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Monday, June 8, 2009

कैसा है पुरखों का घर






कैसा है पुरखों का घर, लिख भेजिए
मिले आपको जब अवसर, लिख भेजिए ।

तब हम दिये जलाते थे, घर होता था उजियारा ।
बिजली के आने पर भी, क्यों छाया है अँधियारा ।
चिड़ियों के घोंसले किधर, लिख भेजिए ।

गाँव की ख़बर छपती रहती अक्सर अख़बारों में ।
पता चला है, पड़ने लगीं दरारें दीवारों में ।
टिकी हुई है छत किस पर, लिख भेजिए ।

तिनका-तिनका जोड़-जोड़ कर जिस को रचा-गढ़ा था ।
दाना-दाना बचा-बचा कर जो घर कभी बढ़ा था ।
किसकी थी वह बुरी नज़र, लिख भेजिए ।

जिन खेतों की फ़सल देख कर हम सब थे इतराते ।
उन खेतों का नाम जीभ पर, लाने से कतराते ।
इससे भी हो बुरी ख़बर, लिख भेजिए