Thursday, January 5, 2017

कितने ख्वाब पिघलते हैं.

राहे-मोहब्बत तपती भूमि, जिस्मो-जान पिघलते हैं

आज वफ़ा के मारे राही अंगारों पर चलते हैं।

मेरे मन के नील गगन का रंग कभी ना बदलेगा

देखें तेरे रूप के बादल कितने रंग बदलते हैं।

देख रहे हैं सांझ-सवेरे दिलवालों की बस्ती से

अरमानों की लाशें ले कर कितने लोग निकलते हैं।

खुशियों के परबत पर जब भी गम का सूरज उगता है

आंसू बन कर फ़िर आंखों से कितने ख्वाब पिघलते हैं.


Sunday, December 18, 2016

क्‍या भूलूं क्‍या याद करूं

जीवन निर्झर में बहते किन
अरमानों की बात करूं
तुम्‍हीं बता तो प्रियवर मेरे
क्‍या भूलूं क्‍या याद करूं

भाव निचोड़ में कड़वाहट से
या हृदय शेष की अकुलाहट से
किस राग करूण का गान करूं
क्‍या भूलूं क्‍या याद करूं

भ्रमित पंथ के मधुकर के संग
या दिनकर की आभा के संग
किस सौरभ का पान करूं
क्‍या भूलूं क्‍या याद करूं

उजड़े उपवन के माली से
प्रस्‍तुत पतझड़ की लाली से
किस हरियाली की बात करूं

क्‍या भूलूं क्‍या याद करूं

Thursday, June 9, 2016

नज़र आ रहा है!



बड़ी मिन्नत से माँगा था ख़ुदा से तुझे,
आज वो भी कुछ लुटा सा नज़र आ रहा है!



बनवाने वाले ने ताज़महल बनवा डाला,
मुझे तो वो बस पत्थर सा नज़र आ  रहा है!



तुम ग़ज़ल लिख लो, शेर-ओ-शायरी कर लो,
मेरी नज़्में ना समझो तो अपने दिल की ख़बर पुछ लो!




Thursday, May 12, 2016

मैंने ज़िन्दगी देखी है

रोज़ रात सजती महफ़िलों में
अक्सर ख़ामोश तनहाई देखी है
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है

फ़क़त हँसाना जिनका पेशा है
उनकी आँखों में नमी देखी है
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है

इक जनाज़े को कंधा दिया एक दिन
क्या होती है किसी की कमी, देखी है
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है

कल तमाम रात रोते हुए गुज़री
सुबह बिस्तर पे फ़िज़ा शबनमी देखी है
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है

उन दिनों
जब मैं दर्द से तड़पता था
कई दिलों में सुकूँ
कई चेहरों पे हँसी देखी है॥
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है

वो जो दुनिया को ख़ाक़ करने चले थे
जहाँ दबे हैं वे
वो ज़मीं देखी है
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है

Friday, April 8, 2016

मगर हारना पड़ा

थी मुफ़लिसी तो मन को मुझे मारना पड़ा
था जीतने का दम भी मगर हारना पड़ा

फैले हुए वो हाथ भिखारे के देखकर
कितनी ही देर तक मुझे विचारना पड़ा

उतरी नहीं थी बात कभी जो मिरे गले
उसको भी आज दिल तलक़ उतारना पड़ा

जान से अज़ीज़ थे, दिल के क़रीब थे
कितने हसीन थे, जिन्हें बिसारना पड़ा

सब जानते हुए भी मैं नादां बना रहा
वक्त मुझको ऐसा भी गुज़ारना पड़ा