Saturday, June 19, 2010

उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से

जितनी दूर नयन से सपना
जितनी दूर अधर से हँसना
बिछुए जितनी दूर कुँआरे पाँव से
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से

हर पुरवा का झोंका तेरा घुँघरू
हर बादल की रिमझिम तेरी भावना
हर सावन की बूंद तुम्हारी ही व्यथा
हर कोयल की कूक तुम्हारी कल्पना

जितनी दूर ख़ुशी हर ग़म से
जितनी दूर साज सरगम से
जितनी दूर पात पतझर का छाँव से
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से

हर पत्ती में तेरा हरियाला बदन
हर कलिका के मन में तेरी लालिमा
हर डाली में तेरे तन की झाइयाँ
हर मंदिर में तेरी ही आराधना

जितनी दूर प्यास पनघट से
जितनी दूर रूप घूंघट से
गागर जितनी दूर लाज की बाँह से
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से

कैसे हो तुम, क्या हो, कैसे मैं कहूँ
तुमसे दूर अपरिचित फिर भी प्रीत है
है इतना मालूम की तुम हर वस्तु में
रहते जैसे मानस् में संगीत है

जितनी दूर लहर हर तट से
जितनी दूर शोख़ियाँ लट से
जितनी दूर किनारा टूटी नाव से
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से


मैं तब से जानता हूँ

दर्पण में जब वो हर दिन, ख़ुद को नया-नया सा
अचरज से ताकती थी, मैं तब से जानता हूँ
सीधी सी बात पर भी, सीधे सहज ही उसने
मुझसे न बात की थी, मैं तब से जानता हूँ

जंगल में एक दानव, परियों को बांधता जब
करती थी प्रार्थना वो, युवराज आओ भी अब
किस्से-कहानियों में, इक चांद बैठी बुढ़िया
जब सूत कातती थी, मैं तब से जानता हूँ

चिट्ठाए बालों वाले सर को झुकाए नीचे
आँखों पे आए लट फिर, फिर फेंकती वो पीछे
आंगन में अपने घर के, लू की भरी दुपहरी
उपले वो पाथती थी, मैं तब से जानता हूँ

आँखों में मोटे-मोटे, सपनों की छोटी दुनिया
गोदी लिए वो फिरती, भाभी की नन्हीं मुनिया
मेरा ध्यान खींचने को, उसे डाँटकर रुलाती
और फिर दुलारती थी, मैं तब से जानता हूँ

प्रेम को 'परेम' लिखती, दिन को वो 'दीन' लिखती
जीना हुआ है 'मुस्किल', अब 'तूम बीन' लिखती
अशुद्धि में व्याकरण की, वो शुद्ध भाव मन के
कहते थे आपबीती, मैं तब से जानता हूँ

Friday, June 18, 2010

चार बूँद गिरी हैं ज़मीन पर

मेरे ख़ुदा इसे किसी काबिल बनाइए
कुछ ग़म इसे भी दीजिए और दिल बनाइए

कब तक मुग़ालते में रहूँ नाख़ुदा के मैं
साहिल को मौज, मौज को साहिल बनाइए

ये इम्तिहाँ भी देखिए मैंने किया है पार
कुछ और मेरी ज़ीस्त को मुश्किल बनाइए

ये बर्क़ मेरे घर को जला ही नहीं सकी
इसकी तपिश को मेरे मुक़ाबिल बनाइए

ये क्या के चार बूँद गिरी हैं ज़मीन पर
खंजर को आप देखिए क़ातिल बनाइए

कब तक मै सरे राह भटकता रहूँ ख़ुदा
कोई तो मेरी राह में मंजिल बनाइए

शामिल मेरी रुसवाई में सारा शहर यहाँ
एकाध शख़्स दिल में भी शामिल बनाइए

जब तक जिया वो कोई जश्न कर नहीं सका
मय्यत को ही 'रोहित' की अब महफ़िल बनाइए।

Wednesday, June 9, 2010

कितना है दम चराग़ में तब ही पता चले

कितना है दम चराग़ में तब ही पता चले
फानूस की न आस हो उस पर हवा चले

लेता हैं इम्तिहान अगर सब्र दे मुझे
कब तक किसी के साथ, कोई रहनुमा चले

नफ़रत की आंधियाँ कभी बदले की आग है
अब कौन लेके झंडा-ए-अमन-ओ-वफ़ा चले

चलना अगर गुनाह है अपने उसूल पर
सारी उमर सज़ाओं का ही सिलसिला चले


हस्ती मिटती नहीं हमारी


यूनान-ओ- मिस्र-ओ- रोमा, सब मिट गए जहाँ से ।
अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशाँ हमारा

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा