Wednesday, October 3, 2018

प्यार-प्यार सा मिल जाना।

कविता बेहद कोमल, भावनाओं से भरी और लयात्मक हैजैसे प्रेम की हर छोटी-छोटी अनुभूति को शब्दों में पिरो दिया गया हो। मैंने आपकी मूल भावनाओं को सहेजते हुए इसे थोड़ा तराशा है ताकि प्रवाह और सौंदर्य और भी निखर सके:

 

हल्के-हल्के हाथों से तुम्हारा
हल्का-हल्का वो सहलाना,
बहके-बहके मौसम में हमारा
धीरे-धीरे बहक जाना।

ठंडी-ठंडी साँसों में तुम्हारा
ठंडा-ठंडा वो जादू,
भीगी-भीगी बातों में मेरा
भीगा-भीगा अफ़साना।

प्यारे-प्यारे जज़्बातों में तुम्हारा
प्यारा-प्यारा खिल जाना,
ख्वाब-ख्वाब सी चाँदनी में
ख्वाब-सा हो जाना।

रात-रात की तन्हाई में हमारा
रात-रात भर ना सोना,
कली-कली की ख़ुशबू में मेरा
कली-कली सा बिखर जाना।

प्यार-प्यार की बातों में हमारा
प्यार-प्यार सा मिल जाना।

 

Friday, September 14, 2018

प्रेम की अनुगूँज है।

प्रेम एक अनुभूति है
शाश्वत रिश्तों के मर्म की
सुर्ख जोड़े में लिपटे गर्व की
विरक्ति से उपजे दर्द की
प्रेम अनुभूति है।

प्रेम एक रिश्ता है
दिलों के इकरार का
ममत्व के दुलार का
मानवता की पुकार का
प्रेम एक रिश्ता है।

प्रेम दिखता है
किसी मासूम-सी मुस्कान में
नवविवाहिता की माँग में
वीरों की आन-बान में
प्रेम दिखता है।

प्रेम की अनुगूँज है
दिल के झंकृ‍त तारों में
बागों में बहारों में
फागुन की मस्त फुहारों में
प्रेम की अनुगूँज है।

sabhar- विनीता मोटलानी

Thursday, August 9, 2018

सबसे पहली चिड़िया की कहानी


सबसे पहली कहानी मैंने चिड़िया की सुनी थी जो दाल का दाना चुगकर लाती है और चावल का दाना चुगकर लाए कौवे के साथ मिलकर खिचड़ी बनाती है। कौआ चिड़िया को नहाने भेज देता है और अपने हिस्से की खिचड़ी खाने के बाद चिड़िया के हिस्से की खिचड़ी भी चट कर जाता है।

इस कहानी ने सहज ही चिड़िया के प्रति एक आत्मीयता जगा दी। सुबह से शाम तक घर में उसकी चहचहाट मोहक लगती थी। घर में ही उसका घोंसला था। चिड़िया और शायद उसका चिड़ा जब अपने नन्हे बच्चे के लिए चोंच में भरकर कुछ लाते थे और वात्सल्य और ममता से उसे खिलाते थे तो एक अजब विस्मय रचते थे। वे उसे उड़ना सिखाते थे। उससे अपनी भाषा में शायद बात करते थे और थोड़े-थोड़े अंतराल पर हमारे घर में चिड़िया के साथ-साथ एक मोहक चहचहाट उतरा करती थी। आज सोचता हूँ तो लगता है कि वह सब कितना सुंदर था।

चिड़िया हमारे करीब रखे दाने चुगती थी लेकिन हमारे जरा से हिलने से भी घबरा उठती थी और फुदककर कपड़े सुखाने के तार पर जा बैठती थी। घर में कोई एक दो नहीं बीसियों चिड़ियाँ उतर आती थीं। फुदकती थीं। चुगती थीं और उड़ जाती थीं।

दुनिया में मनुष्यों के अलावा तमाम पशु-पक्षियों का दिन भोजन की तलाश में ही बीतता है। नन्ही गौरेया के साथ भी ऐसा ही होता होगा। लेकिन पता नहीं क्यों उनके भोजन इकट्ठा करने, सहज आवेग के साथ घोंसला बनाने के लिए तिनका लाने के लिए उड़ने और फिर तेजी से लौटकर उसे दूसरे तिनकों के साथ जोड़कर रख देने में हमें एक आत्मीय खेल नजर आता रहा है पर जब हम नन्ही गौरेया की मेहनत का हिसाब लगाते हैं तो उसके नन्हे सामर्थ्य को देखकर द्रवित हो जाते हैं

उसका फुदकना, नृत्य करना, गर्दन घुमाकर और उठाकर देखना, फुर्ती और चौकन्नापन हमारे बचपन के घरों में चहक और खुशी भरता रहा है।

आज गौरेया हमारे घरों से गायब होती जा रही हैं। जैसे बड़े शहरों में तो उनकी संख्या तेजी से घट रही है। यही हालात रहे तो हो सकता है चिड़िया कविताओं और चित्रों में ही सीमित होकर रह जाए और आने वाली पीढ़ियाँ चिड़ियों के चित्रों को देखकर उस तरह विस्मित हों जैसे हम डायनासोरों के चित्रों को देखकर आश्चर्य से भर उठते हैं।

क्या पता? लेकिन यह एक सच्चाई है जिसे महानगरों में रहने वाले हम लोग जानते हैं। दुनिया भर में गौरेया कम हो रही हैं। विदेशों में लोग जानते हैं कि कितने वर्षों में कितनी चिड़िया कम हुई हैं लेकिन हमारे देश में इसका कोई अध्ययन नहीं हुआ है।

संतोष की बात है कि सरकार का ध्यान अब इस ओर गया है और उसने शानिवार 20 मार्च को दिल्ली में गौरेया दिवस मनाने का फैसला किया। नेचर फॉरएवर सोसायटी ने कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सहयोग से इस दिवस को शहर में गौरेया की संख्या में तेजी से आ रही कमी पर केंद्रित कर दिया है और लोगों से कहा है कि वे सोचें कि यह घरेलू नन्ही चिड़िया आखिर क्यों गायब होती जा रही है और हम सब मिलकर क्या करें कि हमारे शहरों में गौरेया और उसकी मासूम चहचहाट बनी रहे।

ऐसे ही गिद्ध भी तेजी से गायब हो रहे हैं और आज उनकी इतनी कम संख्या बची है कि मरे हुए जानवरों के सड़े हुए माँस को सफाचट कर हमारे पर्यावरण को साफ और संतुलित रखने की समस्या बनी हुई है।

बढ़ता औद्योगिकीरण, शहरीकरण और फसलों में कीटनाशकों का अंधाधुँध प्रयोग गिद्धों की मौत और उनके गायब होने के कारण रहे हैं। शुक्र है कि पिछले सालों में गिद्धों की एक ऐसी प्रजाति जिसे विलुप्त मान लिया गया था, फिर से देखने में आई और पर्यावरण प्रेमी इस बात से खुश हुए कि प्रकृति ने मरे हुए ढोर-डंगरों आदि को खाने का जो काम एक तरह के सफाईकर्मी पक्षी गिद्ध को सौंपा है, वह अभी बचा हुआ है।

Thursday, July 19, 2018

प्रिय, तुम मेरे संग एक क्षण बाँट लो....

 
 
 

कविता बेहद कोमल, भावनात्मक और कल्पनाओं से सजी हुई हैजैसे किसी प्रिय को याद करते हुए हर स्मृति को सहेजने की कोशिश हो। मैंने आपकी मूल भावना को बनाए रखते हुए इसे थोड़ा तराशा है ताकि प्रवाह और भाव और भी गहराई से उभर सकें:

प्रिय, तुम मेरे संग एक क्षण बाँट लो
वो क्षण आधा मेरा होगा,
और आधा तुम्हारी गठरी में
नटखट बन जो खेलेगा मुझ संग,
तुम्हारे स्पर्श की गंध लिए।

प्रिय, तुम ऐसा एक स्वप्न हार लो
जो कह जाए बात तुम्हारे मन की,
मेरे पास आकर चुपके से
जब तुम सोते होगे भोले बन,
सपना खेलता होगा मेरे नयनों में।

प्रिय, तुम वो रंग आज ला दो
जो उस दिन तोड़ा था तुमने,
और छल से दिखाया था मुझे
बादलों के झुरमुट के पीछे
झलकते इन्द्रधनुष के : रंग।

प्रिय, तुम वो बूँद रख लो सँभाल कर
जो मेरे नयनों के भ्रम में
बस गई थी तुम्हारी आँखों में
उस खारी बूँद में ढूँढ लेना
कुछ चंचल, सुंदर क्षण स्मृतियों के।

प्रिय, तुम...

 

Wednesday, May 9, 2018

स्वीकृति- कविता,

कविता एक गहरी आत्मीयता और समर्पण की भावना से भरी हुई हैजैसे किसी आत्मा ने दूसरी आत्मा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया हो। मैंने आपकी मूल भावना को बनाए रखते हुए इसे थोड़ा तराशा है ताकि प्रवाह और भाव और भी स्पष्ट हो सकें:

 

स्वीकृति दी मैंने आज
तुम्हारे हृदय को
मेरे हृदय-स्वर में
थिरकने की स्वीकृति दी मैंने आज।

तुम्हारी स्मृति को
मेरे रक्तिम स्वर्ण-गंगा में
बहने की स्वीकृति दी मैंने आज।

तुम्हारी आत्मा को
मेरे अंत:करण की गहराइयों में
उतरने की स्वीकृति दी मैंने आज।

तुम्हारे स्वर को
मेरे अपूर्ण रचित राग की
अंतिम श्रुति बनने की स्वीकृति दी मैंने आज।

तुम्हारे मन को
मेरे व्यथित मन की पीड़ा
हरने की स्वीकृति दी मैंने आज।

यह मेरे जीवन का
एक अनमोल क्षण है
कि स्वीकृति दी मैंने आज
अपने आपको
तुम्हें अर्पण करने की।