Thursday, December 10, 2015

अधिक वेतन खुशी की सोगात नहीं

कहते हैं कि पैसे से हर खुशी खरीदी जा सकती है। मगर ऐसा है नहीं, एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि वेतन बढ़ने के साथ जिंदगी में खुशी के बढ़ने की भी एक सीमा है।

अधिक वेतन पाने वाले लोगों की जिंदगी से खुशियां भी कम हो जाती हैं।
अध्ययन के दौरान इन लोगों के वेतन और इनकी जिंदगी की खुशियों के बारे में जाना गया। इसके बाद शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे कि खुशियों का बहुत ज्यादा ताल्लुक वेतन से नहीं है।

इस अध्ययन में पाया गया कि 50,000 पाउंड प्रति वर्ष वेतन पाने वाले बेहद खुश और अपने जीवन से संतुष्ट दिखाई दिए।

उनमें तनाव भी नहीं दिखा। वहीं 75,000 पाउंड प्रति वर्ष का वेतन पाने वाले अपेक्षाकृत कम खुश नजर आए और उनकी जिंदगी में तनाव ज्यादा था।

अध्ययन में कहा गया कि जो लोग एक लाख अथवा ढेढ़ लाख पाउंड का वेतन पाते हैं उनमें इन सबसे ज्यादा तनाव होता है।

उन्हें अपनी जिंदगी में खुशियां तलाशने का वक्त नहीं मिलता। ये लोग 50,000 पाउंड वेतन पाने वाले से ज्यादा खुश नहीं पाए गए।

इस अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता डॉक्टर क्रिस ब्यॉस ने कहा कि ज्यादा वेतन पाने वालों में खुशी के अभाव की वजह से उनमें आत्मसंतुष्टि की कमी भी है।

अगर कोई व्यक्ति 10 पाउंड डॉलर सालाना की कमाई करता है और उसके दोस्त का वेतन 20 लाख पाउंड सालाना है तो वह खुश नहीं रह सकता।

Thursday, December 3, 2015

अच्छे मनुष्य के लषण


(1) विस्तृत ज़हन एवं खुले विचार का मालिकः
एक इश्वर पर विश्वास रखने वाला तंग नज़र नही होसकता है बल्कि वह विस्तृत ज़हन और खुले विचार का मालिक होगा। वह सब को अपनी ही तरह एक ही मालिक की मिल्कीयत और एक ही राजा की प्रजा समझता है। उस की मोहब्बत,हमदर्दी और सेवा सब के लिए एक जैसा होता है।
(2) खुद्दारी और आदर-सम्मान का एहसासः
एक इश्वर को मान्ने वाले व्यक्ति बहुत खुददार,अपनी इज़्ज़त और सम्मान का एहसास करने वाला होगा। वह जानता है कि सर्व शक्तिमान केवल एक खुदा है , लाभ या हाणी उसी के हाथ में है,मारने या जिन्दह रखने वाला वही एक ज़ात है। यह ज्ञान उसे एक ऐसी शक्ति प्राप्त करती है जो उसे निडर बेखैफ बना देती है। उस की गर्दन दुन्या के किसी चीज़ के समक्ष नही झुकती , अपना हाथ किसी के सामने नही फैलाता बल्कि वह केवल एक इश्वर से ही सारी मुराद और सारी फरयाद करता है।
(3) संकटों में निराश नही होता बल्कि बहादुरी से मुकाबला करता है।
एक इश्वर पर आस्था रखने वाला जीवन के बुरे समय में कभी निराश नही होता और न ही उस का हृदय टुटता है। वह उस खुदा पर विश्वास करता है जो बहुत दयालु तथा बड़ा कृपा करने वाला है। यह ईमान उसे बहुत बड़ी संतुष्ठी प्राप्त करती है। यह ईमान उस के दिल को आशओं से भर देता है, यदापि वह संसार के सारे दरवाज़े से ठुकरा दिया गया हो। तमाम कारण खत्म होचुके हों। किसी का कोई सहायता प्राप्त होने की उमीद न हो। प्रन्तु उसके दिल में एक सहारा बाक़ी रहता है और यह एक इश्वर का सहारा रहता है। इश्वर से प्राथना करते हुऐ इन संकटो से बाहर निकलने की अच्छी तदबीर करता है। फिर उस पर से सारी संकट तथा परिशानी खत्म होजाती है।
(4) बहादुर और निडर होना
एक इश्वर पर ईमान लाने वाला व्यक्ति बहादुर होता है। वह किसी चीज़ से नही डरता, वह जानता है कि मृत्यु देने वाला और जिन्दह रखने वाला अल्लाह ही है। लाभ या हानी पहुँचान केवल अल्लाह के हाथ में है। बाल-बच्चे , प्राण और धन –दौलत का प्रेम उसे इश्वर का काम करने में रुकावट नही डालता बल्कि वह बेखैफ होकर अल्लाह के आज्ञा का पालन करता है।

Thursday, November 12, 2015

सुविचार

 
नायक वह होता है जो सही समय पर किसी की जान बचाने के लिए आगे आता है।
वह अपना जीवन अच्छे कामों को समर्पित कर देता है। आम जिंदगी में भी कुछ लोग ऐसे ही होते हैं।
वे दूसरों की मदद के करने के लिए अपनी परवाह नहीं करते। कई बार वे अपनी जान भी दांव पर लगा देते हैं।
हमने यहां ऐसे ही नायकों को चुना है। बेशक उनके काम से हमें भी प्रेरणा मिलती है।

Tuesday, November 3, 2015

जीवन में सफलता के सात आध्यात्मिक नियम


पहला नियम-  प्रतिदिन मौन. ध्यान और अनिर्णय का अभ्यास करना। व्यक्ति को प्रतिदिन कुछ समय के लिए मौन.बोलने की प्रकिया से दूर. रहना चाहिए और दिन में दो बार आधे घंटे सुबह और आधे घंटे शाम अकेले बैठकर ध्यान लगाना चाहिए।
इसी के साथ उसे प्रतिदिन प्रकृति के साथ सम्पर्क स्थापित करना चाहिए और हर जैविक वस्तु की बौद्धिक शक्ति का चुपचाप अवलोकन करना चाहिए। शांत बैठकर सूर्यास्त देखें. समुद्र या लहरों की आवाज सुनें तथा फूलों की सुगंध को महसूस करें ।
दूसरा नियम-  सफलता का दूसरा आध्यात्मिक नियम है.- देने का नियम। देने के नियम का अभ्यास बहुत ही आसान है। यदि व्यक्ति खुश रहना चाहता है तो दूसरों को खुश रखे और यदि प्रेम पाना चाहता है तो दूसरों के प्रति प्रेम की भावना रखे।यदि वह चाहता है कि कोई उसकी देखभाल और सराहना करे तो उसे भी दूसरों की देखभाल और सराहना करना सीखना चाहिए । यदि मनुष्य भौतिक सुख-समृद्धि हासिल करना चाहता है तो उसे दूसरों को भी भौतिक सुख- समृद्धि प्राप्त करने में मदद करनी चाहिए।

तीसरा नियम-  सफलता का तीसरा आध्यात्मिक नियम, कर्म का नियम है।
कर्म, कारण और प्रभाव के नियम पर इन बातों पर ध्यान देकर आसानी से अमल किया जा सकता है...

चौथा नियम-  सफलता का चौथा नियम "अल्प प्रयास का नियम" है। यह नियम इस तथ्य पर आधारित है कि प्रकृति प्रयत्न रहित सरलता और अत्यधिक आजादी से काम करती है। यही अल्प प्रयास यानी विरोध रहित प्रयास का नियम है।

प्रकृति के काम पर ध्यान देने पर पता चलता है कि उसमें सब कुछ सहजता से गतिमान है। घास उगने की कोशिश नहीं करती, स्वयं उग आती है। मछलियां तैरने की कोशिश नहीं करतीं, खुद तैरने लगती हैं, फूल खिलने की कोशिश नहीं करते, खुद खिलने लगते हैं और पक्षी उडने की कोशिश किए बिना स्वयं ही उडते हैं। यह उनकी स्वाभाविक प्रकृति है। इसी तरह मनुष्य की प्रकृति है कि वह अपने सपनों को बिना किसी कठिन प्रयास के भौतिक रूप दे सकता है।


पांचवा नियम- 
सफलता का पांचवां आध्यात्मिक नियम "उद्देश्य और इच्छा का नियम" बताया गया है। यह नियम इस तथ्य पर आधारित है कि प्रकृति में ऊर्जा और ज्ञान हर जगह विद्यमान है। सत्य तो यह है कि क्वांटम क्षेत्र में ऊर्जा और ज्ञान के अलावा और कुछ है ही नहीं। यह क्षेत्र विशुद्ध चेतना और सामर्थ्य का ही दूसरा रूप है. जो उद्देश्य और इच्छा से प्रभावित रहता है।

छठवां नियम-  सफलता का छठा आध्यात्मिक नियम अनासक्ति का नियम है। इस नियम के अनुसार व्यक्ति को भौतिक संसार में कुछ भी प्राप्त करने के लिए वस्तुओं के प्रति मोह त्यागना होगा। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि वह अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए अपने उद्देश्यों को ही छोड दे । उसे केवल परिणाम के प्रति मोह को त्यागना है। व्यक्ति जैसे ही परिणाम के प्रति मोह छोड देता है. उसी वह अपने एकमात्र उद्देश्य को अनासक्ति से जोड लेता है। तब वह जो कुछ भी चाहता है. उसे स्वयमेव मिल जाता है।

अनासक्ति के नियम का पालन करने के लिए निम्न बातों पर ध्यान देना होगा.. आज मैं अनासक्त रहने का वायदा करता हूं। मैं स्वयं को तथा आसपास के लोगों को पूर्ण रूप से स्वतंत्र रहने की आजादी दूंगा। चीजों को कैसा होना चाहिए. इस विषय पर भी अपनी राय किसी पर थोपूंगा नहीं। मैं जबरदस्ती समस्याओं के समाधान खोजकर नयी समस्याओं को जन्म नहीं दूंगा। मैं चीजों को अनासक्त भाव से लूंगा। सब कुछ जितना अनिश्चित होगा. मैं उतना ही अधिक सुरक्षित महसूस करूंगा क्योंकि अनिश्चितता ही मेरे लिए स्वतंत्रता का मार्ग सिद्ध होगी। अनिश्चितता को समझते हुए मैं अपनी सुरक्षा की खोज करूंगा।..

सातवां नियम-  सफलता का सातवां आध्यात्मिक नियम. धर्म का नियम. है। संस्कृत में धर्म का शाब्दिक अर्थ..जीवन का उद्देश्य बताया गया है। धर्म या जीवन के उद्देश्य का जीवन में आसानी से पालन करने के लिए व्यक्ति को इन विचारों पर ध्यान देना होगा.. ..मैं अपनी असाधारण योग्यताओं की सूची तैयार करूंगा और फिर इस असाधारण योग्यता को व्यक्त करने के लिए किए जाने वाले उपायों की भी सूची बनाऊंगा। अपनी योग्यता को पहचानकर उसका इस्तेमाल मानव कल्याण के लिए करूंगा और समय की सीमा से परे होकर अपने जीवन के साथ दूसरों के जीवन को भी सुख.समृद्धि से भर दूंगा। हर दिन खुद से पूछूंगा..मैं दूसरों का सहायक कैसे बनूं और किस प्रकार मैं दूसरों की सहायता कर सकता हूं। इन प्रश्नों के उत्तरों की सहायता से मैं मानव मात्र की प्रेमपूर्वक सेवा करूंगा।..
साभार : "द चोपड़ा सेंटर फार वेल बीइंग" के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी डा.दीपक चोपड़ा (लेखक)

Tuesday, October 27, 2015

कर्मठी हटा नहीं करता है

आए जो कहर तूफां के कभी
पर्वत डिगा नहीं करता है
संघर्ष की अग्नि परीक्षा से
कर्मठी हटा नहीं करता है

टूटी एक कलम तो क्या ग़म
सूखी गर जो उसकी स्याही
कुछ पन्नों के भर जाने से
सृजन रुका नहीं करता है

जब तक दर्द न हो जीवन में
सुख का है आनंद अधूरा
बिन काँटों की संगत जोड़े
गुलाब खिला नहीं करता है

दुर्जन की संगत पाकर भी
सज्जन बुरा नहीं करता है
कितने ही विषधर लिपटे हों
चन्दन मरा नहीं करता
है
साभार : अर्चना तिवारी