महंगाई को गीतों के माध्यम से व्यक्त करते हुए कहती हैं, 'नाही छोड़ब हो भइया छठिया बरतिया, लेले अइहा हो भइया छठ के मोटरिया। अबकी त बहिनी महंग भइल गेहूंआ..छोड़ी देहु ए बहिनी छठ के बरतिया।'

श्रीमती सिन्हा ने कहा कि भक्ति एवं शुद्धता को विशेष रूप से महत्व देने वाले छठ पर्व के प्रारंभ का उल्लेख द्वापर काल में मिलता है। कहा जाता है कि सूर्य पुत्र अंगराज कर्ण सूर्य के बड़े उपासक थे और वह नदी के जल में खड़े होकर भगवान सूर्य की पूजा करते थे। पूजा के पश्चात कर्ण किसी याचक को कभी खाली हाथ नहीं लौटाते थे। उन्होंने कहा कि छठ पर्व की शुरुआत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को नहाय-खाय से शुरू हो जाती है जब छठव्रती स्नान एवं पूजा पाठ के बाद शुद्ध अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू की सब्जी ग्रहण करते हैं।

इस वर्ष छठ पर्व में संध्या अ‌र्घ्य 12 नवंबर को और प्रात: काल का अ‌र्ध्य 13 नवंबर को है। बीते कल यानी बुधवार को नहाय खाय के तौर पर व्रतियों के साथ-साथ आम श्रद्धालुओं व लोगों ने छठ पूजा की विधिवत शुरुआत की। बृहस्पतिवार को खरना के तौर पर पूजा की जाएगी। व्रतियों के लिए आज से ही व्रत करने की शुरुआत होगी।

पंचमी को दिनभर खरना का व्रत रखकर व्रती शाम को गुड़ से बनी खीर, रोटी और फल का सेवन करते हैं। इसके बाद शुरू होता है 36 घंटे का निर्जला व्रत। महापर्व के तीसरे दिन शाम को व्रती डूबते सूर्य की अराधना करते हैं जब व्रती अस्ताचलगामी सूर्य को अ‌र्घ्य देते हैं। पूजा के चौथे दिन व्रतधारी उदयीमान सूर्य को दूसरा अ‌र्घ्य समर्पित करते हैं। इसके पश्चात 36 घंटे का व्रत समाप्त होता है और व्रती अन्न जल ग्रहण करते हैं। इस अ‌र्ध्य में फल, नारियल के अतिरिक्त ठेकुआ का काफी महत्व होता है।

नहाय-खाय की तैयारी के दौरान महिलाओं के एक ओर जहां गेहूं धोने और सुखाने में व्यस्त देखा जा सकता है वहीं महिलाओं के एक हुजूम को बाजारों में चूड़ी, लहठी, अलता और अन्य सुहाग की वस्तुएं खरीदते देखा जा सकता है। बिहार के औरंगाबाद जिले के पौराणिक देव स्थल में लोकपर्व कार्तिक छठ पर्व पर चार दिवसीय छठ मेले की भी शुरुआत हो गई। यहां त्रेतायुग में स्थापित प्रचीन सूर्य मंदिर में वृदह सूर्य मेले का आयोजन किया जाता है।




Tuesday, November 9, 2010

दबंग करते है

काम सब गैर- जरुरी  है जो सब करते है
और हम कुछ नही करते है
, गजब करते है
हम पे हाकिम का कोई हुकम नही चलता है
क्यों की हम कलंदर है
हम वही करते है जो दबंग करते है 

Thursday, November 4, 2010

नवंबर महीने में जन्म

आपका जन्म किसी भी साल के नवंबर महीने में हुआ है तो एस्ट्रोलॉजी कहती है कि आप इस दुनिया में सबकी भलाई करने के लिए जन्मे हैं। आप अत्यंत दयालु और परोपकारी हैं। सहनशक्ति के हिसाब से भी आप कमाल के बंदे हैं। जब तक आपका स्वाभिमान हर्ट ना हो जाए तब तक हर छोटी-बड़ी बात आप सिर से गुजर जाने देते हैं।

आप सबके बीच सामंजस्य बैठाने का काम बखूबी निभाते हैं। अक्सर दोस्तों के पैचअप करवाने की जिम्मेदारी आपकी होती है। यूँ तो दुनिया आपको बड़े ही शांत और सौम्य रूप में जानती है लेकिन जिसने आपका गुस्सा देखा है वही जानता है कि आपके भीतर कितना तूफान भरा है। इसकी वजह से आप कम उम्र में ही ब्लड प्रेशर जैसी बीमारी का शिकार हो सकते हैं।

आप दोस्तों के लिए कुछ करें या ना करें दोस्त आप पर जान लुटाने के लिए तैयार खड़े रहते हैं क्योंकि आपके भोलेपन के वे कायल होते हैं। आपकी तरक्की से जलने वालों के लिए चेतावनी है कि नवंबर वालों के दुश्मन सीधे मुँह की खाते हैं अत: सावधान। नवंबर माह में जन्में युवाओं में प्यार का अथाह सागर होता है। ‍जिसे प्यार करेंगे वह अगर ना मिल पाए तो भी उसे भूल नहीं पाएँगे। और जो अगर प्यार मिल जाए तो उसकी खुशी के लिए खुद को मिटाकर भी तृप्त नहीं होते। फिर वही बात कि अत्याधिक दयालु जो होते हैं।

कुछ युवा जो नवंबर में जन्मे हैं और जिनकी राशि वृश्चिक या मेष है उन पर कंजूस होने का आरोप लग सकता है अन्यथा सामान्यत: नवंबर के युवा दिल के इतने उदार होते हैं कि सामने वाले के चेहरे पर मुस्कान देखने के लिए खुद की जेब खाली करके भी खुश रहते हैं।

पैसा इनके पास जितना भी आए, सेविंग के तरीके खोज ही लेते हैं। पूरी तरह से खाली ये कभी नहीं होते। इनके किसी ना किसी पर्स या पेंट की जेब से पैसे निकल ही आएँगे। थोड़ी व्यग्रता पर कंट्रोल कर ले तो इनके जैसा करीने से रहने वाला मिलना मुश्किल है। हर काम सुव्यवस्थित और साफ-सुथरा। इनके बचपन से लेकर अबतक के छोटे से छोटे डॉक्यूमेंट भी किसी फाइल में सुरक्षित रखे मिल जाएँगे। यहाँ हम आपको थोड़ा सा सनकी कह सकते हैं। कुछ-कुछ कन्फ्यूज्ड और कुछ-कुछ क्रिएटिव।

अतीत से इन्हें गहरा लगाव होता है। अपनी हर पहली बात या पहली चीज अपनी स्मृति में संजोकर रखते है। अक्सर इस माह में जन्मे लोग संवेदनशील लेखक, पुलिस, पत्रकार, कलाकार, सर्जन या गुप्तचर विभाग में होते हैं। मन इनका बच्चों की तरह होता है इसीलिए बच्चों से इन्हें बेहद प्यार होता है।

इनका इंटि्यूशन पॉवर तो माशाअल्लाह होता है। किसी बात का पूर्वाभास होना या सूरत देखकर आदमी की फितरत पहचानना इनके लिए आसान होता है। आकर्षक मुखाकृति और मासूमियत के कारण नौकरी हो या घर, प्यार हो या दोस्ती, इनके सौ गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। अपने बालों का इन्हें विशेष ख्याल रखना चाहिए वरना गंजे हो सकते हैं। बड़ी-बड़ी हाँकने की प्रवृत्ति से भी थोड़ा बचें तो सही वक्त पर सही जीवनसाथी मिल जाएगा।

नवंबर माह की लड़कियाँ भावुक दिखतीं है पर होती प्रेक्टिकल हैं। चोट खाने पर खुद को समय पर संभाल लेती है।

यही वजह है कि अपने दुख के लिए कभी दूसरों का कंधा इस्तेमाल नहीं करती। बेमिसाल सहनशक्ति के कारण जीवन की हर जंग जीत लेती है। अभिव्यक्ति थोड़ी सी कमजोर होती है इसलिए उम्मीद करती है कि इनके आसपास के लोग इनकी बात स्वयं समझ लें। लोग जब इन्हें समझ नहीं पाते हैं तो ये झल्ला पड़ती हैं।

नवंबर माह वालों के लिए सलाह है कि वे अपनी कम्युनिकेशन स्किल सुधारें क्योंकि इसकी वजह से अक्सर लोग आपको गलत समझ लेते हैं। अपने सौम्य स्वरूप का गलत फायदा ना उठाएँ बल्कि सच्चाई और ईमानदारी आपकी ताकत है उसका इस्तेमाल करें।
कल्पना लोक से बाहर आएँ जिंदगी के कई रंग बस आप ही के लिए खिले हैं आप को उन्हें समय पर पहचानना है। हमारी शुभकामनाएँ।

लकी नंबर : 3, 1, 7
लकी कलर : ‍पिंक, सफेद और चॉकलेटी
लकी डे : गुरुवार और मंगलवार
लकी स्टोन : पर्ल और मून स्टोन
सुझाव : तेल में अपना चेहरा देखकर मंदिर में दान करें रूकावटें दूर होंगी।

तुम बिन सब अधूरा होगा

फिर वो ही चाँद होगा


वो ही सितारों का कारवां होगा

फिर वो ही बहारें होगी

वो ही फूलों का नजारा होगा

सब कुछ होगा मगर फिर भी

तुम बिन सब अधूरा होगा



फिर वो ही गाँव और चौबारा होगा

वो ही पनघट का नजारा होगा

फिर वो ही आपस में बतियाती सहेलीयां होगी

वो खिलखिलाहट और मुस्कानें होगी

सब कुछ होगा मगर फिर भी

एक चेहरा वहाँ नहीं होगा



फिर वो ही पीपल की छाँव होगी

वो ही इंतज़ार होगा

फिर वो ही दोपहर की धूप होगी

वो ही तेरी यादें होगी

सब कुछ होगा मगर फिर भी

जब तू नहीं होगा तो कुछ नहीं होगा



फिर वो ही डायरी होगी

वो ही तेरा नाम होगा

मगर हाथ ना अब उठेंगे

आँखों से अश्कों का इक नया रिश्ता होगा

डूबते दिल को तेरी यादों का सहारा होगा



फिर वो ही महफिले होगी

वो ही ग़ज़लों का सफ़र होगा

फिर वो ही शमा होगी

मगर इक आवाज ना होगी , जब

अंजन  उस महफ़िल में ना होगा

सफल कौन है?

सफल कौन है? वह सामाजिक कार्यकर्ता जो गांव के बच्चों को शिक्षा देने का लक्ष्य पा लेता है या वह व्यक्ति जो लाखों-करोड़ों का बिजनेस और ऐशो-आराम की जिंदगी जी रहा हो, वह क्लर्क जो अपने लिए घर बनाकर और बच्चों की शादियां कर सारे कामों से निवृत्त हो चुका है या वह विद्यार्थी जिसने आईएएस की परीक्षा पास की है या फिर वह खिलाड़ी या बिजनेसमैन जो एक सफलता के बाद भी दूसरी सफलता के लिए बेचैन रहता है।

इस प्रश्न का उत्तर आपको अलग-अलग ही मिलेगा, जैसे कि कोई, कार्यकर्ता को, तो कोई बिजनेसमैन, तो कोई क्लर्क या विद्यार्थी को सफल मानेगा। किसी के लिए एक ही सफलता काफी है, तो दूसरे के लिए एक सफलता के बाद दूसरी सफलता और फिर तीसरी, चौथी..।

तो फिर पूर्ण सफलता क्या है? इस शब्द को मनोवैज्ञानिक, व्यवहार वैज्ञानिक, दार्शनिक, धर्म, समाज वैज्ञानिक, मानवशास्त्री, प्रेरक गुरु सभी अपने-अपने तरीके से परिभाषित करते हैं। समाज विज्ञान इसे सिर्फ बोध की स्थिति बताता है। समाज वैज्ञानिकों के अनुसार सफलता का सोच है, एक अवधारणा जो उसे महसूस करने वाले पर निर्भर करती है।

सफलता वह स्थिति है जहां व्यक्ति स्वयं को देखना चाहता है। किसी के लिए नई बढ़िया कार, विदेश में छुट्टियां मनाना, नया घर, नई नौकरी सफलता के दायरे में आती है। अगर उसके पास ये सारी चीजें नहीं होतीं तो वह उन्हें पाने के लिए संसाधनों और अवसरों की तलाश में जुट जाता है। कुछ लोगों को बहुत ज्यादा पैसे, कमाई, स्वतंत्रता, ऐश्वर्य जैसी चीजों की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे लोग जीवन में मिली छोटी-छोटी चीजों से सफलता का अनुभव करते हैं।

मनोवैज्ञानिक डा. निक एरिजा कहते हैं, "किसी चीज को पाना आंतरिक स्थिति है न कि बाहरी। यह सच है कि बाहरी चीजें आंतरिक स्थिति को प्रेरणा देती हैं, लेकिन अंतत: जो सफलता अंतर्मन में महसूस होती है, वही सबसे महत्वपूर्ण है।" कुछ लोग सफलता और धन को एक मान लेते हैं।

अर्थशास्त्री जॉन मार्क्‍स रुपयों के बल पर हर ख्वाहिश पूरी कर लेने की ताकत रखने वाले को सफल मानते हैं। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में कहा है कि सामान्य के बीच अपनी योग्यता को साबित करना ही सफलता है। वहीं दुनियाभर के साधु-महात्माओं ने उन व्यक्तियों को सफल माना है जो सांसारिक चीजों से ऊपर उठकर सोचते हैं। भारतीय विद्वानों के अनुसार सफल वहीं है, जिसने अपनी इच्छाओं पर काबू पा लिया है। समाज विज्ञानी इसे तुलनात्मक स्थिति मानते हैं।

समाज वैज्ञानिक केविन मेक्कैली का कहना है कि सफलता एक अमूर्त विषय हैं। इसे मापने के लिए कोई तराजू उपलब्ध नहीं है। फिर भी लोग इसे नापते हैं। सफलता को नापने का मीटर उनकी संस्कृति व आर्थिक स्थिति होती है। इन्हीं तत्वों को आधार मानकर वे अपनी तुलना दूसरे व्यक्ति से करते हैं और अपनी सफलता या असफलता का निर्धारण करते हैं।

व्यवहार विज्ञानी गेरी रेयान सफलता का अर्थ समझने के लिए सबसे पहले मनुष्य की प्रकृति को समझने की बात करते हैं। उनके अनुसार हर मनुष्य को सोचने, समझने, समीक्षा व प्रतिक्रिया करने का तरीका अलग-अलग होता है। इसमें शरीर के तीनों भाग - शरीर, आत्मा एवं प्रवृत्ति काम करते हैं। यही उन्हें सफलता का आभास भी दिलाते हैं।

सफलता का रहस्य मनुष्य की सोच और सफलता को देखने की क्षमता में छिपा है। अमेरिकी मनोविज्ञान के पिता विलियम जेम्स कहते हैं - "हम जो सोचते हैं, उसे हासिल कर सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर भावनाओं की ऐसी अंतहीन शक्ति है, जो उसे किसी भी समस्या से लड़ने में मदद करती है। वह अपनी सारी कमजोरियों से बाहर आ सकता है। आर्थिक निर्भरता प्राप्त कर सकता है। आध्यात्मिक रूप से जाग्रत हो सकता है। हर चीज जिसका संबंध सफलता से है वह हासिल कर सकता है। यह सफलता का स्रोत हर व्यक्ति में उपलब्ध है, जिसे वे सफलता कंपास से समझाते हैं।"

जेम्स के मुताबिक यह कंपास प्राकृतिक रूप से आपके अंदर उपलब्ध होता है, और हमेशा सही दिशा दिखने का काम करता है। यह कंपास भौगोलिक दिशा दिखाने की जगह सफलता का मार्ग बताता है। कोई भी व्यक्ति इसके जरिए यह जान सकता है कि उसके पास सफल होने के लिए कितनी क्षमता है। एक तरह से यह सफलता की आधारशिला भी तैयार करता है। सफलता का मार्ग दिखाने में इसका उपयोग सबसे अधिक तब किया जा सकता है जब आप सफलता और असफलता की धुंध में खो जाएं। यह दिमाग को विकल्प खोजने में मदद करता है। अब्राहम लिंकन ने एक बार कहा था - 'सफल लोगों का प्रतिशत तब बढ़ सकता है जब वे अपने दिमाग को उस काम के लिए तैयार कर लें।'

आस्ट्रेलिया के मनोवैज्ञानिक एलन रिचर्डसन द्वारा बास्केटबॉल खिलाड़ियों पर किया गया प्रयोग भी इस बात का समर्थन करता है, जिसमें उन्होंने खिलाड़ियों को तीन समूहों अ, ब, स में बांट दिया। समूह 'अ' को उन्होंने प्रतिदिन 20 मिनट तक फ्री थो का अभ्यास करने का अवसर दिया। समूह 'ब' को उन्होंने अभ्यास न करने की सलाह दी और 'स' को रोज 20 मिनट तक मानसिक रूप से अभ्यास करने को कहा। शोध के अंद में पाया गया कि 'अ' समूह के खिलाड़ियों की फ्री थ्रो क्षमता में 25 प्रतिशत तक का सुधार आया। आशा के अनुरूप समूह 'ब' के लोगों में कोई सुधार नहीं था। लेकिन समूह 'स' के लोगों में 24 प्रतिशत तक सुधार पाया गया जो 'अ' समूह के बराबर था, जबकि वे बास्केटबॉल कोर्ट में गए ही नहीं। यह प्रयोग साबित करता है कि हमारा दिमाग कठिन से कठिन लक्ष्य को भी पूरा कर सकता है। बस आप हर दम तैयार रहें।साभार :सहारा समय

लेखक फिल कोविंगटन इस बात को और पुख्ता करते हैं। उनके अनुसार हमारे अंदर सफलता की दो अवस्थाएं होती हैं, पहली यह हमाने निर्णय पर आधारित होती है, जिसमें हम यह सोचते हैं कि सफलता हमारे लिए क्या है? और दूसरा वह बोध जिसमें हम जानते हैं कि इसके लिए हम क्या अच्छा कर सकते हैं? इसका मतलब यह हुआ कि वास्तविक सफलता का साधन आंतरिक व मानसिक स्थिति है। लेकिन तंत्रिका विज्ञान और व्यवहार विज्ञान इसे मानसिक स्थिति न कहकर भावनात्मक स्थिति कहता है।

सफलता के गुर बताने वाले ज्यादातर परामर्शदाता इस बात पर जोर देते हैं कि 'भावनात्मक समझ' सफलता व जीवन में खुशियों की बेहतर भविष्यवक्ता होती है। यह तार्किक समझ से ज्यादा सटीक होती है। विज्ञान इस बात की पुष्टि करता है कि आकर्षण ही सफलता हासिल करने के लिए प्रेरित करता है, जिसकी वजह से आपको बा' चीजों पर बहुत अधिक निर्भर नहीं रहना पड़ता।

तंत्रिका विज्ञान और व्यवहार विज्ञान ने बहुत स्पष्ट रूप से समझाया है कि जब हम किसी चीज से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं - तब अपने दिमाग के तंत्रिका तंत्र को शारीरिक रूप से उस चीज के प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित कर देते हैं। इस न्यूरोबायोलॉजिकल खोज को पारलौकिक लेखक सदियों से 'आकर्षण का कानून' कहते रहे हैं। इस प्राचीन कानून को यदि आधुनिक विज्ञान की भाषा में कहें तो इसका मतलब हुआ हम उसी चीज के प्रति आकर्षित होते हैं, जिस पर हम भावनाओं को जानबूझकर केंद्रित करते हैं।

ऐसा करते समय हम उस चीज पर सीधे ध्यान केंद्रित करने के लिए दिमाग के तंत्रिका तंत्र को मजबूती प्रदान करते हैं। इस तरह दिमाग सपनों को पूरा करने की मशीन बन जाता है। ऐसे कई लोग हैं जो कॉलेज या स्कूल की पढ़ाई के दौरान बहुत मेधावी छात्र रहे, लेकिन वे जीवन में सफल नहीं कहलाए। ऐसे व्यक्ति जीवन स्तर को उठाने वाली चीजों से भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाते। उनमें किसी चीज को पाने की भावनात्मक वचनबद्धता की कमी रहती है।

वहीं कमजोर या सामान्य बुद्धि के छात्र बड़े पदों पर पहुंच जाते हैं, या बड़े व्यापारी बन जाते हैं। सफल और खुशहाल जीवन जीने के लिए उन्हें जोश की भावना कुछ पाने के लिए सीधे प्रेरित करती है। हम इसे कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि गरीबी से दूर भागने या आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति छोटे से छोटा या बड़े से बड़ा काम कर सकता है। अरस्तू के शब्दों में कहें तो आवेग से प्रेरित लोग कहीं ज्यादा साहसी, उत्साह और आशा से भरे हुए होते हैं। शुरुआत में आवेग उन्हें डरने से रोकता है, जबकि बाद में उन्हें आत्मविश्वास के साथ प्रेरित करता है।

मनोवैज्ञानिक जॉजन गार्टनर इसका संबंध आनुवांशिक गुण से बताते हैं। उनका कहना है कि सफलता प्राप्त करने का गुण आनुवांशिक होता है। व्यक्ति में पहले सफलता प्राप्त करने का गुण मौजूद रहता है, जो इसे माता-पिता से मिलता है। लैलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के संस्थापक शेफस्काई इस विचार को सिरे से खारिज करते हैं। वह कहते हैं, 'सफल व्यक्ति का इतिहास इस बात का गवाह है कि सफलता वंशानुगत नहीं होती व जीन, आयु, रंग इत्यादि पर निर्भर न करके व्यक्ति प्रयासों पर निर्भर करती है।'

अनगिनत अध्ययनों में यह बात साबित हुई है कि लोगों का उत्तराधिकार, अचानक लॉटरी या और किसी तरह से मिलने वाला पैसा कुछ सालों में खत्म हो जाता है और उन्हें अपनी शुरुआत शून्य से करनी होती है।

शेफस्काई की बात वजनदार लगती है। अब्राहम लिंकन, महात्मा गांधी और धीरूभाई अंबानी जैसी अनगिनत हस्तियां हैं, जहां इस वंशानुगत गुण का उनकी सफलता से कोई वास्ता नहीं है।

समाजविज्ञानी भी वंशानुगत सफलता की बात को नकारते हैं। इनके अनुसार सफलता व्यक्तिगत होती है, जो अपनी बुद्धि, प्रयास और संरचनात्मक पर निर्भर करती है। छात्र से लेकर शोधकर्ता, क्लर्क से लेकर किसी कंपनी के सीईओ तक को आगे बढ़ने के लिए बुद्धि या मस्तिष्क की शक्ति की आवश्यकता पड़ती है।

अगर तंत्रिका-तंत्र शोधकर्ताओं की बात मानें तो दिमाग मांसपेशी की तरह है, जिसकी क्षमता को जितना चाहें उतना बढ़ाया जा सकता है। यह जितना इस्तेमाल होगा, उतना शक्तिशाली बनेगा।

कदम-कदम पर मिली सफलता जहां एक ओर लोकप्रिय बनाती है, वहीं दूसरी तत्व यह भी है कि सफल व्यक्ति के अंदर अपनी लत भी डाल देती है। सफलता के आदी बन चुके लोगों के लिए सफलता की लत शब्द का प्रयोग करना गलत नहीं होगा। स्टील किंग लक्ष्मी निवास मित्तल कहते हैं कि 'एक के बाद दूसरी सफलता के पीछे दौड़ने का मतलब है, आप किसी अवसर को छोड़ना नहीं चाहते। मैं भी किसी अवसर को छोड़ना नहीं चाहता हूं।' शोधकर्ता कहते हैं कि आपके अगले कदम के आगे आपकी पिछली सफलता चलती है, जिस कारण कई काम वैसे ही आसान हो जाते हैं।

असफलता का डर मनोवैज्ञानिक डर है, जो व्यक्ति को पहले ही हार मानने के लिए उकसाता है। खेल मनोविज्ञान के अनुसार, सफलता की तरह असफलता भी आंतरिक धारणा है। यह प्रत्येक व्यक्ति की मानसिक स्थिति का भाग है। आप अपने अंदर विजय भावना लेकर चलते हैं। खेल मनोवैज्ञानिक पीटर जेनसन बेनरीड ने ओलंपिक खिलाड़ियों पर किए अध्ययन में पाया कि खेल में जीत से मात्र एक पल पहले खिलाड़ी पर किए गए अध्ययन में पाया कि खेल में जीत से मात्र एक पल पहले खिलाड़ी इस बात को स्वीकार कर लेता है कि वह हारेगा या जीतेगा।

अंतत: परिणाम भी उसी के अनुसार आता है। यह बात आम लोगों की जिंदगी पर भी लागू होती है। एक छोटा-सा पल जो जीत से एक कदम दूर होता है, इस पल में जो भी निर्णय हम लेते हैं वह या तो असफलता का कलंक लगा जाता है या विजयमाला पहनाता है।

प्रसिद्ध लेखक गेरी सिम्पसन सफलता के गणित के आधार पर इस बात को प्रमाणित करते हैं। यदि आप सफलता के लिए मानसिक रूप से मात्र 95 प्रतिशत तैयार हैं यानी उस सफलता के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है तो यह स्थिति सफलता के प्रतिशत को शून्य कर देती है। गेरी के गणितीय सिद्धांत के अनुसार समझें तो शून्य का 95 प्रतिशत शून्य होता है।

अधिकतर लोग सफल होने से रह जाते हैं और उनका प्रयास शून्य पर आकर खत्म हो जाता है। हाथ आती है तो सिर्फ असफलता। असफलता की तरह सफलता भी एक गतिशील स्थिति है। आज अगर सफल हैं तो कल असफल भी हो सकते हैं। सफल व्यक्तियों ने अपनी सफलता के मूलमंत्र के रूप में एक बात जरूर कहीं है - 'सफलता पाना जितना कठिन है उतना ही कठिन उसे बनाए रखना भी है।' इस डर से कि आप हार जाएंगे, सफलता के लिए कोशिश न करना सबसे बड़ी हार होगी।

Wednesday, November 3, 2010

बात पिछली दीपावली की है।


बात पिछली दीपावली की है। भूल गया था,  पर इस बार दीपावली की धूमधाम शुरू होते ही याद आ गई। 
त्योहार की धूमधाम भरी तैयारियों में पिछले साल श्रीमती गुप्ता ने ढेरों पकवान बनाए सोचा मोहल्ले में गज़ब का प्रभाव जमा देंगी। बात ही बात में गुप्ता जी को ऐसा पटाया की यंत्रवत श्री गुप्ता ने हर वो सुविधा मुहैय्या कराई जो एक वैभवशाली दंपत्ति को को आत्म प्रदर्शन के लिए ज़रूरी थी। "माडल" जैसी दिखने के लिए श्रीमती गुप्ता ने साड़ी ख़रीदी और गुप्ता जी को कोई तकलीफ न हुई।

घर को सजाया सँवारा गया,  बच्चों के लिए नए कपड़े बने। कुल मिलाकर यह कि दीपावली की रात पूरी सोसायटी में गुप्ता परिवार की रात होनी तय थी। चमकेंगी तो गुप्ता मैडम, घर सजेगा तो हमारे गुप्ता जी का, सलोने लगेंगे तो गुप्ता जी के बच्चे, यानी ये दीवाली केवल गुप्ता जी की होगी ये तय था।

समय घड़ी के काँटों पे सवार दिवाली की रात तक पहुँचा,  सभी ने तयशुदा मुहूर्त पे पूजा पाठ की। उधर सारे घरों में गुप्ता जी के बच्चे प्रसाद (आत्मप्रदर्शन)  पैकेट बांटने निकल पड़े । जहाँ भी वे गए सब जगह वाह वाह के सुर सुन कर बच्चे अभिभूत थे किंतु भोले बच्चे इन परिवारों के अंतर्मन में धधकती ज्वाला को न देख सके।

ईर्ष्यावश सुनीति ने सोचा बहुत उड़ रही है प्रोतिमा गुप्ता, क्यों न मैं उसके भेजे प्रसाद-बॉक्स दूसरे बॉक्स में पैक कर उसे वापस भेज दूँ, यही सोचा बाकी महिलाओं ने और नई पैकिंग में पकवान वापस रवाना कर दिए श्रीमती गुप्ता के घर। यह कोई संगठित कोशिश न ही बदले की भावना बल्कि एक स्वाभाविक आंतरिक प्रतिक्रया थी, जो सार्व-भौमिक सी होती है। आज़कल आम है। कोई माने या न माने सच यही है जितनी नकारात्मक कुंठा इस युग में है उतनी किसी युग में न तो थी और न ही होगी । इस युग का यही सत्य है।

दूसरे दिन श्रीमती गुप्ता ने जब डब्बे खोले तो उनके आँसू निकल पड़े जी में आया कि सभी से जाकर झगड़ आऐं किंतु पति से कहने लगीं, "अजी सुनो चलो जगत देव तालाब गरीबों के साथ दिवाली मना आएँ।

इस साल- देखते हैं क्या होता है। मिसेज़ गुप्ता मुहल्लेवालों के साथ दीपावली मनाती हैं या जगत देव तालाब के गरीबों की उन्हें दुबारा याद आती है।


दीपों की बातें

एक बार की बात है, दीपावली की शाम थी, मैं दिये सजा ही रहा था कि एक ओर से दीपों के बात करने की आवाज़ सुनाई दी।

मैंने ध्यान लगा कर सुना। चार दीपक आपस में बात कर रहे थे। कुछ अपनी सुना रहे थे कुछ दूसरों की सुन रहे थे। पहला दीपक बोला, 'मैं हमेशा बड़ा बनना चाहता था, सुंदर, आकर्षक और चिकना घड़ा बनना चाहता था पर क्या करूँ ज़रा-सा दिया बन गया।'

दूसरा दीपक बोला, 'मैं भी अच्छी भव्य मूर्ति बन कर किसी अमीर के घर जाना चाहता था। उनके सुंदर, सुसज्जित आलीशान घर की शोभा बढ़ाना चाहता था। पर क्या करूँ मुझे कुम्हार ने छोटा-सा दिया बना दिया।'
तीसरा दीपक बोला, 'मुझे बचपन से ही पैसों से बहुत प्यार है काश मैं गुल्लक बनता तो हर समय पैसों में रहता।'

चौथा दीपक चुपचाप उनकी बातें सुन रहा था। अपनी बारी आने पर मुस्करा कर अत्यंत विनम्र स्वर में कहने लगा, 'एक राज़ की बात मैं आपको बताता हूँ, कुछ उद्देश्य रख कर आगे पूर्ण मेहनत से उसे हासिल करने के लिए प्रयास करना सही है लेकिन यदि हम असफल हुए तो भाग्य को कोसने में कहीं भी समझदारी नहीं हैं। यदि हम एक जगह असफल हो भी जाते हैं तो और द्वार खुलेंगे। जीवन में अवसरों की कमी नहीं हैं, एक गया तो आगे अनेक मिलेंगे। अब यही सोचो, दीपों का पर्व - दिवाली आ रहा है, हमें सब लोग खरीद लेंगे, हमें पूजा घर में जगह मिलेगी, कितने घरों की हम शोभा बढ़ाएँगे। इसलिए दोस्तों, जहाँ भी रहो, जैसे भी रहो, हर हाल में खुश रहो, द्वेष मिटाओ। खुद जलकर भी दूसरों में प्रकाश फैलाओ, नाचो गाओ, और खुशी-खुशी दिवाली मनाओ।:--नीरज त्रिपाठी

हार्दिक शुभकामनाएं।

दीपावली के शुभ अवसर पर आपको और आपके परिवार को मेरी  तरफ़ से हार्दिक शुभकामनाएं।
लक्ष्मी जी सदा आपके घर पर निवास करें और आप पर सुख समृद्दि की वर्षा हो।

इस दीपावली विशेष ध्यान दें:

* पटाखों का कम से कम प्रयोग करके, पर्यावरण को वायु प्रदुषण से बचाएं।
* बच्चों को अपनी उपस्थिति मे ही आतिशबाजी जलाने दें।
* आतिशबाजी जलाते समय पानी की बाल्टी पास मे रखें।
* आतिशबाजी जलाते समय सूती कपड़े पहने।
* अपनी जरुरत के मुताबिक ही सामान खरीदें, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बहकावे मे ना आएं।

सुख औ' समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, आते रहिए, पढते रहिए ......

Monday, November 1, 2010

‘हम तुम्हारे अब भी हैं’

कहने को तो हम, खुश अब भी हैं
हम तुम्हारे तब भी थे, हम तुम्हारे अब भी हैं

रूठने-मनाने के इस खेल में, हार गए हैं हम
हम तो रूठे तब ही थे, आप तो रूठे अब भी हैं

मेरी ख़ता बस इतनी है, तुम्हारा साथ चाहता हूँ
तब तो पास होके दूर थे, और दूरियाँ अब भी हैं

मुझसे रूठ के दूर हो, पर एहसास तो करो
प्यासे हम तब भी थे, प्यासे हम अब भी हैं

इस इंतज़ार में मेरा क्या होगा, तुम फिक्र मत करना
सुकून से हम तब भी थे, सुकून से हम अब भी हैं

बस थोड़ा रूठने के अंजाम से डरते हैं
डरते हम तब भी थे, डरते हम अब भी हैं

हमारी तमन्ना कुछ ज़्यादा नहीं थी, जो पूरी न होती
कम में गुज़ारा तब भी था, कम में गुज़ारते अब भी हैं

चलते हैं तीर दिल पे कितने, जब तुम रूठ जाते हो
ज़ख्मी हम तब भी थे, ज़ख्मी हम अब भी हैं

मेरी मासूमियत को तुम, ख़ता समझ बैठे हो
मासूम हम तब भी थे, मासूम हम अब भी हैं

आप हमसे रूठा न करें, बस यही इल्तिजा है
फ़रियादी हम तब भी थे, फ़रियादी हम अब भी हैं

तुम हो किस हाल में, कम से कम ये तो बता दो
बेखब़र हम तब भी थे, बेखब़र हम अब भी हैं


कोई आँसू बहाता है’

कोई आँसू बहाता है, कोई खुशियाँ मनाता है
ये सारा खेल उसका है, वही सब को नचाता है।

बहुत से ख़्वाब लेकर के, वो आया इस शहर में था
मगर दो जून की रोटी, बमुश्किल ही जुटाता है।

घड़ी संकट की हो या फिर कोई मुश्किल बला भी हो
ये मन भी खूब है, रह रह के, उम्मीदें बँधाता है।

मेरी दुनिया में है कुछ इस तरह से उसका आना भी
घटा सावन की या खुशबू का झोंका जैसे आता है।

बहे कोई हवा पर उसने जो सीखा बुज़ुर्गों से
उन्हीं रस्मों रिवाजों, को अभी तक वो निभाता है।

किसी को ताज मिलता है, किसी को मौत मिलती है
ये देखें, प्यार में, मेरा मुकद्दर क्या दिखाता है।


Thursday, October 28, 2010

शराबी युवा कैसे देंगे चीन और अमेरिका को टक्कर ?

आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,

आजकल के युवा, महाकवि हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला की इन पंक्तियों को मूर्त रूप देने में जुटे हुए हैं ये बात हम नहीं बल्कि एसोचैम द्वारा किए गए के सर्वे से साफ हुई है.

यूथ कल पर कुछ नहीं छोड़ना चाहता सब कुछ आज ही कर लेना चाहता है. मेट्रो शहरों के बारहवीं में पढ़ने वाले 45 पर्सेंट बच्चे महीने में कम से कम पांच से छह बार शराब पीते हैं. और तो और रहे पिछले 10 साल में टीनेजर्स के बीच शराब की खपत दोगुनी हो गई है.

टीनेजर्स में शराब का चलन सबसे ज्यादा दिल्ली और एनसीआर में है. इसके बाद मुंबई का नंबर है. एक स्टूडेंट साढ़े तीन से चार हजार रुपए शराब पर खर्च करता है. जबकि इतनी रकम वे सॉफ्ट ड्रिंक , चाय , दूध , जूस , कॉफी , मूवी टिकट और किताबों पर नहीं खर्च करते. 70 पर्सेंट टीनेजर्स फेयरवेल , न्यू ईयर , क्रिसमस , वैलंटाइन डे , बर्थडे और दूसरे अवसरों पर शराब पीते हैं। सर्वे के मुताबिक , एक तिहाई टीनेजर्स ने कॉलेज पहुंचने से पहले शराब पी ली थी , जबकि 16 पर्सेंट टीनेजर्स ने 15 साल से पहले ही हाला यानी शराब से दोस्ती कर ली थी.

ज्यादातर टीनेजर्स ने पहली बार शराब दोस्तों के साथ पी थी. इस मामले में लड़कियां भी पीछे नहीं हैं वो भी लड़कों को पूरी टक्कर दे रही हैं. लड़कियों में 40 पर्सेंट ने 15 साल से 17 साल की उम्र में पहली बार शराब पी थी. जिन लड़कियों को अल्कोहल का स्वाद पसंद नहीं , वे फ्रूट फ्लेवर्ड शराब पीती हैं.

आपने फीचर फिल्म कुली में आशा भोसले और शब्बीर कुमार को गाते हुए सुना होगा ….मुझे पीने का शौक नहीं पीता हूं गम भूलाने को.. ये फ़िल्मी गाना है लेकिन आजकल की युवा पीड़ी इसे सच साबित करने में दिन रात जुटी हुई है मजेदार बात है ज्यादातर टीनेजर शराब को टेंशन खत्म करने के लिए पीते हैं.

पर सवाल यह है कि क्या शराब हकीकत में टेंशन दूर भगाती है? आखिर युवा पीढ़ी में इतना दबाव क्यों है जो वो ऐसे रास्ते खोज रही है? इसके लिए कौन से बदलाव जिम्मेदार हैं? क्या हम युवा पीढ़ी को चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार नहीं कर पाए हैं? अगर नहीं तो उसे इसके लिए कैसे तैयार किया जाए? क्या युवा पीढ़ी सही दिशा में बढ रही है? या उन्हें सही दिशा में लाने के प्रयास होने चाहिए.

ये वो सवाल हैं जिनका जवाब समय रहते खोजना ज़रूरी है नहीं तो समाज के मूलभूत ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है. जिस यूथ के दम पर हम अमेरिका और चीन जैसे शक्तिशाली देशों से टक्कर लेने का सुंदर सपना सजा रहे हैं अगर हमारा वही यूथ नशे में डूबा होगा तो हम उनसे कैसे मुकाबला करेंगे.

आप कैसे युवा हैं ?

 (जिन्हें भारत एक गड़रियों का देश था पढ़ाया गया है जिन्हें ये पढाया गया है कि हिन्दू धर्म ग्रंथों में केवल कहानिया हैं और कुछ नहीं, कैसे युवा हैं आप ? )

हमारा देश वर्तमान में युवाओं का देश माना जा रहा है । अब ये अलग बात है कि कोई पच्चीस साल का होते हुए भी युवा होने की ताल नहीं ठोक सकता, और कोई पचास साल का होने के बाद भी युवाओं से स्वयं को कम नहीं मानता । शरीर विज्ञान के अनुसार तो अस्सी साल के बुजुर्ग के सम्मुख सत्तर साल के बुजुर्ग को युवा कहेंगे । हमारे भारत में तो "साठा सो पाठा" की कहावत इसीलिए चर्चित है कि यहाँ सभी अपने को युवा कहलाना चाहते हैं ।
पर मेरा सवाल अवस्था के परिप्रेक्ष में नहीं है, मेरा सवाल विचारों के परिप्रेक्ष में है । " आप कैसे युवा हैं" ? क्योंकि हमारा देश विविधताओं वाला है । यहाँ की विविधता केवल बोली-भाषा,प्रदेश,धर्म-संस्कृतियों के आधार पर ही नहीं है अपितु वैचारिक आधार पर भी होती है । जैसे ———

एक प्रकार के युवा, अंग्रेजी पढ़े हुए ही नहीं अपितु अंग्रेजी सोच भी रखने वाले जिन्हें स्वदेशी भाषा, धर्म,संस्कृति-संस्कार, ग्रन्थ-इतिहास आदि सब बकवास लगता है क्योंकि उन्हें उस प्रकार का आदर्श बनना है जैसा अंग्रेज नीतिकार मैकाले चाहता था। वो अपने को विकास वादी या प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष कहलाना पसंद करते हैं (यदि राजनीति में हों) । महंगे बान्डेड कपडे, घडी,चैन,जूते,चश्मा, लम्बी गाड़ी, विदेशी शैक्षिक डिग्रियां,लड़की-लड़के में भेद न समझना ही इनकी पहचान है । इनमे से अधिकतर को तो इससे कोई मतलब नहीं कि देश में क्या हो रहा है क्या नहीं । इनके मां-बाप इनका खर्च चलाते हैं क्योंकि वे किसी भी तरह से अनाप-शनाप कमाते हैं । ऐसे युवा थोड़े से भी शालीन हो जाते हैं तो राजनीति में सभी दलों में दिख जायेंगे ।

इन्हीं की नक़ल करके समाज के हर तबके में अपने आर्थिक स्तर के अनुरूप , मुहं में गुटका शाम को शराब, तौर-तरीके (स्टाईल) फ़िल्मी, राजनैतिक नेताओं के पीछे लग कर अपने लिए कुछ कमाई के साधन तलाशना इनकी मज़बूरी। या सरकारी नौकरी लग गयी तो सब बातों से निश्चिन्त हो कर जिंदगी जीना खूब आराम तलब हो कर कुछ सालों में बिमारियों का घर बनकर परेशान रहना ।

इन दोनों से अलग एक युवा वो हैं जिन्हें अपनी दाल-रोटी की चिंता भी है समाज-संस्कृति की चिंता भी है, देश की चिंता, राजनीति की चिंता, शिक्षा की चिंता, मतलब सभी का ठेका उसके पास ही है । मंदिर-मस्जिद पर लम्बी बहस हो या आतंकवादियों के मामले पर नुक्ताचीनी, फिल्मों पर चर्चा हो या खेलों पर, सब पर उसकी नजर रहती है । देश के पक्ष में कोई आन्दोलन चले तो सबसे पहले वह ही आंदोलित होता है ।

अब मुझे इनकी संख्याओं का पता तो नहीं है कि अधिक कौन हैं; पर ये प्रश्न जरुर मन में उठता है कि आप कैसे युवा हैं ? अपने देश,धर्म,संस्कृति,सभ्यता-समाज, संस्कार, इतिहास,ग्रंथों,को जानने वाले और इन पर गर्व करने वाले, या पश्चात्य संस्कृति में सराबोर मैकाले के आदर्श युवा ? जिन्हें भारत एक गड़रियों का देश था पढ़ाया गया है जिन्हें ये पढाया गया है कि हिन्दू धर्म ग्रंथों में केवल कहानिया हैं और कुछ नहीं, कैसे युवा हैं आप ?

 

Tuesday, October 26, 2010

मोहब्बत और अदब की शायरा मुमताज नाजां

'हमसफर खो गये...
जिंदगी की सुहानी सी वह रहगुजर
साथ साथ आ रहे थे मेरे वो मगर
आज जाने क्या हुआ मुझे छोड़कर
हाथ मुझसे छुड़ाकर वह गुम हो गये।
मैं भटकती रही जूस्तजू में यहां
और रोती रही मेरी तन्हाइयां
पर चट्टानों से टकराकर लौट आई जब
टूटते दिल के टुकड़ों की जख्मी सदा
जिंदगी की सुहानी सी वह रहगुजर'

ये पक्तियां शायरी के आसमान पर चमकते उस सितारे की हैं, जिसे अदब की दुनिया में मशहूर फनकार मरहूम अजीज नाजां के पत्‍नी के रूप में जाना जाता है। कानपुर की रहने वाली सुशिक्षित एवं कलम की धनी मुमताज नाजां को शायरी के खास अंदाज के लिए शेरो-शायरी की दुनिया में पहचाना जाता है।

मुमताज को बचपन से ही शायरी का शौक रहा है, लेकिन वह अपनी जिंदगी में शायर काबिल अजमेरी से विशेष रूप से प्रभावित रहीं या यूं भी कहा जा सकता है वे काबिल अजमेरी को अपना आदर्श भी मानती हैं। बचपन से ही शायरी की दुनिया में कदम रखने वाली मुमताज का कहना है कि दौर कैसा भी हो, शेर और शायरी के चाहने वालों की कभी कमी नहीं हो सकती।

मुमताज कहती हैं, 'मैं खुद 14 साल की उम्र से इस क्षेत्र से जुड़ी हूं। साथ ही, मेरे पति मरहूम अजीज नाजां खुद अपने वक्त में कव्वाली जगत के एक मशहूर फनकार थे। उनसे भी बहुत कुछ सीखने को मिला। मैंने उनके लिए कई मौकों पर कलाम लिखे। नात पाक, हम्द शरीफ, गज़ल, नज्म़ सभी मैं बाकायदा लिखती हूं। मेरे लेखन को परिवार की ओर से भी पूरा सहयोग मिला, जिसकी वजह से मैं अच्छा लिखने की कोशिश करती रही हूं।'
 
हुस्नो-इश्क की कंगी चोटी वाली शायरी को ज्यादा अहमियत नहीं देने एवं जदीद लबो-लहजे में अपना दर्द कागज पर उतारने वाली जिंदगी की सच्चाई और हालात का करब, इसके अलावा आदमी के लिए एक पैगाम उनकी शायरी की रूह हुआ करती है, जो उनके कलाम में नजर आता है...

'हसरतों के सिलसिले सोजे निहान तक आ गये।
हम नजर तक चाहते थे तुम तो जान तक आ गये।
रंग आरिज में न था या जुल्फ में खुशबू न थी
आप किसकी जूस्तजू में गुलिस्तान तक आ गये।
उनकी पलकों पर सितारे अपने होठों पर हंसी
किस्सा-ए-गम कहते कहते हम यहां तक आ गये।'
 
मुमताज को बचपन से ही अदबी माहौल मिला। अच्छी तरबियत की वजह से अच्छे शेर कहने वाली मुमताज को शादी के बाद भी वही माहौल मिला, जिसकी उन्हें आरजू थी। यही वजह है कि आज उनके बेटे मुजतबा नाजां संगीतकार होने के साथ-साथ एक अच्छे फनकार भी हैं। वह भी अपनी अपनी लिखी गजलें, नज़्म, नात और हम्द को अपने प्रोग्रामों में पढ़कर महफिल से वाहीवाही लूटते हैं। मुमताज का कहना है कि वह अपने कलामों में उन सभी बातों का ध्यान रखती हैं, जो लोग चाहते हैं। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान वह सरजमीन हैं, जिसमें शेर और शायरी के एक से बढ़कर एक कलमकार पैदा हुए हैं।

वे कहती हैं, 'मैं शेरो-शायरी के अलावा पेंटिंग और गाने-गुनगुनाने में भी खासी दिलचस्पी रखती हूं। मुझे फख्र है कि मैं हिन्दुस्तान जैसे दुनिया के सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष देश की निवासी हूं, जहां पर अनेक मजहब होने के बाद भी सब लोग एक सूत्र में बंधकर मुल्क की हिफाजत के लिए लड़ने-मरने को तैयार रहते हैं। इस बात को मैंने अपने देशभक्ति के कलामों में भी शामिल किया है।' जिंदगी की हकीकत को छूने वाले उनके ये अशआर लोग बहुत पसंद करते हैं...
 
'क्या क्या अजीब रंग बदलती है जिंदगी
हर लम्हे नये रूप में ढलती है जिंदगी
चलता है तू तो कदमों की आहट के साथ-साथ
पांव दबा के चुपके से चलती है जिंदगी
सांसों की धूप में जिस्म की लौ आग वफा की
एक शमां की मानिंद पिघलती है जिंदगी।'

Wednesday, October 20, 2010

Top 10 reasons why employees hate their boss

Bosses! Can't work with them, can't work without them. Everything seems to be fine when you join the job but if you are one of those fortunate ones, sooner or later your boss starts smirking in your nightmares.

A chat with employees working under tough projects and small teams who usually face tremendous work pressure will give us interesting insights about the bad bosses they have. Even in a company sans work pressure employees regularly bump into bad bosses. And their experiences are real bad [pardon me of your boss is really good] which they only share once they are in a new job. Good bosses are hard to find and employees hate their bad bosses for very many reasons. We at SiliconIndia did a survey to know why employees hate their boss. Listing the Top 10 reasons below:



1) Incompetent and unacknowledging - Employees hate bosses who doesn't have the essential competitive skills but still scorns the work they do. Whether or not the boss is competitive, the employee really longs for his good work to be acknowledged and not to be treated as a 'piece of crap'.

2) Privacy Invasion - 'He always keep guard about what I do, constantly checks out on the office phone about what I am busy at (an indirect way to know whether I am on a call with any acquaintance) and one day even peeped through the door to see what I am doing. Now I even doubt whether he is watching me once I reach home' says Anamika (name changed to protect identity). Now that's a real bad boss.

3) The narcissist boss - Employees hate bosses who acts as the 'know it all', who thinks they are second to none, hears nothing until it directly benefits him and so self obsessed to be called in the informal way 'a narcissist glory monger'.

4) Personal Insults - Bosses who torture employees with personal insults rather than choosing to reproach on the basis of their work quickly gets in the hate list. Many employees have long stories to say about bosses who frequently torture them with comments about their attitude and discriminate them deliberately.

5) The angry 'yelling' boss - You are the boss, thumbs up. But how on earth could you yell at me like that. Employees at some point or other meet the unfortunate fate of being victim to their boss' wrath. Justifiable the reason may be, but you are in my hate list boss.

6) The 'opportunist' boss - Employees obviously develops a dislike to their boss who refuses to mind them. But one day the same boss who never acknowledged your presence comes to you, smiles at you and the next thing you know, you are on an extra shift with heavy workload. Dislikes turn to hate for such opportunist bosses.

7) The 'tensed' boss - Employees tend to hate bosses who are always tensed and want them to finish of the work in a hurry. "He is so tensed and rushes things as if his head is on fire. His tension is so contagious that even we get tensed in his presence" Rahul, a software employee.

8) Stealing credits - Employees feel cheated and hate their boss when he or she steals the credit of their work but never forgets to blame them if something goes wrong.

9) Lack of clarity and feedback - Employees hate bosses who don't brief them properly and keep the employees ignorant with any real feedback on their work. And worse, employees are blamed for something which in turn would be the result of void feedback.

10) Lack of rapport - Employees hate bosses who lacks mutual respect and always play bossy without any real interest in befriending the employees.

Monday, October 18, 2010

धन का नशा सबसे खतरनाक...

धन का मोह ऐसा मोह है जिसने कई बार असंख्य लोगों की जान ली है। धन, संपत्ति के लोभ में कोई भी बहुत आसानी से फंस जाता है। धन को इसीलिए ही माया कहा जाता है। इस माया के चक्कर में जो फंसता है उसे परिवार, समाज और दुनिया से मतलब नहीं रह जाता। उसे तो बस धन ही धन दिखाई देता है।

मनुष्य धन के लालच में कई बार ऐसे कर्म कर बैठता है, जिसके लिए जीवन में उसे हमेशा पछताना पड़ता है। धन के नशे के संबंध में एक दोहा बहुत प्रचलित है:

कनक-कनक ते सौ गुनी,

मादकता अधिकाय।।

या खाये बोराय

वा पाए बोराय।।

अर्थात् यहां कनक शब्द के दो अर्थ है, कनक का मतलब सोना और धतूरा (सबसे नशीला फल) धतूरा के नशा उसे खाने के बाद ही होता है परंतु सोना पा लेने से उसका नशा हमारे सिर चढऩे लगता है।


Friday, October 15, 2010

हम नहीं वह जो करें दिल से फ़रामोश तुम्हें।

हम नहीं वह जो करें दिल से फ़रामोश तुम्हें


जानते अपना हैं हम जाने-दम-ब-होश तुम्हें


चश्मे-मस्त अपनी जो दिखलाए वो मयनोश तुम्हें
जाहिदो! होशो-ख़िरद का न रहे होश तुम्हें


कर चुके आहो-फ़ुगां जब्त तुम, ऐ हजरते-दिल
दम-ब-दम गर है मुहब्बत का यही होश तुम्हें


शब-ए-फ़ुरक़त में भी रहते हो बग़ल में मेरे
रखते हैं अपने तसव्वुर से हम-आग़ोश तुम्हें


आंखें सुरमा से हैं आलूदा तेरी, पूछ इनसे
किसके मातम ने किया है ये सियहपोश तुम्हें


शम्अ-सा गो कि सरापा हो जुबां तुम, लेकिन
देखता हूं ‘जफ़र’, इस बज्म में ख़ामोश तुम्हें



- ओम सारथी, बूंदी (राज)

Wednesday, October 13, 2010

क्या-क्या बना दिया.


सब जल चुका है आग में बाकी है अब धुआं,
धुंए को तुमने आँख का काजल बना दिया.
बुझता हुआ चिराग क्या रौशन करे जहाँ,
तुमने उसी चिराग को सूरज बना दिया.
अपने तो बीच धार में, किश्ती डुबो गए,
तुम कौन हो कि हमको किनारे पे ला दिया.
अच्छे थे या बुरे थे, जैसे थे हम मगर,
ऐसे नहीं थे आपने, जैसा बना दिया.
गर तुम बुरा न मानो तो, एक बात पूँछ लूं,
क्या-क्या बनाओगे अभी, क्या-क्या बना दिया.

Saturday, October 9, 2010

किसे याद हैं बाबा अलाउद्दीन खां!

 

 
 
अलाउद्दीन खां
अलाउद्दीन खां ने पश्चिमी शास्त्रीय संगीत भी सीखा था
मैहर दो बातों के लिए मशहूर है मां शारदा देवी के मंदिर और पद्म विभूषण उस्ताद बाबा अलाउद्दीन खां की कर्मभूमि के रूप मे. बाबा अलाउद्दीन खां का जन्म 1862 मे हुआ था पूर्वी बंगाल में जो आज बांग्लादेश है.

माना जाता है कि वो मियाँ तानसेन की शिष्य परंपरा के अंग थे. उनके कई मशहूर शिष्यों में पंडित रविशंकर और अली अक़बर ख़ान जैसे कलाकार शामिल हैं.

बाबा अलाउद्दीन खां की एक बड़ी उपलब्धि थी मैहर वाद्य वृंद का गठन जिसने न सिर्फ़ एक मुश्किल समय में मैहर के समाज को संगीत से रौशन किया बल्कि आज भी बाबा द्वारा निर्मित सैकड़ों राग रचनाओं का एक मात्र आईना है.

मैहर देखने में भारत के किसी भी क़स्बे से अलग नहीं है. लेकिन यहाँ माहौल में उस्ताद बाबा अलाउद्दीन खां की रूह बसती है. लोग उन्हें बाबा के नाम से ही पुकारते हैं, मानो एक निजी रिश्ता क़ायम करना चाहते हों, बाबा के साथ और मैहर की विरासत के साथ.

सवाल यह नहीं है कि ऐसा क्या था बाबा में, सवाल यह है कि ऐसा क्या नहीं था? बाबा अलाउद्दीन ख़ाँ को भारतीय संगीत का पितामह कहा जाता है.

और यह राह चलता आदमी भी यहाँ बता देता है कि बाबा जिस भी वाद्य को छूते वो उनका ग़ुलाम बन जाता था.

कहते हैं बाबा 200 से ज़्यादा भारतीय और पश्चिमी वाद्य बजाते थे. मगर अधिक जाने जाते थे सरोद, सितार वादन और अपनी ध्रुपद गायकी के लिए.

यादें

मैहर के महाराज बृजनाथ सिंह बीसवीं सदी की शुरुआत में उन्हें मैहर लाए थे. लेकिन बाबा जितना दरबार में बजाते थे उससे कहीं अधिक नियमित रूप से मां शारदा देवी के मंदिर में गाते थे.

बाबा के बेटे अली अकबर ख़ान मशहूर सरोद वादक हैं

बाबा की यादें या कहें तो मैहर का संगीत इतिहास आज किस्सों में ज़िंदा है. डॉक्टर कैलाश जैन का परिवार बाबा के क़रीब था.

वे कहते हैं जब उनकी सगाई हो रही थी तो बाबा को नहीं बुलाया गया था. लेकिन जब रात को सगाई में भैरवी गायी जा रही थी जो बाबा को सुनाई दी क्यों कि उनका घर नज़दीक ही था.

बाबा समारोह में पहुंचे और कहा यह इस समय का राग नहीं है. इस समय का राग मैं गा कर सुनाता हूं. और फिर उन्होंने दो घंटे गाया.

आज मैहर में बाबा अलाउद्दीन खां का घर उनकी सादा जीवन शैली और सर्वधर्म सरोकार का परिचय देता है. घर के दो नाम हैं-मदीना भवन और शांति कुटीर.

बाबा के कमरे में उनके वाद्यों के साथ दीवारों पर मढ़ी हैं उनके प्रसिद्ध शिष्यों की तस्वीरें. उनके बेटे और प्रख्यात सरोद वादक अली अकबर ख़ान और पंडित रविशंकर.

बाबा के शिष्यों की सूची तो यहाँ बस शुरु होती है, इसमें जुडते जाते हैं नाम, बांसुरी वादक पन्नालाल घोष, उनकी बेटी अन्नपूर्णा देवी जिन्होंने पंडित रविशंकर से शादी ही नहीं की बल्कि उन्हें सिखाया भी और पंडित हरि प्रसाद चौरसिया.

बाबा अलाउद्दीन खां ने केवल इन महान संगीतकारों को ही नहीं संवारा बल्कि मैहर को संगीत की ऐसी परंपरा दी जो आज भी क़ायम है.

वाद्य वृंद

मैहर वाद्य वृंद अपनी तरह का अनूठा ऑर्केस्ट्रा है. इसकी स्थापना का भी क़िस्सा है. डॉक्टर कैलाश जैन बताते हैं कि 1918-19 में मैहर में प्लेग की महामारी फैलने से कई लोग मारे गए और कई बच्चे अनाथ हो गये.

बाबा ने इन बच्चों को अपने घर में इकट्ठा किया और उनके गुणों के अनुसार उन्हें किसी ना किसी वाद्य को बजाने की शिक्षा दी और इसी तरह अस्तित्व में आया मैहर वाद्य वृंद.

बाबा अलाउद्दीन खां ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ पश्चिमी शास्त्रीय संगीत भी सीखा था और क्लेरनेट, वायलिन और चेलो जैसे पश्चिमी वाद्यों को अपने वाद्यवृंद में शामिल भी किया.

उन्होंने बंदूकों की नाल से एक अनूठे वाद्य नलतरंग का आविष्कार किया. हमने मैहर वाद्द वृंद के एक सदस्य जीपी पांडे से भी मुलाक़ात की और जानना चाहा क्या ख़ूबी है इस ऑर्केस्ट्रा की.

जीपी पांडे कहते हैं कि यह ऑर्केस्ट्रा आज भी बाबा की सैंकड़ों रचनाओं को ऐसे ही बजाता है जैसे बाबा के समय में बजाया जाता था.

यानी हर वाद्य से एक साथ एक ही सुर निकलता है और शायद यह एक मात्र ऐसा ऑर्केस्ट्रा है जिसमें वादक बिना नोटेशन या स्वरलिपि के बजाते हैं.

Tuesday, October 5, 2010

मौत का सफर

यह पीपली लाइव नहीं बल्कि एक गुमनाम मौत की कहानी है। 30 मिनट तक मौत से जूझते व्यक्ति की कहानी..। पीपली लाइव का नत्था भी व्यवस्था का शिकार था और उत्तरप्रदेश के बरेली निवासी इस गुमनाम की भी दास्तां कुछ ऐसी ही है। नत्था तो बच जाता है लेकिन इस कहानी के पात्र नत्था (काल्पनिक नाम) की मौत हो गई है। प्रशासनिक अफसरों की बेफिक्री और लापरवाही.. का ही नतीजा था कि दर्जनों तमाशबीन के सामने वह पानी में समाता गया और कोई कुछ नहीं कर सका। प्रशासन से आधी-अधूरी मदद भी तब मिली, जब उसकी सांसें थम गई थीं।

मौत से बेखबर



वक्त-शाम पांच बजे। स्थान-बदायूं रोड पर करगैना रोंधी मिलक की पुलिया। आमतौर पर यहां से करीब आठ किलोमीटर दूर बहने वाली रामगंगा इलाके में कहर बरपा रही थी। लोगों की भीड़ बाढ़ के नजारे देखने के लिए जुटी थी। बदायूं रोड पूरी तरह बंद थी। सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस रोंधी मिलक पुलिया के समीप तैनात थी। इसी बीच पानी की लहरों को चीरते हुए महेशपुरा की ओर से शहर की तरफ तीन ग्रामीण आते दिखे। तीनों ही अनजान थे। 30 साल के आसपास की उम्र के नत्था केसिर पर पोटली भी थी। उन्हें देखकर पुलिया पर कुछ हलचल हुई लेकिन तब तक तीनों ही पानी के तेज बहाव से घिर चुके थे।

बचाओ.. बचाओ..


वक्त- शाम 5.05 बजे। तीनों के सामने कोई रास्ता नहीं था। लिहाजा वे खतरा भांपने के बाद भी आगे ही बढ़ते रहे और इधर पुलिया पर मौजूद लोगों की धड़कनें बढ़तीं गई। आखिर में वही हुआ, जिसकी आशंका थी। किनारे पर पहुंचने से पहले अचानक सिर पर गमछा बांधे और कंधे पर पोटली रखे नत्था का पांव फिसला और वह पानी के तेज बहाव में बहने लगा। संभवत: नत्था तैरना नहीं जानता था। उसकी आंखों के सामने मौत नाच रही थी। फिर भी उसने जिंदगी की जद्दोजहद के बीच खुद को बचाने के लिए गुहार लगाई। तेज धार की गड़गड़हाट के बीच आधा किलोमीटर दूर खड़े लोगों को उसने मदद के लिए पुकारा। बचाओ.. बचाओ.. की आवाज गूंजी। अफसोस, कोई उसकी मदद की हिम्मत नहीं जुटा सका।


चलो जल्दी करो


शाम-5.16 बजे। सूरज डूब रहा था। प्रशासन की तरफ से कोई नहीं आया। फिर मिलक गांव के कुछ युवकों ने हिम्मत जुटाई और डूबते नत्था को बचाने के लिए पानी में कूद गए।


उम्मीद की किरण


करीब पांच मिनट तक तेज धार से जूझने के बाद युवक पानी में डूब रहे नत्था के पास पहुंचे। दूर से टकटकी लगा नजारा देख रही भीड़ की सांसों में सांस आई। एक उम्मीद की किरण जागी की शायद अभी भी जिंदा हो नत्था।


बढ़ते कदम


बहादुर युवकों ने नत्था को तुरंत ट्यूब में लिटाया और बिना समय गंवाएं बढ़ चले सुरक्षित किनारे की तरफ।




आखिर निशां



..लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी थी..। नत्था को जिला अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इस तरह बरेली का नत्था जिंदगी की जंग हार गया और बाकी बचे रहे गए निशान। बाढ़ के पानी में बहती नत्था की चप्पल।


Sourse: दैनिक जागरण

Wednesday, September 29, 2010

साईं अमृत वाणी






सुखदायक सिद्ध साईं के नाम का अमृत पी
दुख: से व्याकुल मन तेरा भटके ना कभी
थामे सब का हाथ वो, मत होई ये भयभीत
शिरडी वाला परखता संत जनों की प्रीत
साई की करुणा के खुले शत-शत पावन द्वार
जाने किस विध हो जाये तेरा बेडा पार
जहाँ भरोसा वहाँ भला शंका का क्या काम
तु निश्चय से जपता जा साई नाम अविराम
ज्योर्तिमय साई साधना नष्ट करें अंधकार
अंतःकरण से रे मन उसे सदा पुकार
साई के दर विश्वास से सर झुका नही इक बार
किस मुँह से फिर मांगता क्या तुझको अधिकार
पग पग काँटे बोई के पुष्प रहा तू ढूंढ
साई नाम के सादे में ऐसी नही है लूट
मीठा मीठा सब खाते कर-कर देखो थूक
महालोभी अतिस्वार्थी कितना मूर्ख तू
न्याय शील सिद्ध साई से जो चाहे सुख भी
उसके बन्दो तू भी न्याय तो करना सीख
परमपिता सत जोत से क्यूं तूं कपट करे
वैभव उससे मांग कर उसे भी श्रद्धा दे
साई तेरी पारबन्ध के बदले है सत्यालेक
कभी मालिक की ओर तू सेवक बनकर देख
छोड़ कर इत उत छाटना भीतर के पट खोल
निष्ठा से उसे याद कर मत हो डाँवाडोल
साई को प्रीतम कह प्रीत भी मन से कर
बीना प्रीत के तार हिले मिले ना प्रिय से वर
आनन्द का वो स्त्रोत है करुना का अवतार
घट घट की वो जानता महा योगी सुखकार

(
जय सांई राम)

 

Monday, September 27, 2010

नशे का शोंक नहीं जो इतनी हम पीते हैं

नशे का शोंक नहीं जो इतनी हम पीते हैं ,

इस मय के सहारे से बस , जी लेते हैं

दिल की बातो को छुपाना अपनी फितरत नही

वो राजदार और होंगें जो लबों को सीते हैं

वेसे मर चुके हैं सब शहर में अपनी अपनी नजरों में

तो ग़लत क्या हैं गर हम भी मुर्दों में जीते हैं

उन्हें तो शायद इल्म भी नही के सालों गुजर गए

यहाँ तो लम्हें भी गिन गिन के बीते हैं

कहानी बताता हैं कोई अपनी उस चोराहे पर यहाँ

घर तबाह कर के हमारा उन्होंने यहाँ घर ख़रीदे हैं

इस मय के सहारे से बस , जी लेते हैं !





जरा देखो मेरे रकीबो के चेहरों की खुशी

ठोकर लगकर गिरा हूँ वो कहते हैं के हम जीते हैं



कोई न बचानें बाला "साहिल" को बुरी आदतों से,

इसलिए रिन्दों में बैठकर भी पी लेते हैं

नशे का शोंक नहीं जो इतनी हम पीते हैं ,

इस मय के सहारे से बस , जी लेते हैं !

साभार: शिव कुमार "साहिल"

बहाने पीने के

नशे का शोंक नहीं जो इतनी हम पीते हैं ,

इस मय के सहारे से बस , जी लेते हैं !

पीने दे मुझे आज फिर साकी,पीने के तो बहाने  होते है,न पीने वाले क्या जाने,पीने वाले दीवाने होते है,महसूस करने के लिए अपनापन हों दिल में,ना पीनें वालो से वों बेगाने होते है,मिलना चाहो तो साथ देती है कुदरत भी,ना मिलने के हज़ार अफ़साने होते है,कहते है की मजबूर है वों खुद से,पर बाद में उन्हें ही हमारे किस्से सुनाने होते है,कहाँ जाए मयकदा छोड़ के हम,दुनिया क सारे गम यही तो भुलाने होते है,पीने दे मुझे आज फिर साकी,पीने के तो भने होते है!!!

Sunday, September 26, 2010

कॉरपोरेट जीवन में प्रगति के गुर

जब कॅरियर की बात आती है तो हर कोई अपनी भूमिका और जवाबदेही के लिहाज से आगे बढ़ना चाहता है। शिखर पर पहुंचने की राह कठिन जरूर है, लेकिन सही तौर-तरीके और कार्य संस्कृति को अपनाकर तेजी से इस दिशा में कदम बढ़ाए जा सकते हैं। यहां कुछ ऐसी बातें पेश हैं, जिनके जरिए आप अपने सहकर्मियों व वरिष्ठ अधिकारियों को प्रभावित कर सकते हैं।

मल्टीटास्किंग : आज के जटिल माहौल में मल्टीटास्किंग की उपयोगिता को नकारना मुश्किल है। बस ध्यान देने वाली बात यह है कि हर काम को सही तरह से और प्राथमिकतानुसार अंजाम दिया जाए। आपका लक्ष्य कम से कम करके रुक जाना नहीं होना चाहिए। अतिरिक्त कार्यभार तो लें, लेकिन यह भी ख्याल रहे कि इससे आपकी मौजूदा जिम्मेदारियां प्रभावित न हों।

नकारात्मकता से दूर : क्रोध, शिकायतें, इल्जाम लगाना, बुरा-भला कहने की आदत आपकी निर्णय क्षमता को प्रभावित करते हुए आपके काम पर नकारात्मक असर डाल सकती हैं। अपने सहकर्मियों का दोष निकालने से कोई फायदा नहीं होता। चुप रहें और अपने काम से काम रखें।

नेटवर्क बनाएं: नेटवर्क बनाना आज का मंत्र है। खुद को नेटवर्क में जरूर रखें। इसके लिए ऑफिस की मीटिंग, सहकर्मियों से बातचीत, दूसरी क्रियाओं और टीम लीडर्स के साथ सतत संपर्क बनाए रखें। अपने सहकर्मियों की लिस्ट को सिर्फ उसी फ्लोर तक सीमित न रखें, जहां आप बैठते हों। इस दायरे को आगे बढ़ाएं। यह काम वर्कशॉप और कांफ्रेंस के जरिए संभव है।

योग्यताएं बढ़ाएं : अपने मौजूदा काम के अलावा दूसरी योग्यताओं को हासिल करने की कोशिश करें, जिससे आगे जिम्मेदारियों का निर्वाह करने में मदद मिलेगी। ऐसी योग्यताओं को जानें और अध्ययन करें, जिन्हें हासिल करना कॅरियर के लिहाज से उचित है। इसके लिए लघु या अल्पकालिक कोर्स कर सकते हैं।

नियोजन : किसी भी काम को सफल व प्रभावी बनाने की मूल कड़ी है योजना बनाना। कोई नया काम, प्रोजेक्ट या पद मिलने पर एक निर्धारित समय के लिए एजेंडा तैयार कर लें। लाभ बढ़ाने, घाटा कम करने और प्रतियोगिता में बने रहने के नए-नए तरीके सोचें। इससे प्रमोशन के समय आप औरों से अलग खड़े नजर आएंगे।

साभार : दैनिक भास्कर  


Friday, September 17, 2010

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!
पूछेगा सारा गाँव, बंधु!

यह घाट वही जिस पर हँसकर,
वह कभी नहाती थी धँसकर,
आँखें रह जाती थीं फँसकर,
कँपते थे दोनों पाँव बंधु!
वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,

फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
देती थी सबमें दाँव, बंधु!
....सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

Tuesday, September 14, 2010

Happy Engineers' Day

I take the vision which comes from dreams
and apply the magic of science and mathematics,
adding the heritage of my profession
and my knowledge of nature's materials
to create a design.

I organize the efforts and skills of my fellow workers
employing the capital of the thrifty
and the products of many industries,
and together we work toward our goal
undaunted by hazards and obstacles.

And when we have completed our task
all can see
that the dreams and plans have materialized
for the comfort and welfare of all.


Centuries ago people who sacrificed their
sleep, food, laughter & other joys of life
were called "SAINTS"
Now they are called ENGINEERS……….

HAPPY ENGINEERS DAY

अरमान न रहा,

जो आपने न लिया हो, ऐसा कोई इम्तहान न रहा,
इंसान आखिर मोहब्बत में इंसान न रहा,
है कोई बस्ती, जहा से न उठा हो ज़नाज़ा दीवाने का,
आशिक की कुर्बत से महरूम कोई कब्रस्तान न रहा,

हाँ वो मोहब्बत ही है जो फैली हे ज़र्रे ज़र्रे में,
न हिन्दू बेदाग रहा, बाकी मुस्लमान न रहा,

जिसने भी कोशिश की इस महक को नापाक करने की,
इसी दुनिया में उसका कही नामो-निशान न रहा,

जिसे मिल गयी मोहब्बत वो बादशाह बन गया,
कुछ और पाने का उसके दिल को अरमान न रहा,

Monday, September 13, 2010

हिन्दी-दिवस की आप सभी को बधाई।

हिन्दी-दिवस की आप सभी को बधाई। १४ सितम्बर १९४९ को संविधान में हिन्दी को राष्ट्र भाषा स्वीकार किया गया था।
संसार के जितने भी राष्ट्र हैं सब अपनी भाषा को प्राथमिकता देते हैं और हम अपनी भाषा बोलने और सीखने में शर्म का अनुभव करते हैं। इसका भयानक परिणाम मैं नई पीढ़ी में देख रही हूँ। जो ना हिन्दी ठीक से पढ़ सकता है ना लिख सकता। और अंग्रेजी में पारंगत है। दोषी नई पीढ़ी नहीं दोषी हम लोग हैं। हमने उनको अपनी भाषा के संस्कार ही कहाँ दिए। हमने उसे अंग्रेजी बोलने के लिए ही प्रेरित किया। उसे कभी हिन्दी की विशेषताएँ नहीं बताई।
हमारी हिन्दी भाषा संसार की सर्वोत्तम भाषा है। इसकी वैग्यानिकता इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। जैसे बोली जाती है वैसे ही लिखी जाती है। तर्क संगत है। सुमधुर और सरल है। भूमावृति के कारण नित्य नवीन शब्दों को जन्म देने वाली है। एक-एक शब्द के कितने ही पर्याय वाची हैं। हर शब्द का सटीक प्रयोग होता है। अलग-अलग संदर्भों में एक ही शब्द नहीं , अलग-अलग शब्द हैं।
समन्वय की प्रवृति के कारण दूसरी भाषाओं के शब्दों को जल्दी ही अपने में समा लेती है। माँ के समान बड़े प्यार से सबको अपने आँचल में समा लेती है। यही कारण हैकि दूसरी भाषाओं के शब्द यहाँ आकर इसीके हो जाते हैं। फिर भी हम इसका लाभ नहीं उठा पा रहे। यह हमारा दुर्भाग्य ही तो है।
आज विश्व के अनेक देश हिन्दी के महत्व को समझ रहे हैं। इसके शिक्षण की व्यवस्था कर रहे हैं, गोष्ठियाँ कर रहे हैं और हम इसकी उपेक्षा कर रहे हैं।
हिन्दी-दिवस के अवसर पर मैं अपने देश वासियों को यही संदेश देना चाहूँगी कि यदि अपने स्वाभिमान और अपनी अस्मिता को बचा कर रखना है तो अपनी भाषा को महत्व देना सीखो। इसे ग्यान-विग्यान का वाहक बनाओ तथा इसमें संचित कोष का लाभ उठाओ। अपनी भाषा सीखो यही तुमको उन्नति दिलाएगी
यदि अपनी माँ भिखारिन रही तो पराई भी कुछ नहीं दे पाएगी।
जय भारत।