आज के तेज़ रफ्तार और तकनीक‑प्रधान समय में अक्सर यह सवाल उठता है—
क्या साहित्य की आज भी कोई ज़रूरत है?
जब हर जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध है, जब वीडियो और रील्स कुछ ही सेकंड में मनोरंजन कर देती हैं, तब किताबें, कविताएँ और कहानियाँ क्यों पढ़ी जाएँ?
इस सवाल का उत्तर बहुत सीधा है—
क्योंकि साहित्य हमें इंसान बनाए रखता है।
🔹 साहित्य: शब्दों से कहीं आगे
साहित्य सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं है।
यह मनुष्य के अनुभव, संवेदना, संघर्ष और सपनों की अभिव्यक्ति है।
जहाँ विज्ञान हमें यह सिखाता है कि कैसे जीना है,
वहीं साहित्य हमें सिखाता है कि
क्यों और किस तरह इंसान बनकर जीना है।
साहित्य हमें सोचने की शक्ति देता है—
न सिर्फ अपने बारे में, बल्कि दूसरों के बारे में भी।
🔹 संवेदनशीलता: समाज की सबसे बड़ी ज़रूरत
आज समाज में जो सबसे तेज़ी से घट रहा है,
वह है संवेदनशीलता।
- हम ख़बर पढ़ते हैं, लेकिन महसूस नहीं करते
- दुख देखते हैं, लेकिन रुकते नहीं
- समस्याएँ जानते हैं, लेकिन समझते नहीं
यहीं साहित्य की भूमिका शुरू होती है।
एक कहानी हमें किसी ग़रीब के दर्द से जोड़ देती है,
एक कविता किसी अनकहे भाव को आवाज़ दे देती है,
और एक उपन्यास हमें किसी और की ज़िंदगी कुछ देर के लिए जीने का अवसर देता है।
🔹 साहित्य और सहानुभूति (Empathy)
जब हम किसी पात्र के साथ हँसते‑रोते हैं,
तो हम अनजाने में सहानुभूति सीख रहे होते हैं।
साहित्य हमें सिखाता है:
- दूसरे के दृष्टिकोण से देखना
- बिना बोले भाव समझना
- और बिना शर्त स्वीकार करना
यही गुण किसी समाज को
संवेदनशील, सभ्य और मानवीय बनाते हैं।
🔹 इतिहास, संस्कृति और पहचान का संरक्षक
अगर साहित्य न होता, तो:
- हमारी भाषा खो जाती
- हमारी संस्कृति बिखर जाती
- और हमारी पहचान धुँधली पड़ जाती
साहित्य:
- हमें हमारे अतीत से जोड़ता है
- वर्तमान को समझने में मदद करता है
- और भविष्य के लिए सोचने की दिशा देता है
कबीर, प्रेमचंद, निराला, महादेवी, दिनकर—
ये सिर्फ लेखक नहीं,
समाज के दर्पण हैं।
🔹 युवा पीढ़ी और साहित्य
आज यह कहा जाता है कि युवा साहित्य से दूर हो रहे हैं।
लेकिन सच यह है कि
युवा साहित्य से नहीं, साहित्य की पहुँच से दूर हो रहे हैं।
अगर साहित्य:
- सरल भाषा में हो
- आज की समस्याओं से जुड़ा हो
- और ईमानदारी से लिखा गया हो
तो युवा आज भी उससे जुड़ते हैं।
क्योंकि हर युवा के भीतर:
- सवाल हैं
- बेचैनी है
- और कुछ बदलने की इच्छा है
और साहित्य इन्हीं भावनाओं की ज़मीन है।
🔹 साहित्य बनाम सूचना
सूचना हमें तेज़ बनाती है,
लेकिन साहित्य हमें गहरा बनाता है।
सूचना जवाब देती है,
साहित्य सवाल उठाता है।
और एक बेहतर समाज वही होता है,
जो सवाल पूछने की हिम्मत रखता है।
🔹 निष्कर्ष: संवेदनशील समाज की नींव
अगर हमें:
- एक बेहतर समाज चाहिए
- ज़्यादा समझदार नागरिक चाहिए
- और इंसानियत से भरा भविष्य चाहिए
तो साहित्य को सिर्फ पाठ्यक्रम में नहीं,
जीवन में जगह देनी होगी।
क्योंकि:
जहाँ साहित्य जीवित रहता है,
वहाँ समाज संवेदनशील रहता है।
और
संवेदनशील समाज ही
सच में प्रगति करता है।
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