Thursday, January 15, 2026

कविता: ठहराव की किरण

 थोड़ा‑सा ठहरो…

दुनिया की तेज़ चाल
अक्सर तुमसे वो बातें छीन लेती है
जो तुम्हारी ख़ामोशी ही तुम्हें लौटा सकती है।

इस भागदौड़ के बीच,
एक सूक्ष्म‑सी रोशनी
धीरे‑धीरे तुम्हारे चारों ओर फैल रही है—
मानो समय ने अपनी हथेली
तुम्हारे कंधों पर रख दी हो।

ये वही ठहराव की किरण है—
जो रोज़‑मर्रा की धूल झाड़कर
तुम्हारी भीतर की परतों में
एक नई चमक जगा देती है।

जब मन उलझनों में फँस जाए,
जब शब्द थककर चुप होने लगें,
जब सपने सिरहाने पर बैठकर पूछें—
“अब आगे कहाँ?”
तभी यह किरण तुम्हारे पास आती है
और फुसफुसाती है—
“रुकना भी एक यात्रा है…
जो भीतर की ओर चलती है।”

यह विराम कोई रुकावट नहीं,
यह तुम्हारी आत्मा की साँस है—
जो हर शोर के बीच
अपने होने का सबूत देती है।

इस निःशब्द पल में
तुम देख पाते हो—
वे भाव जो अनकहे रह गए,
वे घाव जो अब तक दबे थे,
वे सपने जो इंतज़ार में थे
तुम्हारी एक शांत नज़र के।

ठहराव की यह किरण
तुम्हारे माथे पर गिरते हुए
मानो कहती है—
“तेरे भीतर एक पूरा आकाश है,
जिसे तूने देखना ही नहीं सीखा।”

तुम जब इस रोशनी को
धीरे‑से हथेलियों में पकड़ते हो,
तो महसूस करते हो—
कितना हल्का हो सकता है मन
जब वह खुद से मिलने की
एक छोटी‑सी कोशिश करे।

याद रखना—
सबसे ऊँची उड़ानें
उसी क्षण जन्म लेती हैं
जब पंख कुछ देर टिककर
हवा का स्वभाव समझते हैं।

इसलिए…
आज थोड़ा‑सा ठहरो,
थोड़ा‑सा मुस्कुराओ,
और अपने भीतर की इस कोमल किरण को
आने दो—
क्योंकि रौशनी कभी जल्दी नहीं करती,
वह बस समय पर पहुँचती है।


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