Friday, January 11, 2019

जमाने ने कहा टूटी हुई तश्वीर बनती है,

भजन "शिरडी वाले साईं बाबा आया है तेरे दर पे सवाली" एक अत्यंत भावुक और श्रद्धा से भरा गीत है, जिसे मोहम्मद रफ़ी ने अपनी मधुर आवाज़ में गाया है। यह भजन साईं बाबा की महिमा, करुणा और भक्तों के प्रति उनके प्रेम को दर्शाता है।



🎵 भजन का विवरण:

  • गीत: शिरडी वाले साईं बाबा
  • मुख्य पंक्तियाँ:
    "ज़माने ने कहा टूटी हुई तस्वीर बनती है,
    तेरे दरबार में बिगड़ी हुई तक़दीर बनती है..."
  • गायक: मोहम्मद रफ़ी
  • शैली: भक्ति गीत / कव्वाली शैली
  • भाव: समर्पण, श्रद्धा, और आस्था
  • मुख्य विषय:
    यह भजन बताता है कि साईं बाबा के दरबार में हर टूटी उम्मीद जुड़ जाती है, हर बिगड़ी तक़दीर सँवर जाती है। अमीर-गरीब, छोटा-बड़ासब उनके दर पर समान हैं।

🌟 प्रमुख भावनाएँ:

  • दया और करुणा: बाबा हर दुखी की सुनते हैं।
  • आस्था और विश्वास: जो भी उनके दर पर आता है, खाली नहीं लौटता।
  • याद और समर्पण: यह गीत एक भक्त की पुकार है, जो बाबा से अपने जीवन की दिशा माँगता है।

 

जमाने ने कहा टूटी हुई तश्वीर बनती है,

तेरे दरबार में बिगड़ी हुई तक्दीर बनती है

 

तारीफ तेरी निकली है दिल से,

आयी है लव बनके कवाली

शिरडी वाले सांई बाबा

आया है तेरे दर पे सवाली

 

शिरडी वाले सांई बाबा

आया है तेरे दर पे सवाली

 

लव पे दुआएँ आँखो में आंसू

दिल में उम्मीदें पर झोली खाली

शिरडी वाले सांई बाबा

आया है तेरे दर पे सवाली

 

दर पे सवाली आया दर पे सवाली,

शिरडी वाले सांई बाबा

आया है तेरे दर पे सवाली

 

मेरे सांई देवा तेरे सब नाम लेवा

मेरे सांई देवा तेरे सब नाम लेवा

 

खुदा इनसान सारे सभी, तुझको हैं प्यारे,

सुने फरियाद सबकी, तुझे है याद सबकी,

बड़ा या कोई छोटा, नहीं मायूस लूटा,

अमीरों का सहारा, गरीबों का गुजारा,

तेरी रहमत का किस्सा ब्यान अकबर करे क्या,

दो दिन की दुनिया, दुनिया है गुलशन,

सब फूल कांटे, तू सब का माली,

शिरडी वाले सांई बाबा

आया है तेरे दर पे सवाली

 

खुदा की शान तुझमें,

दिखें भगवान तुझमें--------2

 

 

तुझे सब मानते है,

तेरा घर जानते है,

चले आते है दौड़े,

जो खुश किस्मत है थोड़े,

ये हर राही की मन्जिल,

ये हर कश्ती का साहिल,

जिसे सब ने निकाला,

उसे तूने सम्भाला,

 

जिसे सबने निकाला, उसे तूने सम्भाला,,,,,,,,,,,,,,

 

तू बिछड़ों को मिलाये,

बुझे दीपक जलाये---------2

 

 

ये गम की रातें, रातें ये काली,

इनको बनादे ईद और दीवाली

 

शिरडी वाले सांई बाबा

आया है तेरे दर पे सवाली

 

लव पे दुआएँ आँखो में आंसू

दिल में उम्मीदें पर झोली खाली

 

शिरडी वाले सांई बाबा

आया है तेरे दर पे सवाली--------4

 

Friday, December 21, 2018

भारत आईटी क्षेत्र में अव्वल?

इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, या आईटी, या सूचना प्रौद्योगिकी के संसार का एक जाना-माना ब्रांड है- भारत। आईटी पेशेवरों की संख्या के हिसाब से दुनिया में भारत दूसरे नंबर पर आता है। भारत से अधिक आईटी पेशेवर केवल अमेरिका में हैं।

साथ ही भारत इंजीनियरों की संख्या के हिसाब से दुनिया में पहले नंबर पर आता है। भारत में हर साल पाँच-साढ़े पाँच लाख इंजीनियर बन रहे हैं। और दूसरी शाखाओं के भी बहुत सारे इंजीनियर आईटी के बढ़ते प्रभाव और बढ़ती माँग को देखते हुए आईटी क्षेत्र से जुड़ते जा रहे हैं और वो भी भारत के आईटी पेशेवरों की फौज का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

आईटी क्षेत्र में भारतीय इंजीनियरों के दबदबे का आलम ये है कि आज जहाँ भारत के आईटी पेशेवर दुनिया के कोने-कोने में नजर आते हैं, वहीं दुनिया के कोने-कोने से लोग आईटी सेवाओं के लिए भारतीय कंपनियों से आस लगाए रहते हैं।

मगर क्यों है भारत आईटी क्षेत्र में अव्वल? सिर्फ संयोग ने सफलता दिलाई भारत को या भारतीयों ने सचमुच कुछ खास परिश्रम और प्रयास करके ये नाम और मुकाम अर्जित किया है?

कारण कई हैं, कारक कई हैं- भारतीय पेशेवर इंजीनियरों की सफलता की इस यात्रा में कुछ रास्तों को बनाना पड़ा, तो कहीं कुछ राहें खुद निकलती चली गईं।

 
शुरुआत : भारत की इस आईटी यात्रा की शुरुआत हुई चार-पाँच दशक पहले। ऐसे समय, जब भारत में योग्य इंजीनियर तो बन गए मगर उनकी योग्यता को परखने या उनके निखरने के लिए तब देश में कोई अवसर नहीं थे।

ऐसे में भारतीय इंजीनियरों ने विदेशों की ओर कदम बढ़ाए, खासतौर पर अमेरिका में जहाँ योग्यता की परख भी होती थी, निखरने का मौक़ा भी मिलता था। आहिस्ता-आहिस्ता भारतीय इंजीनियरों ने वहाँ अपनी योग्यता और परिश्रम से स्थान बनाना शुरू किया और धीरे-धीरे वे स्थापित होने लगे।

अमेरिका में एक सॉफ्टवेयर डेवलपर के तौर पर शुरुआत करने के बाद दो टेक्नोलॉजी कंपनियाँ शुरू करने वाले, ड्यूक विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग विभाग में प्राध्यापक प्रोफेसर विवेक वधवा बताते हैं कि भारतीयों ने एक-दूसरे की सहायता के साथ-साथ नेटवर्क बनाना शुरू किया और फिर वो आगे निकलते चले गए।

विवेक वधवा कहते हैं, 'डॉटकॉम क्रांति के समय सिलिकन वैली में 16 प्रतिशत नई कंपनियाँ भारतीयों ने खोली जो बहुत बड़ी बात है क्योंकि आबादी के हिसाब से भारतीय लोग अमेरिकी आबादी का केवल एक प्रतिशत हिस्सा थे।'

भारतीय पेशेवर इंजीनियरों ने आहिस्ता-आहिस्ता अमेरिका में जड़ें जमा लीं, फिर समय के साथ-साथ तकनीकें बदली, सोच बदली समीकरण बदले। अमेरिका गए भारतीय पेशेवरों का आत्मविश्वास बढ़ा, वो लोग जो नौकरियाँ करने गए थे, अब दूसरों को नौकरियाँ देने और दिलाने की भूमिका में उतर आए, ऐसे में उन्हें याद आईं- अपनी पुरानी जड़ें।

 
जड़ से जुड़ाव : वे इंजीनियर जो अमेरिका में पाँव जमा चुके थे और जिनका भारत से नाता बना हुआ था उन्होंने पाया कि एक ओर जहाँ भारत में योग्य इंजीनियरों के लिए रास्ते सीमित हैं, वहीं अमेरिका में काम का अंबार लगा है, और लोग नहीं हैं।

पिछले दो दशक से सिलिकन वैली में काम कर रहे आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र मनीष चंद्रा कहते हैं, '80 के दशक के अंत तक ऐसे भारतीय इंजीनियर जो अमेरिका में जम चुके थे उन्होंने भारत के ऐसे इंजीनियरों के बारे में सोचना किया जिनके लिए भारत में नौकरियाँ नहीं थीं।'

मनीष बताते हैं कि भारतीय पेशेवरों के अमेरिका में दबदबा बनने की शुरुआत इसतरह से हुई कि पहले-पहले भारतीय इंजीनियरों ने अस्थई वीजा पर अमेरिका जाकर काम करना शुरू किया।

अस्सी-नब्बे के दशक का ये वो समय था जब दुनिया तेजी से बदल रही थी और जैसे-जैसे वर्ष 2000 करीब आया, वाई-टू-के नामक एक घटना ने आईटी क्षेत्र में अचानक जबरदस्त अवसर पैदा कर दिए।

मनीष कहते हैं, '80 के दशक से 2000 तक तकनीक काफी बदली और भारतीय उसका हिस्सा थे। ऐसे में वाई-टू-के घटना के समय जब वर्ष 2000 में ये हुआ कि सारे कंप्यूटर बदले जाएँगे तो आईटी का काम अचानक बढ़ गया।'

 
इंग्लिश-क्वालिटि-क्वांटिटि : मगर सवाल ये उठता है कि ऐसे समय में जब तकनीक की दुनिया बदल रही थी तो बाकी देश क्यों पीछे रह गए और भारत क्यों आगे निकल गया?

आईआईटी कानपुर के पूर्व प्राध्यापक और वर्तमान में बंगलोर स्थित इंटरनेशनल इंस्टीच्युट ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के निदेशक प्रोफेसर एस सदगोपन इसके तीन कारण गिनाते हैं और इसका नाम उन्होंने दिया है- 'इक्यूक्यू एडवांटेज' यानी इंग्लिश क्वालिटि क्वांटिटि।

प्रोफेसर सदगोपन कहते हैं, 'आज भारत हर साल साढ़े पाँच लाख इंजीनियर बना रहा है, दुनिया में और कहीं इतनी बड़ी संख्या में इंजीनियर नहीं बनते, फिर भारत में अंग्रेजी का भी अच्छा-खासा चलन है- तो क्वालिटि-क्वांटिटि और इंग्लिश- तीनों मिलकर भारत को लाभ पहुँचा रहे हैं।'

प्रोफेसर सदगोपन के अनुसार इ-क्यू-क्यू ऐडवांटेज के कारण ही भारत दूसरे देशों जैसे चीन, फिलीपींस, ऑयरलैंड और इसराइल जैसे देशों से आगे निकल जाता है।

प्रोफेसर सदगोपन कहते हैं, 'चीन क्वांटिटि और क्वालिटि के मामले में भारत से बेहतर है मगर उनकी समस्या अभी तक अंग्रेजी की है; फिलीपींस क्वालिटि में पिछड़ता है और ऑयरलैंड-इसराइल क्वांटिटि में भारत की बराबरी नहीं कर पाते।'

ऑउटसोर्सिंग का फायदा : भारत के आईटी क्षेत्र की एक अलग पहचान ये रही है कि ऑउटसोर्सिंग ने उसे विश्व में एक अलग स्थान दिलाया है। ऑउटसोर्सिंग- यानी दूसरे देशों के काम को ऐसे देशों में करवाना जहाँ लागत कम हो- भारत इसका आदर्श केंद्र बना।

आईआईटी दिल्ली में प्राध्यापक रहे और वर्तमान में दिल्ली स्थित इंद्रप्र्स्थ इंस्टिच्यूट ऑफ इन्‍फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के निदेशक प्रोफेसर पंकज जलोटे कहते हैं कि भारत को पहल करने का लाभ हुआ।

प्रोफेसर जलोटे कहते हैं, '25 साल पहले भारत में जब ऑउटसोर्सिंग शुरू हुई तो तब किसी और देश की निगाह इसपर नहीं थी, तो भारत को पहल करने का निश्चित रूप से फायदा हुआ।'

प्रोफेसर जलोटे के अनुसार बाद के वर्षों जब टेलीकॉम की सुविधा सस्ती हुई तो ऑउटसोर्सिंग का काम और आसान हो गया और भारत आगे निकलता चला गया।

मिला-जुलाकर आईटी क्षेत्र में पूरे विश्वपटल पर दबदबा रखनेवाली भारत की प्रतिष्ठा का श्रेय निश्चित रूप से उन पेशेवर इंजीनियरों को जाता है जिन्होंने अपने पुरुषार्थ और परिश्रम के बल-बूते सात समुंदर पार जाकर अवसरों को तलाशा।

आज वही भारतीय दुनिया के लिए अवसर बना रहे हैं।

Thursday, November 15, 2018

तुम्हारे लिए, तुम्हारे बिना।

कविता बेहद भावुक, कोमल और स्मृतियों से भरी हुई हैजैसे किसी अधूरे मिलन की खुशबू हवा में तैर रही हो। मैंने आपकी मूल भावना को सहेजते हुए इसे थोड़ा तराशा है ताकि प्रवाह और सौंदर्य और भी निखर सके:

 


खिले थे गुलाबी, नीले,
हरे और जामुनी फूल
हर उस जगह
जहाँ छुआ था तुमने मुझे।

महक उठी थी केसर
जहाँ चूमा था तुमने,
और बहने लगी थी
मेरे भीतर कोई नशीली बयार
जब मुस्कुराए थे तुम।

भीग गई थी मेरे मन की तमन्ना
जब उठकर चुपचाप चल दिए थे तुम।
मैं अब भी उड़ रही हूँ
यादों के भँवर में
एक अकेले पीपल के पत्ते की तरह।

तुम रहे हो ना?
थामने आज मुझे ख्वाबों में?
मेरे दिल का उदास कोना
नींद में खो जाना चाहता है,
और मन
कहीं तुम्हारे बिना,
बस तुम्हारे लिए भटक जाना चाहता है।

 

 

Wednesday, October 3, 2018

प्यार-प्यार सा मिल जाना।

कविता बेहद कोमल, भावनाओं से भरी और लयात्मक हैजैसे प्रेम की हर छोटी-छोटी अनुभूति को शब्दों में पिरो दिया गया हो। मैंने आपकी मूल भावनाओं को सहेजते हुए इसे थोड़ा तराशा है ताकि प्रवाह और सौंदर्य और भी निखर सके:

 

हल्के-हल्के हाथों से तुम्हारा
हल्का-हल्का वो सहलाना,
बहके-बहके मौसम में हमारा
धीरे-धीरे बहक जाना।

ठंडी-ठंडी साँसों में तुम्हारा
ठंडा-ठंडा वो जादू,
भीगी-भीगी बातों में मेरा
भीगा-भीगा अफ़साना।

प्यारे-प्यारे जज़्बातों में तुम्हारा
प्यारा-प्यारा खिल जाना,
ख्वाब-ख्वाब सी चाँदनी में
ख्वाब-सा हो जाना।

रात-रात की तन्हाई में हमारा
रात-रात भर ना सोना,
कली-कली की ख़ुशबू में मेरा
कली-कली सा बिखर जाना।

प्यार-प्यार की बातों में हमारा
प्यार-प्यार सा मिल जाना।

 

Friday, September 14, 2018

प्रेम की अनुगूँज है।

प्रेम एक अनुभूति है
शाश्वत रिश्तों के मर्म की
सुर्ख जोड़े में लिपटे गर्व की
विरक्ति से उपजे दर्द की
प्रेम अनुभूति है।

प्रेम एक रिश्ता है
दिलों के इकरार का
ममत्व के दुलार का
मानवता की पुकार का
प्रेम एक रिश्ता है।

प्रेम दिखता है
किसी मासूम-सी मुस्कान में
नवविवाहिता की माँग में
वीरों की आन-बान में
प्रेम दिखता है।

प्रेम की अनुगूँज है
दिल के झंकृ‍त तारों में
बागों में बहारों में
फागुन की मस्त फुहारों में
प्रेम की अनुगूँज है।

sabhar- विनीता मोटलानी