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Sunday, September 12, 2010

कर्मठी हटा नहीं करता है

आए जो कहर तूफां के कभी
पर्वत डिगा नहीं करता है
संघर्ष की अग्नि परीक्षा से
कर्मठी हटा नहीं करता है

टूटी एक कलम तो क्या ग़म
सूखी गर जो उसकी स्याही
कुछ पन्नों के भर जाने से
सृजन रुका नहीं करता है

जब तक दर्द न हो जीवन में
सुख का है आनंद अधूरा
बिन काँटों की संगत जोड़े
गुलाब खिला नहीं करता है

दुर्जन की संगत पाकर भी
सज्जन बुरा नहीं करता है
कितने ही विषधर लिपटे हों
चन्दन मरा नहीं करता
है
साभार : अर्चना तिवारी

1 comment:

गजेन्द्र सिंह said...

अच्छी पंक्तिया लिखी है आपने ....

मुस्कुराना चाहते है तो यहाँ आये :-
(क्या आपने भी कभी ऐसा प्रेमपत्र लिखा है ..)
(क्या आप के कंप्यूटर में भी ये खराबी है .... )
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