Thursday, April 12, 2018

शायद पढ़ लोगी तुम कही ?-कविता

 

 

कविता बेहद भावुक और खूबसूरत हैएक गहरी याद, एक अधूरी मुलाक़ात, और एक उम्मीद की झलक लिए हुए। मैंने आपकी मूल भावना को बरकरार रखते हुए इसे थोड़ा तरतीब और प्रवाह देने की कोशिश की है।

 

वक़्त के मोड़ों पर
कई बार
बेसबब ही रुका हूँ,
ये सोचकर
कि शायद
कहीं मिल जाओ तुम...

तुम्हारे शहर के एयरपोर्ट से जब भी गुज़रता हूँ,
वेटिंग लाउंज में, बाहर चेहरों की भीड़ को
देखकर सोचता हूँ
क्या पता,
तुम किसी को छोड़ने जाओ...

शहर की दुकानों के बीच से
झाँकते हुए गुज़रता हूँ,
कि शायद किसी गोलगप्पे की दुकान पर
'खट्टा-मीठा पानी' पीती हुई
दिख जाओ तुम,
या सड़क किनारे किसी मेहंदी वाले से
नए डिज़ाइन में उलझी हुई...
या किसी होटल के वेटर से
"रेसिपी" पूछती हुई...

क्या अब भी बारिशों में
मोटरसाइकिल के पीछे बैठकर
शोर मचाती होगी तुम?
क्या अब भी सर्दियों में
काँपते हुए आइसक्रीम खाती होगी तुम?
क्या अब भी सिगरेट छीनकर
लंबे-लंबे कश लेकर खांसती होगी तुम?
क्या अब भी
खुले बालों में अच्छी लगती होगी तुम?

कैसी होगी तुम?
साड़ी पहनने का बहाना ढूँढती थी उन दिनों,
तब ब्लैक साड़ी फ़ेवरेट थी तुम्हारी...
आजकल मेरी है।

कभी किसी को छोड़ने जाओ...

सिगरेट की डिब्बी पर लिखे
कुछ बेतरतीब से लफ़्ज़...
कई बार ये सोचकर ही लिख लेता हूँ
कि शायद पढ़ लोगी तुम... कहीं।

 

Thursday, March 29, 2018

दर्द-ए-ग़म-कविता

हर मोड़ पर ज़िंदगी ने इम्तिहान लिया है,
हमने भी हर बार हँसकर उसे सलाम किया है।
जो टूटा है अंदर कहीं, वो दिखाया नहीं,
पर हर दर्द को हमने कलम से बयान किया है।

जिन्हें हमसफ़र समझा, वो रास्ता बदल गए,
हम फिर भी अकेले चलने का हौसला रख सकते हैं।
हर आँसू को मोती बना लिया है हमने,
अब ज़ख्म भी मुस्कुरा कर सह सकते हैं।

जो खो गया है, उसका ग़म नहीं करते,
जो पास है, उसे ही जश्न बना सकते हैं।
ज़िंदगी से शिकवा नहीं कोई अब हमें,
हर हाल में जीना हम सिखा तो सकते हैं।

 

Thursday, February 22, 2018

मेहनत से वो मंज़िल पाएँगे —गीत गजल कविता

हम मुश्किलों से टकराकर मुक़द्दर बनाएँगे,
जहाँ गिरती हैं बिजलियाँ, वहीं आशियाँ बसाएँगे।
राह में जो आएँगे पत्थर, रुकावट नहीं बनेंगे
हम ठोकरों से उन्हें रेत में बदल जाएँगे।

हर आँधी से कह देंगेअब डर नहीं लगता,
हमने तूफ़ानों में भी दीपक जलाए हैं।
छाँव की चाह नहीं अब हमें,
हमने धूप में चलकर रास्ते बनाए हैं।

जो आज हँसते हैं हमारी कोशिशों पर,
कल वही तालियाँ बजाएँगे।
हम अपनी मेहनत से वो मंज़िल पाएँगे
जिसे किस्मत भी सलाम ठोकने आएगी।

 



Wednesday, February 7, 2018

प्यार... एक एहसास-कविता

प्यार...
क्या है यह?
सिर्फ़ एक लफ़्ज़ नहीं,
जिसे बाँध लिया जाए
किसी सीमा में,
और खत्म कर दिया जाए
उसकी अंतहीनता को।

प्यार...
कोई वस्तु नहीं,
यह तो एक एहसास है —
एक मौन आश्वासन,
जो धीरे-धीरे
दिल में उतरता है,
मुक्त गगन-सा विचरता है,
और शब्दों को कविता बना देता है।

प्यार...
नयनों में बसा एक सपना है,
जो अनुराग के रंगों से रंगा होता है।
यह चहकता है पक्षी-सा,
अंधेरों को उजालों से भरता है,
नदी-सा कल-कल करता
एक बूँद को सागर बना देता है।

प्यार...
मिलता है सिर्फ़
उस दिल की धड़कन पर,
जहाँ "मैं" से "तू" का सफ़र
एक हो जाता है।
जहाँ अस्तित्व की सीमाएँ मिट जाती हैं,
और काँटों भरी राह भी
फूलों-सी महकने लगती है।

Thursday, January 11, 2018

मन के इतवार - गीत गजल

तन तो मेरा है, पर मन पर अधिकार तुम्हारा है।
हर धड़कन में बसी, बस एक पहचान तुम्हारा है।

मेरी साँसों में महकती,
तेरी चाहत की चंदन-सी खुशबू है;
कहने को तो हृदय मेरा है,
पर इसमें धड़कनें सिर्फ़ तेरे नाम की गूंजती हैं।

तेरी आँखों से जो छलकता है
वो प्रेम, वो अपनापन, बस हमारा है।

मेरे गीतों के हर शब्द में,
तेरी पीड़ा की गूंज है समाई;
कलिकाएँ भी महसूस करती हैं,
भ्रमरों की वो मौन रुलाई।

मैं मुरली की वो धुन हूँ
जिसमें हर स्वर तुम्हारा है।

मिलने की चाह बहुत है,
पर समय की दीवारें आड़े आती हैं;
कुछ दोष नियति का भी है,
जो राहें हमें मिलाने से कतराती हैं।

सोम से शनि तक जीवन मेरा है
पर इतवार सिर्फ़ तुम्हारा है।