अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और जीवन-कर्म के बीच की दूरी को निरंतर कम करने की कोशिश का संघर्ष....
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Thursday, March 17, 2016
आदमी बदलते देखा है
कौन कहता है अपनी किस्मत अपने हाथ नहीं मैंने कर्मों की क़लम से खींची किस्मत रेखा है आपने आदमी के पल-पल बदलते देखे होंगे मैंने यहाँ पल-पल, आदमी बदलते देखा है
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