Wednesday, December 18, 2013

अंजन कौन सजाएगा

 

राह घायल से सब कतरा के निकलते रहे,

उन्हें सलामत अस्पताल कौन पहुचाएगा.

 

तुमने गरीबी की रेखा खींच तो ली है,

फुटपाथ वालो  को इसमे कौन लाएगा.

 

यह गूंगों- बहरों की बस्ती हो चुकी है,

घात में बैठे दरिंदो से कौन  बचाएगा.

 

कोख से बच निकली बच्ची खुश तो है,

पर दहेज़ के जालिमो से कौन छुड़ाएगा.

 

ये घोटालो का मुल्क हो चूका है, मेरे यारो,

उजले कपड़ो में सयानो से कौन बचाएगा.

 

 

रह-रह कर नम हो जाती है, सभी की आँखे,

आँखों में अब अपने, 'अंजन' कौन सजाएगा.

 

Tuesday, December 17, 2013

कोई नाज हो जैसे


अब जिंदगी ऐसे ठिठुरने लगी, पूस की रात हो जैसे

वो याद आया तो आँखे नम लगी, कल की बात हो जैसे

गुम था, उसकी यादो की तपन में सारी रात बिताया मैने

ना बताया रिश्ता लिबास सा क्यों उतारा, कोई राज हो जैसे

अक्सर खुला रहता है, सुबह-शाम दरवाजा उस बदनाम का

उसके लिए हिन्दू-मुस्लिम, जात-पात कोई बकवास हो जैसे

इन गरीबो की दीवारों में, पलस्तर कब लगाएगी जिंदगी

हर शाम हवाए दीवारों ऐसे घुसती है, की कोई खास हो जैसे


       





आँखों के फूल खिलकर, खुद-ब-खुद शाख से गिर जाते है
तुमको गए हुए दिन हो गए, लगता है, की आज हो जैस
मेरे जाने के बाद भी खुदा हमेशा सलामत रखे, तुझे ए बेवफा
बेवफाई में अंजन आज भी जिन्दा है,  की कोई नाज हो जैसे



Friday, November 29, 2013

-: मुझे उस ज़माने में ले चलो :-


जब ,
दहेज न मिलने पर भी लोग ...
बहुओं को जलाते नहीं थे 
बच्चे  स्कूलों के नतीजे आने पर 
आत्महत्या नहीं करते थे 
बच्चे चौदह-पन्द्रह साल तक
बच्चे ही रहा करते थे 

जब
गांव में खुशहाल खलिहान, हुआ करते थे 
मशीनें कम,  इंसान ज्यादा हुआ करते थे 
खुले बदन को टैटू, से छुपा रहे है लोग
बंगलो से ज्यादा संस्कार हुआ करते थे

जब 
सयुंक्त परिवार में सब एक साथ रहा करते थे 
आर्थिक उदारीकरण, को कम लोग पहचानते थे
तब मानवाधिकार, को कम लोग ही जानते थे

अब
मुझे उस ज़माने में ले चलो, जहा
समय के साथ जमाना बदला न हो

सधन्यवाद ! 
विवेक अंजन श्रीवास्तव

बरसात :एक लघुकथा

श्यामलाल को पत्थरों से नहर की दिशा बदलते देख एक राहगीर ने आश्चर्य से पूंछा, "अरे भईया ये नहर तो सीधी है, फिर आप इसकी दिशा क्यों बदल रहे हो"
राहगीर की तरफ देखकर,थोडा नाराजगी भरे स्वर में श्याम लाल ने उत्तर दिया,…
       "भैया आंगे बढ़ो, तुम न समझोगे।ये कच्ची नहर है ,बांध का पानी भी खतरे के निशान से ऊपर है, अगर कही लगातार बारिस होने से बांध का पानी छोड़ा गया तो सबसे पहले ये नहर टूटेगी और मेरा मकान बहेगा "
राहगीर, "पर भैया आपका मकान तो ऊपर है, इस तरह से आपके पडोसी का मकान बह गया तो"
        "बहने दो अपने को क्या ?.. अपना तो बचा रहेगा ! "
ये बात सुनकर चिंतित राहगीर ने बस इतना कहा, "पडोसी के दर्द को अपना दर्द समझो, मुसीबत आप पर भी पड़ सकती है" और आंगे बढ़ गया
अगले दो तीन दिनों तक बारिश होती रही...    फिर एक दिन श्याम लाल का लड़का, माँ से पडोसी के बच्चे के साथ रात में पढ़ने को जिद करने लगा और मां भी बच्चे की जिद को मान गई,  बोली अपने पापा को बोलो छोड़ आये | 
ये बात सुनकर पहले तो श्याम लाल कुछ  घबराया फिर अपने लडके को छाता लेकर पडोसी के घर छोड़ आया |
       संयोगवस रात भर बारिस होती रही और सुबह बांध का पानी छोडा गया
चारो तरफ चीख पुकार और भगदड़ मच गई बाहर निकल कर श्यामलाल ने देखा तो उसके पडोसी का मकान पानी में बह रहा था,  लडके के बारे में सोच कर उसके पैरो से जैसे जमीन  खिसक गई वो इधर उधर भागा पर अपने लडके को नहीं पाकर रोने चिल्लाने लगा...
कुछ देर बाद प्रसाशन के कुछ लोग आये और बताया की थोड़ी दूरी पर ही कुछ लोग पेढ़ में फस गए थे, बचा लिए गए है ।
दौड़ता हुआ श्यामलाल उस जगह गया और अपने लडके को देख अति प्रसन्न हुआ ।
अपने लडके को गले लगाते ही उसे राहगीर की बात याद आ गई और सोचने लगा, 'अपनी सुविधा हेतु कोई काम करने से पहले अपने पडोसी को होने वाली परेशानी का ध्यान रखना चाहिये'
एक ओर बादल बरस रहे थे, वही दूसरी तरफ श्यामलाल के आंखो से पश्चाताप की बरसात हो रही थी ।    
           
सधन्यवाद :
विवेक अंजन श्रीवास्तव
सरलानगर,मैहर सतना (म.प्र.)

  

Monday, July 8, 2013

हम बिखर क्यों रहे हैं?



              ये सवाल बहुत दिनों  से उभर रहा था कि हम बिखर क्यों रहे हैं? हम चित्रगुप्त की संतान और अपने बारह  भाइयों के परिवार को तोड़कर क्यों अलग अलग गुट बना रहे हैं? क्या हम भी राजनीति का शिकार हो रहे हैं? ऐसा कोई पिता तो नहीं चाहता है कि हमारे ही बच्चे अपने परिवार से टूट कर अलग अलग बिखर जाएँ.
                 
रोज ही कहीं न कहीं कुछ देखने को मिल जाता है --
"
सक्सेना समाज" की मीटिंग.
"
माथुर समाज" के सांस्कृतिक कार्यक्रम.
"
निगम समाज" के कार्यों पर प्रकाश.  
             
इसी तरह से और भी बन्धु अपने समूह को एकत्र करके कुछ किया करते हैं. क्या इससे हमारे बीच की दरार नहीं दिख  रही है. जब हम आज से दो पीढ़ी पहले कट्टरता की हद से गुजर रहे थे. अपने ही बड़ों को कहते सुना था कि श्रीवास्तव के शादी श्रीवास्तव में ही होनी चाहिए , ये हमसे  नीचे होते हैं और हम ऊँचे होते हैं. वह मानसिकता अब जब बदल चुकी है तब हम क्यों इधर उधर बिखर रहे हैं. अब हम सभी भाइयों को एक स्तर पर रख कर बात करते हैं और सबको बराबर सम्मान देते हैं. अब तो शादी में भी ऐसा कोई व्यवधान हम नहीं देख रहे हैं फिर क्यों हम अलग अलग समाज की बात कर रहे हैं. 
            
ये शिकायत हम कहाँ करने जायेंगे? ये कायस्थ परिवार पत्रिका है और इसमें ही हम अपनों के एक साथ चलने और सोचने का आग्रह कर सकते  हैं और अगर हम कहीं बिखर रहे हैं तो उनको एक साथ लेकर चलने की बात कर सकते हैं.