अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और जीवन-कर्म के बीच की दूरी को निरंतर कम करने की कोशिश का संघर्ष....
Friday, September 13, 2019
हिंदी भाषा के विकास में साहित्यकारों की भूमिका
इश्क भी क्या चीज़ है
"अरे इतनी सी बात पे परेशान होने की क्या जरुरत ये लो तुम मेरी फाइल दिखा देना,हाँ मेरी राइटिंग थोडी गन्दी है" अनुराग ने मुस्कुराते हुए सुबह से परेशान भावना की ओर अपनी फाइल बढ़ा दी, भावना को समझ नहीं आ रहा था की वो क्या करे| "अरे ! नहीं अनुराग तुमने साल भर मेंहनत कर के ये फाइल बनायीं है और अगर आज मेरी लापरवाही की वजह से तुम्हारे लिए कोई परेशानी होगी तो शायद मुझे अच्छा नहीं लगेगा| अगर मैंने ध्यान रखा होता तो वो फाइल गुम ना हुई होती " अरे! come-on भावना बच्चो जैसी बात मत करो आज तुम्हे जरुरत है इसलिए दे रहा हूँ ऐसे भी मेरा टर्न कल है तब तक मैं बना लूँगा फाइल" शायद इस अपनेपन को भावना नकार नहीं सकती थी ऊपर से जरुरत ने उसे और मजबूर कर दिया | "अरे चलो कैंटीन में कुछ खाते हैं यार मुझे बहुत भूख लग रही है" अनुराग के इस बात से सब सहमत हो गए उनके पूरे छ: लोगो का ग्रुप कैंटीन की कोने वाली टेबल पर बैठ के आर्डर का इंतजार करने लगा|
भावना आज खामोश थी उसके सर का बोझ तो हट गया था पर दिल बहुत भारी था| लोग अपनी बातो में मस्त थे पर वो लगातार अनुराग को देखे जा रही थी | जुबान से खामोश मगर अन्दर जाने कितना तूफान | आखिरकार आँखों ने अनुराग के सामने सवाल उढ़ेल ही दिए "क्यों तुम मुझे एहसान से लादे जा रहे हो पहले के एहसान क्या कम हैं मुझ पर जो आज एक और दे दिया | क्यों नहीं कभी कुछ मांग लेते मुझसे, क्यों नहीं मेरे दिल को ये एहसास होने देते की मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकती, इतना प्यार करते हो पर कभी अपनी आँखों से भी नहीं ज़ाहीर होने देते | हाँ, मैं कुछ नहीं दे सकती तुम्हे पर मैं ये एक बार तुम्हारे सामने स्वीकार करना चाहती हूँ | तुम्हारे एहसानो का बोझ बहुत भारी है | इसे लेके अब और नहीं चला जाता मुझ से "
भावना के दिमाग की इन सारी बातों को जैसे अनुराग ने साफ सुन लिया हो | बहुत ही सहज भाव से उसने भावना की आँखों में देख एक हल्की सी मुस्कराहट से ही जवाब दे दिया "हाँ मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ पर क्या प्यार बस पाने का ही नाम है अगर हाँ तो तुमसे बहुत ज्यादा मैंने पाया है तुम्हारे लिए कुछ भी कर पाने का सुकून मुझे जाने कितने दिनों तक खुश रखता है | तुमसे मांग मैं प्यार को छोटा नहीं कर सकता मैं तुम्हे, तुम्हारी मजबूरिया सब कुछ समझता हूँ | मुझे जो चाहिए वो मुझे तुम अनजाने में ही दे देती हो| तुम्हारी ख़ुशी से ज्यादा मुझे क्या चाहिए होगा | तुम्हारी ख़ुशी शायद तुम्हे भी उतना खुश न करती हो जितना मुझे कर देती है | और इस वक़्त भी मैं तुम्हे हँसता हुआ देखना चाहता हूँ | सच में बस एक बार मुस्कुरा दो ना मेरे लिए, लो मांग भी लिया अब न कहना की कुछ माँगा नहीं "| बात आँखों में हुई थीं पर भावना की आँखों में आंसू और होठो पे मुस्कान थी
……….. ये इश्क भी क्या चीज़ है |
यूँ तो इश्क हो जाता है बस चन्द कदम साथ चलकर के
पर ये मोम नहीं जो खत्म हो जाये बस थोडी देर जल कर के
लकडी जल कर कुछ देर में ही कोयला हो जाया करती है
पर कोयले से हीरा बनता है सैकडो साल घुटन सह कर के
Saturday, July 13, 2019
साहबगीरी के दोहे
साहब बोलें आम को, अगर भूल से नीम।
फर्ज तुम्हारा आम को, काट उगाओ नीम॥
साहब बोलें गर सखे, सोलह दूनी आठ।
सदा याद रखना उसे, बने रहेंगे ठाठ॥
साहब जब जब हँस पड़ैं, तुम भी हँस दो साथ।
बात हँसी की हो सखे, या हो दुख की बात॥
साहब को उर में धरो, जपो साब का नाम।
साहब खुश गर हो गए, बनैं बीगड़े काम॥
जय हो साहब बोलि के, सदा नवाओ माथ।
जो फल साहब दे सकें, नहीं देत रघुनाथ॥
साहब के गुण-गान से, धुलैं आप के पाप।
बाल न बाँका कर सकै, 'विजीलेन्स' का बाप॥
साहब को सूचित करो, हर छोटी सी बात।
काम करो या ना करो, कौन पूछने जात॥
आगे बढ़ते जाओगे, कभी न छोड़ो हाथ।
बाथरूम में भी सखे, जाओ साब के साथ॥
कितना भी तुम कर मरो, हो जाओगे फेल।
सुबह-शाम गर साब को, नहीं लगाया तेल॥
Friday, May 10, 2019
"वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!-प्रयाण गीत
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"वीर
तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!" एक प्रेरणादायक और
देशभक्ति से ओत-प्रोत
कविता है, जिसे द्वारिका
प्रसाद माहेश्वरी ने रचा है ✨ कविता का सार: यह कविता साहस, धैर्य और राष्ट्रभक्ति का
संदेश देती है। इसमें
बालकों को, युवाओं को
और हर नागरिक को
यह प्रेरणा दी गई है
कि वे बिना रुके,
बिना झुके, अपने लक्ष्य की
ओर बढ़ते रहें — चाहे राह में
कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों
न हों। 🖋️ मुख्य विषय-वस्तु:
📚 प्रसंग और उपयोग: यह कविता अक्सर विद्यालयों की पाठ्यपुस्तकों में शामिल की
जाती है (जैसे NCERT की
कक्षा 6 की पुस्तक "दूर्वा" में), और राष्ट्रभक्ति कार्यक्रमों, स्कूल सभाओं, तथा प्रेरणात्मक भाषणों में पढ़ी या
गाई जाती है Linkls- 1 : http://kavitakosh.org/kk/वीर_तुम_बढ़े_चलो_/_द्वारिका_प्रसाद_माहेश्वरी 2 : https://www.hindwi.org/kavita/badhe-chalo-dwarika-prasad-maheshwari-kavita वीर
तुम बढ़े चलो! धीर
तुम बढ़े चलो! हाथ
में ध्वजा रहे बाल दल
सजा रहे ध्वज
कभी झुके नहीं दल
कभी रुके नहीं वीर
तुम बढ़े चलो! धीर
तुम बढ़े चलो! सामने
पहाड़ हो सिंह की
दहाड़ हो तुम
निडर डरो नहीं तुम
निडर डटो वहीं वीर
तुम बढ़े चलो! धीर
तुम बढ़े चलो! प्रपात
हो कि रात हो
संग हो न साथ
हो सूर्य
से बढ़े चलो चंद्र
से बढ़े चलो वीर,
तुम बढ़े चलो धीर,
तुम बढ़े चलो। एक ध्वज लिए हुए
एक प्रण किए हुए मातृ
भूमि के लिए पितृ
भूमि के लिए वीर
तुम बढ़े चला! धीर
तुम बढ़े चलो! अन्न
भूमि में भरा वारि
भूमि में भरा यत्न
कर निकाल लो रत्न भर
निकाल लो वीर
तुम बढ़े चलो! धीर
तुम बढ़े चलो!
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