Friday, July 18, 2014

सफ़र लगती है

जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं
देखना ये है कि अब आग किधर लगती है
लम्हे-लम्हे में बसी है तिरी यादों की महक
आज की रात तो खुशबू का सफ़र लगती है


क़ोशिशें मुझको मिटाने की मुबारक़ हों मगर

मिटते-मिटते भी मैं मिटने का मज़ा ले जाऊंगा

शोहरतें जिनकी वजह से दोस्त-दुश्मन हो गए


सब यहीं रह जाएंगी मैं साथ क्या ले जाऊंगा

Kumar Vishwas 

Thursday, May 1, 2014

हार्दिक शुभकामनाएं।

दीपावली के शुभ अवसर पर आपको और आपके परिवार को मेरी  तरफ़ से हार्दिक शुभकामनाएं।
लक्ष्मी जी सदा आपके घर पर निवास करें और आप पर सुख समृद्दि की वर्षा हो।

इस दीपावली विशेष ध्यान दें:

* पटाखों का कम से कम प्रयोग करके, पर्यावरण को वायु प्रदुषण से बचाएं।
* बच्चों को अपनी उपस्थिति मे ही आतिशबाजी जलाने दें।
* आतिशबाजी जलाते समय पानी की बाल्टी पास मे रखें।
* आतिशबाजी जलाते समय सूती कपड़े पहने।
* अपनी जरुरत के मुताबिक ही सामान खरीदें, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बहकावे मे ना आएं।

सुख औ' समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, आते रहिए, पढते रहिए ......

Wednesday, April 2, 2014

शराबी युवा कैसे देंगे चीन और अमेरिका को टक्कर ?

आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,

आजकल के युवा, महाकवि हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला की इन पंक्तियों को मूर्त रूप देने में जुटे हुए हैं ये बात हम नहीं बल्कि एसोचैम द्वारा किए गए के सर्वे से साफ हुई है.

यूथ कल पर कुछ नहीं छोड़ना चाहता सब कुछ आज ही कर लेना चाहता है. मेट्रो शहरों के बारहवीं में पढ़ने वाले 45 पर्सेंट बच्चे महीने में कम से कम पांच से छह बार शराब पीते हैं. और तो और रहे पिछले 10 साल में टीनेजर्स के बीच शराब की खपत दोगुनी हो गई है.

टीनेजर्स में शराब का चलन सबसे ज्यादा दिल्ली और एनसीआर में है. इसके बाद मुंबई का नंबर है. एक स्टूडेंट साढ़े तीन से चार हजार रुपए शराब पर खर्च करता है. जबकि इतनी रकम वे सॉफ्ट ड्रिंक , चाय , दूध , जूस , कॉफी , मूवी टिकट और किताबों पर नहीं खर्च करते. 70 पर्सेंट टीनेजर्स फेयरवेल , न्यू ईयर , क्रिसमस , वैलंटाइन डे , बर्थडे और दूसरे अवसरों पर शराब पीते हैं। सर्वे के मुताबिक , एक तिहाई टीनेजर्स ने कॉलेज पहुंचने से पहले शराब पी ली थी , जबकि 16 पर्सेंट टीनेजर्स ने 15 साल से पहले ही हाला यानी शराब से दोस्ती कर ली थी.

ज्यादातर टीनेजर्स ने पहली बार शराब दोस्तों के साथ पी थी. इस मामले में लड़कियां भी पीछे नहीं हैं वो भी लड़कों को पूरी टक्कर दे रही हैं. लड़कियों में 40 पर्सेंट ने 15 साल से 17 साल की उम्र में पहली बार शराब पी थी. जिन लड़कियों को अल्कोहल का स्वाद पसंद नहीं , वे फ्रूट फ्लेवर्ड शराब पीती हैं.

आपने फीचर फिल्म कुली में आशा भोसले और शब्बीर कुमार को गाते हुए सुना होगा ….मुझे पीने का शौक नहीं पीता हूं गम भूलाने को.. ये फ़िल्मी गाना है लेकिन आजकल की युवा पीड़ी इसे सच साबित करने में दिन रात जुटी हुई है मजेदार बात है ज्यादातर टीनेजर शराब को टेंशन खत्म करने के लिए पीते हैं.

पर सवाल यह है कि क्या शराब हकीकत में टेंशन दूर भगाती है? आखिर युवा पीढ़ी में इतना दबाव क्यों है जो वो ऐसे रास्ते खोज रही है? इसके लिए कौन से बदलाव जिम्मेदार हैं? क्या हम युवा पीढ़ी को चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार नहीं कर पाए हैं? अगर नहीं तो उसे इसके लिए कैसे तैयार किया जाए? क्या युवा पीढ़ी सही दिशा में बढ रही है? या उन्हें सही दिशा में लाने के प्रयास होने चाहिए.

ये वो सवाल हैं जिनका जवाब समय रहते खोजना ज़रूरी है नहीं तो समाज के मूलभूत ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है. जिस यूथ के दम पर हम अमेरिका और चीन जैसे शक्तिशाली देशों से टक्कर लेने का सुंदर सपना सजा रहे हैं अगर हमारा वही यूथ नशे में डूबा होगा तो हम उनसे कैसे मुकाबला करेंगे.

Wednesday, March 26, 2014

मेरी ताकत

मेरी चुप्पी भी आवाज बनती है
आज तुम जितना चाहो बोल लो
हमें हल्का समझने भूल ना कर
चाहो तो अपनी तराजू से तौल लो

राजनीति में महारत तुमको है
कुछ मानवता के पन्ने खोल लो
जात-पात और धर्म पर कब तक
कुछ नई परिभाषाएँ भी जोड़ लो

बहुत बोलते हो एक दूसरे के खिलाफ
भाई कुछ हमारे बारे में भी बोल लो
मेरे पास तो 'वोट' ही एक ताकत है
सत्ता के लिए तो अपना मुखौटा खोल लो..

 

केजरीवाल के वाराणसी दौरे पर

वोट बैंक से इस टिप्पणी का कोई सरोकार नहीं अतः अतिवादी टिप्पणियों का स्वागत नहीं है।**

विचारधाराओं को रक्त से सींचा जाता है। चाहे वो वामपंथ हो दक्षिण पंथ हो या फिर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का झूठा श्रेय लेने वाली कोई भी पार्टी। सबने खून से सींचा है अपनी जड़ों को। ये बात केजरीवाल नहीं जानते जो भारतीय राजनीति की सतह पर बुलबुले की तरह उभरे हैं। डंडा खाने पर बुरका पहन के भागने वाले और कैंडल मार्च की हास्यास्पद और नम्र राजनीति करने वाले लोगों को भी यह समझना चाहिए।

फिर भी आल द बेस्ट।