साल 1914 में अमेरिका में फैक्ट्री मज़दूरों को औसतन $2–$3 प्रति दिन वेतन मिलता था और काम के घंटे 9–10 घंटे होते थे।
फोर्ड मोटर कंपनी में नई असेंबली लाइन शुरू हो चुकी थी, लेकिन काम बहुत उबाऊ और थकाने वाला था। नतीजा यह हुआ कि कर्मचारी बड़ी संख्या में नौकरी छोड़ने लगे।
तभी हेनरी फोर्ड ने एक चौंकाने वाला फैसला लिया।
उन्होंने घोषणा की कि फोर्ड कंपनी में काम करने वाले मज़दूरों को अब 8 घंटे के काम के लिए $5 प्रति दिन मिलेंगे — जो उस समय दुनिया में सबसे ज़्यादा वेतन माना जाता था।
लोगों को लगा फोर्ड पागल हो गए हैं।
अख़बारों ने इसे “सोने की दौड़” कहा और हज़ारों लोग नौकरी के लिए डेट्रॉइट पहुँच गए।
लेकिन हेनरी फोर्ड के पास एक गहरी सोच थी।
हेनरी फोर्ड की सोच
हेनरी फोर्ड कहते थे:
“अगर मज़दूर अच्छा कमाएगा, तो वह वही गाड़ी खरीद सकेगा जो वह बनाता है।”
ज़्यादा वेतन देने से:
- कर्मचारी नौकरी छोड़ना बंद कर गए
- उत्पादन और गुणवत्ता बढ़ी
- ट्रेनिंग का खर्च कम हुआ
- मज़दूर खुद ग्राहक बन गए
- कारों की बिक्री तेज़ी से बढ़ी
हेनरी फोर्ड ने बाद में कहा कि यह फैसला
“हमारा सबसे अच्छा लागत‑कम करने वाला निर्णय था।”
परिणाम
- कर्मचारी पलायन लगभग खत्म हो गया
- दूसरी कंपनियों को भी वेतन बढ़ाना पड़ा
- फैक्ट्री मज़दूर मिडिल क्लास में आने लगे
- 8 घंटे का कार्यदिवस और लिविंग वेज की सोच को बढ़ावा मिला
सीख
हेनरी फोर्ड ने सबसे ज़्यादा सैलरी दान के लिए नहीं दी थी।
उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे जानते थे:
लोगों में निवेश करने से — निष्ठा, उत्पादकता और विकास अपने आप आता है।
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