अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और जीवन-कर्म के बीच की दूरी को निरंतर कम करने की कोशिश का संघर्ष....
Thursday, January 5, 2017
कितने ख्वाब पिघलते हैं.
Sunday, December 18, 2016
क्या भूलूं क्या याद करूं
Thursday, June 9, 2016
नज़र आ रहा है!
बड़ी मिन्नत से माँगा था ख़ुदा से तुझे,
आज वो भी कुछ लुटा सा नज़र आ रहा है!
बनवाने वाले ने ताज़महल बनवा डाला,
मुझे तो वो बस पत्थर सा नज़र आ रहा है!
तुम ग़ज़ल लिख लो, शेर-ओ-शायरी कर लो,
मेरी नज़्में ना समझो तो अपने दिल की ख़बर पुछ लो!
Thursday, May 12, 2016
मैंने ज़िन्दगी देखी है
रोज़ रात सजती महफ़िलों में
अक्सर ख़ामोश तनहाई देखी है
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है
फ़क़त हँसाना जिनका पेशा है
उनकी आँखों में नमी देखी है
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है
इक जनाज़े को कंधा दिया एक दिन
क्या होती है किसी की कमी, देखी है
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है
कल तमाम रात रोते हुए गुज़री
सुबह बिस्तर पे फ़िज़ा शबनमी देखी है
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है
उन दिनों
जब मैं दर्द से तड़पता था
कई दिलों में सुकूँ
कई चेहरों पे हँसी देखी है॥
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है
वो जो दुनिया को ख़ाक़ करने चले थे
जहाँ दबे हैं वे
वो ज़मीं देखी है
सच कहूँ
मैंने ज़िन्दगी देखी है
Friday, April 8, 2016
मगर हारना पड़ा
थी मुफ़लिसी तो मन को मुझे मारना पड़ा
था जीतने का दम भी मगर हारना पड़ा
फैले हुए वो हाथ भिखारे के देखकर
कितनी ही देर तक मुझे विचारना पड़ा
उतरी नहीं थी बात कभी जो मिरे गले
उसको भी आज दिल तलक़ उतारना पड़ा
जान से अज़ीज़ थे, दिल के क़रीब थे
कितने हसीन थे, जिन्हें बिसारना पड़ा
सब जानते हुए भी मैं नादां बना रहा
वक्त मुझको ऐसा भी गुज़ारना पड़ा
