Wednesday, May 3, 2017

मुझ से करो न प्यार॥

बहुत दिनों तक हुई परीक्षा
अब रूखा व्यवहार न हो।
अजी, बोल तो लिया करो तुम
चाहे मुझ पर प्यार न हो॥

जरा जरा सी बातों पर
मत रूठो मेरे अभिमानी।
लो प्रसन्न हो जाओ
गलती मैंने अपनी सब मानी॥

मैं भूलों की भरी पिटारी
और दया के तुम आगार।
सदा दिखाई दो तुम हँसते
चाहे मुझ से करो न प्यार॥


यह सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखी गई कविता "प्रियतम से" का एक अंश है। यह एक प्रेम कविता है जिसमें वक्ता अपनी गलतियों और कमजोरियों को स्वीकार करते हुए अपने प्रियतम से प्यार और दया की प्रार्थना कर रहा है।





Thursday, April 27, 2017

तुम्हारी भावनाएं

तुम्हारी आँखे
वैसी नहीं
जिन्हें कह सकूं नशीली
तुम्हारी मुस्कान
भी तो सजावटी नहीं
तुम्हारे दांत नहीं हैं
मोतियों जैसे
शक्लो-सूरत से भी
परी नहीं हो तुम।
पर फिर भी
सबसे बढ़कर हैं
तुम्हारी भावनाएं

Wednesday, April 12, 2017

प्रिय नहीं आना अब सपनों में

प्रिय नहीं आना अब सपनों में


स्मृति को तुम्हारे आलिंगन

कर रहने दो मुझे अपनों में

प्रिय नहीं आना अब सपनों में



पल उधेड़े कितने मैंने

उलझे थे उस इंद्र धनुष में

जिसको हमने साथ गढ़ा था

रंग भरे थे रिक्त क्षणों में

प्रिय नहीं आना अब सपनों में



रुमझुम गीतों के नूपुर में

जड़ी जो हमने गुनगुन बातें

उस सुर से बुन मैंने बाँधी

गाँठ स्वप्न और मेरे नयनों में

प्रिय नहीं आना अब सपनों में



कभी खनक उठते हँसते पल

कभी आँसू से सीले लम्हे

कभी मादक सी उन शामों को

बह जाने दो अब झरनों में

प्रिय नहीं आना अब सपनों में



Thursday, February 16, 2017

तब कैसे जीवन बीतेगा

प्रस्तुत है गोपालदास ''नीरज'' की कविता- इतना दानी नहीं ..

राशन नही मिलेगा भाषन
पीने को कोरा आश्वासन
नारों की बरसात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा

भीख मांगती भरी जवानी
नही बचा आँखों का पानी
बेशर्मी से बात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा

जातिवाद का जहर घोलते
राष्ट्र वेदी पर स्वार्थ तोलते
अपनो का प्रतिघात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा

आदर्शों की बात पुरानी
संस्कार बस एक कहानी
मानवता पर घात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा

नियम खोखले, तोड़े हैं दम
मैं ही मैं है, नही बचा हम
निज के हित की बात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा

मिलन कहाँ पर होगा..?

प्रस्तुत है गोपालदास ''नीरज'' की कविता

मै पीड़ा का राजकुँवर हूँ, तुम शहजादी रूपनगर की
हो भी गया प्रेम हम में तो, बोलो मिलन कहाँ पर होगा..?
मेरा कुर्ता सिला दुखों ने,
बदनामी ने काज निकाले,
तुम जो आँचल ओढ़े उसमें
अम्बर ने खुद जड़े सितारे
मैं केवल पानी ही पानी, तुम केवल मदिरा ही मदिरा
मिट भी गया भेद तन का तो, मन का हवन कहाँ पर होगा

मैं जन्मा इसलिये कि,
थोड़ी उम्र आँसुओं की बढ़ जाए
तुम आई इस हेतु कि मेंहदी
रोज नए कंगन बनवाए,
तुम उदयाचल, मैं अस्ताचल, तुम सुखांत की
मिल भी गए अंक अपने तो रस अवतरण कहाँ पर होगा?

मीलों जहाँ न पता खुशी का,
मै उस आँगन का इकलौता,
तुम उस घर की कली जहाँ
नित होंठ करें गीतों का न्यौता
मेरी उमर अमावस काली और तुम्हारी पूनम गोरी
मिल भी गई राशि अपनी तो बोलो लगन कहाँ पर होगा?

इतना दानी नही समय कि
हर गमले में फूल खिला दे
इतनी भावुक नही जिंदगी
हर खत का उत्तर भिजवा दे
मिलना अपना सरल नही पर फिर भी ये सोचा करता हूँ,
जब ना आदमी प्यार करेगा जाने भुवन कहाँ पर होगा..?

हो भी गया प्रेम हम में तो, बोलो मिलन कहाँ पर होगा..?