Wednesday, April 18, 2018

शक्ति तो ब्रजबाला है-भजन



सुनी देवो की जो करुण पुकार
हुई कृष्ण की दृष्टि भी अपार
जब देखी उग्र रूप राधा
कान्हा ने यह निर्णय साधा
किसी तरह राधा को मनाऊँ मैं
अपना स्वरूप बताऊँ मैं
कान्हा ने मन में विचार किया
चतुर्भुज रूप साकार किया

राधा ने देखा जो सम्मुख
कान्हा को देख के हुई चकित
गिर कर के राधा चरणों पर
रो-रो कर कहती, हे नटवर
राधा की सौंगंध है तुमको
मथुरा न जाओ तजकर हमको
बिन तेरे जी न पाएँगे
तुम्हे बिन देखे मर जाएँगे
अधूरी है तुम बिन यह राधा
इस लिए मैंने निर्णय साधा
जो मधुपुरी को तुम जाओगे
जिंदा न मुझे फिर पाओगे
मैं प्राण त्याग दूँगी कान्हा
रहेगा तुम पर यह उलाहना

इक प्रेम दीवानी मौन हुई
कहो प्रेम में ग़लती कौन हुई?
गिरा ब्रजरानी का अश्रुजल

धुल गये कान्हा के चरण-कमल
हाथों से उसे उठाते हैं
फिर प्यार से गले लगाते हैं
राधा के पोंछते हुए नयन
बोले कान्हा यह मधुर वचन

तुम क्यों अधीर हो रही प्रिय
अब ध्यान से मेरी सुनो विनय
तुम प्रेम की देवी हो राधे
सब प्रेम से ही कारज साधे
फिर रूठी है क्यों मेरी प्रिया
कहो, तुम बिन मैंने किया क्या?
राधे तुम मेरी शक्ति हो

तुम ही मेरी भक्ति हो
अधूरा है तेरे बिना कृष्ण
तुम बिन नहीं माने मेरा मन
दो शरीर और एक प्राण
करते हुए ऐसा आलिंगन

गिर रहे राधा के अश्रुकन
भावुक हो गया कान्हा का मन
कहने को नहीं कोई शब्द रहे
कोई क्या कहे? और कैसे कहे?
प्रिया-प्रियतम दोनों हुए मौन

दोनों को समझाएगा कौन
?
फिर कान्हा ने तोड़ते हुए मौन

लेकर राधा का मधुर चुंबन
मैंने तेरी हर बात मानी
शक्ति हो तुम मेरी आह्लादिनी
राधा और कृष्ण कहाँ हैं भिन्न
मोहन राधा, राधा मोहन
दिखने में तो हम दो हैं तन
पर एक है हम दोनों का मन

प्रिया-प्रियतम मिलकर हुए एक
कहो किसकी है ऐसी भाग्य रेख?
वो जगत-पिता, वो जग-माता

करुणा से हृदय भर जाता
दोनों कोमल दोनों सुंदर
बस समझे उसको मन-मंदिर
इक पीत वरण, इक श्याम-गात
छवि देख के मनुजनमा लजात
एक टेक दोनों रहे देख
कुदरत ने भी खोया विवेक
थम गई सारी चंचलता
रुक गया सूर्य का रथ चलता
दोनों हैं बस आलिंगनबद्ध
प्रकृति भी हो गई स्तब्ध
वो करुण हृदय,वो भावुक मन
नयनों में भरे हुए अश्रुकन
नहीं अलग हो रहे उनके तन
जल रहे ज्वाला में शीत बदन
बस प्रेम है उनके नयनों में
उनके तन में, उनके मन में
हृदय की हर धड़कन में
और बार-बार आलिंगन में
सब कहने की है उनकी आशा
पर प्यार की होती है कब भाषा
भाषा है प्यार की आँखों में
बस प्रेमी ही समझें लाखों में
मूक है आँखों की भाषा
कह देती मन की अभिलाषा
प्यार की भाषा के अश्रुकन
पढ़ सकते जिसको प्रेमीजन
देख के उन आँखों की चमक
हो जाते उनमें मग्न प्रियतम
बस आँसू उनको ख़टकते हैं
निशी दिन जो बरसते रहते हैं
मुँह से बोला नहीं शब्द एक
प्रिय-प्रिया फिर भी हो गये एक
कह दी उन्होंने बातें अनेक
कोई भी समझ पाया न नेक
घायल हो जाते हैं दो दिल
बिन बोले कैसे जाएँ मिल?
बिन बोले हो न सके अपने

लेकर के आँखों में सपने
प्रिया-प्रियतम फिर अलग हुए
और प्यार से ही कुछ शब्द कहे
हो गये दोनों के नेत्र सजल
जैसे खिले हों कोई नील कमल
नहीं प्यार के उनके कोई सीमा
हो रहे भावुक प्रिय-प्रियतमा
राधा फिर धीरे से बोली
और प्यार भारी अखियाँ खोली

कान्हा, राधा हो न जाए ख़त्म
न जाओ मधुपुरी, तुम्हें मेरी कसम
जो तुम चले जाओगे मथुरा
कैसे जी पाएगी राधा?
जीवन भर साथ निभाने का

किया था तुमने मुझसे वादा
छू कर राधा गिरधर के चरण
न भूलो अपना दिया वचन
दिखा कर मुझको सुंदर सपने
क्या भूलोगे वायदे अपने?
जब पकड़ा तुमने मेरा हाथ

अब छोड़ चले क्यों मेरा साथ
मुझे याद है तेरा पहला स्पर्श
भर दिया था मन मेरे में हर्ष
तुम भूल भी जाओ पर नटवर
मैं भूल न पाऊँगी मरकर
यह प्यार था तुम्हीं ने शुरू किया
जब पहली बार तूने मुझे छुआ
तेरी प्यार चिंगारी अब गिरधर
बन गई ज्वाला मेरे अंदर
दिन-रात ये मुझे जलाती है
आँखों से नीर पिलाती है
जब प्रेम निभा ही नहीं सकते
फिर प्रेम दिखाते हो क्यों मोहन?
जब प्यार भरा दिल नहीं रखते

करते हो फिर क्यों आलिंगन?
मैं थी जब जल भरने आई

तूने लेते हुए अंगड़ाई
पूछा था मुझे इशारे से
कब बजेगी तेरी शहनाई?
मैंने भी कहा इशारे से

तू माँग मेरी को अभी भर दे
तब तूने अपनी माँ से कहा
माँ मेरी भी शादी करदे
लिखी फिर तूने प्रेम-पाती
हम भी होंगे जीवन-साथी
नहीं मिलेंगे फिर हम छिप-छिपकर
हो जाएँगे एक, अति सुंदर
फिर जब मैं जाने लगी घर
ले गये तुम मुझको पकड़ भीतर
ले जा के मुझे इक कोने में
मेरे नयना थे रोने में
कहे थे तुमने बस इतने शब्द
तुम रोओगी मुझको होगा दर्द
लिए झट से मैंने आँसू पोंछ
सुध-बुध भूली, नहीं रहा होश
मुझे जब भी तूने दी आवाज़
मैं भूल गई सब काम-काज
और चली आई तज लोक-लाज
फिर छोड़ चले तुम मुझको आज
क्यों तुमने मुझे सताया था?
सखियों के मध्य बुलाया था

ले-ले कर तुमने मेरा नाम
कर दिया मुझको सब में बदनाम
मैं रोक सकी न चाह कर भी
तुम छेड़ते थे मुझे राह पर भी
मैं लोगों में थी सकुचाती
पर मन ही मन खुश हो जाती
जब मिले थे मुझको कुंज गली
मैं दधि की मटकी ले के चली
साथ थी मेरे सब सखियाँ
फिर भी न रुकीं तेरी अखियाँ
आँखों से मुझे बुला ही लिया
नयनों से तीर चला ही दिया
वह तीर लगा मेरे सीने में
फिर कहाँ थी राधा जीने में?
सुध-बुध खोकर मैं गिर ही गई

सब सखियों से मैं घिर ही गई
फिर आए थे तुम जल्दी-ल्दी
और उठा लिया अपनी गोदी
हृदय में ज्वाला रही धधक
इक टेक बाँध गई अपनी पलक
उस भावना में हम बह ही गये
इक दूजे के बस हो ही गये
तब भूल गई हमको सखियाँ
मुस्का रहीं थी उनकी अखियाँ
तुम यमुना तट पर आ करके
और वंशी मधुर बजा करके
जब तुमने पुकारा था राधा
तब तोड़ दी मैंने सब बाधा
मैं आई थी तब भाग-भाग
और लगा था किस्मत गई जाग
तुम मीठी-मीठी बातों से
सताते थे मुझको रातों में
बस साथ है तेरा सुखदाई
हर रात मैं तुझे मिलने आई
मुझसे लिपटी मानस पीड़ा
जब कर रहे थे हम जलक्रीड़ा
जल रहे थे हम यमुना जल में
और आग थी पानी की हलचल में
प्रकृति ने छेड़ा था संगीत
थी गीत बन गई अपनी प्रीत

बस-बस राधे न हो भावुक
न छेड़ो वह बातें नाज़ुक
क्यों भूल रही हो तुम राधा?
कान्हा है तेरे बिन आधा

नारी नहीं हो तुम साधारण
फिर क्यों विचलित है तेरा मन
राधा से भिन्न कहाँ कान्हा
फिर कैसा तेरा उलाहना?
दो देह मगर इक प्राण हैं हम

क्योंकि भू पर इंसान हैं हम
करने पुर कुछ सत्य कर्म
लिया है हमने यह मानव जन्म
उस कर्म को पूरा करना है
फिर क्यों कंस से डरना है
ऐसा नहीं कर सकती राधा
नहीं कर्म में बन सकती बाधा
तुम याद वह अपना रूप करो
और धैर्य धरो बस धैर्य धरो
मेरा वादा है यह तुमसे
तुम भिन्न नहीं होगी मुझसे
पहले तुम स्वयम् को पहिचानो
शक्ति हो मेरी यह मानो
बिन शक्ति के क्या मैं लड़ सकता?
क्या प्यार को रुसवा कर सकता?

सुन राधा ने नेत्र किए बंद
देखा तो पाया वह आनंद
राधा तो कृष्ण में समा ही गई
परछाई अपनी छोड़ चली
छाया भी न रह सकी बिन कान्हा
दिया उसने भी एक उलाहना

विचलित है छाया का भी मन
ले लिया उसने भी एक वचन
जो मुझे छोड़ कर जाओगे
तुम मुरली नहीं बजाओगे
मुझको अपनी मुरली दे दो
तुम जाके कर्म पूरा करदो
अब मुरली तुम जो बजाओगे
मुझे नहीं अलग कर पाओगे
मुरली सुन मैं आ जाऊँगी
और कर्म में बाधा बन जाऊँगी
अब तुम बिन मैं ब्रज में रहकर
मुरली से हर सुख-दुख कहकर
मानव का कर्म निभाऊँगी
जाओ तुम मैं रह जाऊँगी

मुरली को सौंप गये कान्हा
क्या लीला हुई? कोई न जाना
कान्हा का खेल निराला है
कहाँ कोई समझने वाला है
उसका यह रूप निराला है
पर शक्ति तो ब्रजबाला है

Thursday, April 12, 2018

शायद पढ़ लोगी तुम कही ?-कविता

 

 

कविता बेहद भावुक और खूबसूरत है — एक गहरी याद, एक अधूरी मुलाक़ात, और एक उम्मीद की झलक लिए हुए। मैंने आपकी मूल भावना को बरकरार रखते हुए इसे थोड़ा तरतीब और प्रवाह देने की कोशिश की है।

 

वक़्त के मोड़ों पर
कई बार
बेसबब ही रुका हूँ,
ये सोचकर
कि शायद
कहीं मिल जाओ तुम...

तुम्हारे शहर के एयरपोर्ट से जब भी गुज़रता हूँ,
वेटिंग लाउंज में, बाहर चेहरों की भीड़ को
देखकर सोचता हूँ —
क्या पता,
तुम किसी को छोड़ने आ जाओ...

शहर की दुकानों के बीच से
झाँकते हुए गुज़रता हूँ,
कि शायद किसी गोलगप्पे की दुकान पर
'खट्टा-मीठा पानी' पीती हुई
दिख जाओ तुम,
या सड़क किनारे किसी मेहंदी वाले से
नए डिज़ाइन में उलझी हुई...
या किसी होटल के वेटर से
"रेसिपी" पूछती हुई...

क्या अब भी बारिशों में
मोटरसाइकिल के पीछे बैठकर
शोर मचाती होगी तुम?
क्या अब भी सर्दियों में
काँपते हुए आइसक्रीम खाती होगी तुम?
क्या अब भी सिगरेट छीनकर
लंबे-लंबे कश लेकर खांसती होगी तुम?
क्या अब भी
खुले बालों में अच्छी लगती होगी तुम?

कैसी होगी तुम?
साड़ी पहनने का बहाना ढूँढती थी उन दिनों,
तब ब्लैक साड़ी फ़ेवरेट थी तुम्हारी...
आजकल मेरी है।

कभी किसी को छोड़ने आ जाओ...

सिगरेट की डिब्बी पर लिखे
कुछ बेतरतीब से लफ़्ज़...
कई बार ये सोचकर ही लिख लेता हूँ —
कि शायद पढ़ लोगी तुम... कहीं।

 

Thursday, March 29, 2018

दर्द-ए-ग़म-कविता

हर मोड़ पर ज़िंदगी ने इम्तिहान लिया है,
हमने भी हर बार हँसकर उसे सलाम किया है।
जो टूटा है अंदर कहीं, वो दिखाया नहीं,
पर हर दर्द को हमने कलम से बयान किया है।

जिन्हें हमसफ़र समझा, वो रास्ता बदल गए,
हम फिर भी अकेले चलने का हौसला रख सकते हैं।
हर आँसू को मोती बना लिया है हमने,
अब ज़ख्म भी मुस्कुरा कर सह सकते हैं।

जो खो गया है, उसका ग़म नहीं करते,
जो पास है, उसे ही जश्न बना सकते हैं।
ज़िंदगी से शिकवा नहीं कोई अब हमें,
हर हाल में जीना हम सिखा तो सकते हैं।

 

Thursday, February 22, 2018

मेहनत से वो मंज़िल पाएँगे —गीत गजल कविता

हम मुश्किलों से टकराकर मुक़द्दर बनाएँगे,
जहाँ गिरती हैं बिजलियाँ, वहीं आशियाँ बसाएँगे।
राह में जो आएँगे पत्थर, रुकावट नहीं बनेंगे —
हम ठोकरों से उन्हें रेत में बदल जाएँगे।

हर आँधी से कह देंगे — अब डर नहीं लगता,
हमने तूफ़ानों में भी दीपक जलाए हैं।
छाँव की चाह नहीं अब हमें,
हमने धूप में चलकर रास्ते बनाए हैं।

जो आज हँसते हैं हमारी कोशिशों पर,
कल वही तालियाँ बजाएँगे।
हम अपनी मेहनत से वो मंज़िल पाएँगे —
जिसे किस्मत भी सलाम ठोकने आएगी।

 



Wednesday, February 7, 2018

प्यार... एक एहसास-कविता

प्यार...
क्या है यह?
सिर्फ़ एक लफ़्ज़ नहीं,
जिसे बाँध लिया जाए
किसी सीमा में,
और खत्म कर दिया जाए
उसकी अंतहीनता को।

प्यार...
कोई वस्तु नहीं,
यह तो एक एहसास है —
एक मौन आश्वासन,
जो धीरे-धीरे
दिल में उतरता है,
मुक्त गगन-सा विचरता है,
और शब्दों को कविता बना देता है।

प्यार...
नयनों में बसा एक सपना है,
जो अनुराग के रंगों से रंगा होता है।
यह चहकता है पक्षी-सा,
अंधेरों को उजालों से भरता है,
नदी-सा कल-कल करता
एक बूँद को सागर बना देता है।

प्यार...
मिलता है सिर्फ़
उस दिल की धड़कन पर,
जहाँ "मैं" से "तू" का सफ़र
एक हो जाता है।
जहाँ अस्तित्व की सीमाएँ मिट जाती हैं,
और काँटों भरी राह भी
फूलों-सी महकने लगती है।