Saturday, July 13, 2019

साहबगीरी के दोहे

 


साहब बोलें आम को, अगर भूल से नीम।
फर्ज तुम्हारा आम को, काट उगाओ नीम॥

साहब बोलें गर सखे, सोलह दूनी आठ।
सदा याद रखना उसे, बने रहेंगे ठाठ॥

साहब जब जब हँस पड़ैं, तुम भी हँस दो साथ।
बात हँसी की हो सखे, या हो दुख की बात॥

साहब को उर में धरो, जपो साब का नाम।
साहब खुश गर हो गए, बनैं बीगड़े काम॥

जय हो साहब बोलि के, सदा नवाओ माथ।
जो फल साहब दे सकें, नहीं देत रघुनाथ॥

साहब के गुण-गान से, धुलैं आप के पाप।
बाल बाँका कर सकै, 'विजीलेन्स' का बाप॥

साहब को सूचित करो, हर छोटी सी बात।
काम करो या ना करो, कौन पूछने जात॥

आगे बढ़ते जाओगे, कभी छोड़ो हाथ।
बाथरूम में भी सखे, जाओ साब के साथ॥

कितना भी तुम कर मरो, हो जाओगे फेल।
सुबह-शाम गर साब को, नहीं लगाया तेल॥

 

 

 

 

Friday, May 10, 2019

"वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!-प्रयाण गीत

"वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!" एक प्रेरणादायक और देशभक्ति से ओत-प्रोत कविता है, जिसे द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ने रचा है

 कविता का सार:

यह कविता साहस, धैर्य और राष्ट्रभक्ति का संदेश देती है। इसमें बालकों को, युवाओं को और हर नागरिक को यह प्रेरणा दी गई है कि वे बिना रुके, बिना झुके, अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहेंचाहे राह में कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों हों।

🖋️ मुख्य विषय-वस्तु:

  • ध्वज और दल का प्रतीकात्मक प्रयोग:
    यह राष्ट्र और संगठन की एकता और अडिगता को दर्शाता है।
  • प्राकृतिक बाधाओं का उल्लेख:
    पहाड़, सिंह की दहाड़, रात, प्रपातये सब जीवन की चुनौतियों के प्रतीक हैं।
  • निडरता और निष्ठा:
    कविता हमें सिखाती है कि डर को पीछे छोड़कर, निडर होकर आगे बढ़ना ही सच्चा वीरत्व है।
  • मातृभूमि और पितृभूमि के लिए समर्पण:
    यह पंक्तियाँ देशभक्ति की भावना को और भी गहराई से दर्शाती हैं।
  • प्राकृतिक संसाधनों का दोहन:
    "अन्न भूमि में भरा, वारि भूमि में भरा..." — यह पंक्तियाँ परिश्रम और समृद्धि की ओर संकेत करती हैं।

📚 प्रसंग और उपयोग:

यह कविता अक्सर विद्यालयों की पाठ्यपुस्तकों में शामिल की जाती है (जैसे NCERT की कक्षा 6 की पुस्तक "दूर्वा" में), और राष्ट्रभक्ति कार्यक्रमोंस्कूल सभाओं, तथा प्रेरणात्मक भाषणों में पढ़ी या गाई जाती है 

Linkls-

1

: http://kavitakosh.org/kk/वीर_तुम_बढ़े_चलो_/_द्वारिका_प्रसाद_माहेश्वरी

2

: https://www.hindwi.org/kavita/badhe-chalo-dwarika-prasad-maheshwari-kavita

 

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

 

हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे

ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

 

सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो

तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

 

प्रपात हो कि रात हो संग हो साथ हो

सूर्य से बढ़े चलो चंद्र से बढ़े चलो

वीर, तुम बढ़े चलो धीर, तुम बढ़े चलो।

 

एक ध्वज लिए हुए एक प्रण किए हुए

मातृ भूमि के लिए पितृ भूमि के लिए

वीर तुम बढ़े चला! धीर तुम बढ़े चलो!

 

अन्न भूमि में भरा वारि भूमि में भरा

यत्न कर निकाल लो रत्न भर निकाल लो

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

 

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे
ध्वज
कभी झुके नहीं दल कभी रुके
नहीं
वीर
तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो
तुम
निडर डरो नहीं तुम निडर डटो
वहीं
वीर
तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

प्रपात हो कि रात हो संग हो साथ हो
सूर्य
से बढ़े चलो चंद्र से बढ़े
चलो
वीर
, तुम बढ़े चलो धीर, तुम बढ़े चलो।

एक ध्वज लिए हुए एक प्रण किए हुए
मातृ
भूमि के लिए पितृ भूमि के
लिए
वीर
तुम बढ़े चला! धीर तुम बढ़े चलो!

अन्न भूमि में भरा वारि भूमि में भरा
यत्न
कर निकाल लो रत्न भर निकाल
लो
वीर
तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

Friday, April 26, 2019

दुध्मुहें बच्चे की मां उसे दूध पिलाये बिना सो गई

रचना बेहद भावुक, सजीव और आत्मीय हैजैसे किसी ने अपने दिल की परतें खोलकर रख दी हों। इसमें प्रेम, प्रतीक्षा, निराशा और एक गहरी संवेदना का सुंदर मिश्रण है। मैंने आपकी मूल भावना को सहेजते हुए इसे थोड़ा तराशा है ताकि प्रवाह और भाव और भी स्पष्ट हो सकें:

 


मौसम बहुत ख़राब था,
घर की लाइट चली गई थी...
आपसे वादा किया था
तो हम चल दिए।

सोचा, दोस्त की दुकान से
एक मैसेज ही कर दें
"भाई, लेट हो जाएंगे,
आप फिक्र मत करना।"

आप कहते हो
"मेरी फिक्र मत किया करो,"
पर ख़ुद तो करते रहते हो...

जब दुकान पहुँचे
जनरेटर महाराज भी बंद थे।
मौसम ख़राब, लाइट नहीं,
और जनरेटर भी ख़राब
इसे कहते हैंकंगाली में आटा गीला।

आसमान की ओर देखा
बादल जैसे गला फाड़कर चिल्ला रहे थे।
फिर... आसमान रो पड़ा।
आप जैसा तो नहीं था
बहुत ऊँचा,
और उसके आँसू हर ओर फैल गए।

मैं चलता गया,
भीगता गया,
बस चलता गया।

एक गाड़ी वाले भाई साहब रुके
कहने लगे,
"क्यों भाई, बीच सड़क चल रहे हो?
मरना है क्या?"

मन में आया
भाई, जीना कौन कमबख़्त चाहता है?
जल्दी थी
आप इंतज़ार कर रहे थे।

मन में आया
अब और इंतज़ार नहीं करवाऊँगा।
बहुत करवा लिया आपने।
अब जो सोचोगी,
उम्मीद से पहले मिलना चाहिए।

निचुड़ते हुए,
आख़िर ऑफिस पहुँच ही गया।
सबसे पहले
आपकी मेल देखी।

आप नहीं थे।
शायद कोई ज़रूरी काम रहा होगा।
सुबह जल्दी उठते हो ...

देखता रहा,
सोचता रहा,
और... इंतज़ार करता रहा।

जैसे कोई दूधमुंहा बच्चा
अपनी माँ के बिना
नींद में भी जागता रहे
माँ उसे कैसे छोड़ दे?
और बच्चा...
माँ के बिना जी भी कैसे सकता है?

 

Thursday, April 11, 2019

अनुभव से पूर्ण

कविता एक तीखा और सटीक व्यंग्य हैसमाज की उस सच्चाई पर जो अनुभव के नाम पर मासूमियत और नैतिकता को कुचलने की सलाह देती है। मैंने आपकी मूल भावना को बनाए रखते हुए इसे थोड़ा तराशा है ताकि इसकी धार और स्पष्ट हो सके:

अनुभव से पूर्ण
उसने कहा
"बेटा, अब तुम बड़े हो गए हो,
अब सच बोलना छोड़ दो।

तुम्हें आगे बढ़ना है,
तो पीछे की ओर खुलते रास्ते पर चलो
सीधे चलते जाना।
अगर कोई रास्ते में खड़ा हो
और तुमसे आगे बढ़ रहा हो,
तो उसके पीछे मत लगना
गिरा देना उसे,
चाहे जैसे भी।

बेटा, अब तुम्हें
दया और करुणा भूल जानी चाहिए।
अब तुम बच्चे नहीं रहे।
कुछ सीखो
ज़माने के दस्तूर यही हैं।
यहाँ सब दौड़ रहे हैं,
दूसरों के कंधों पर सवार होकर।"