Friday, December 21, 2018

भारत आईटी क्षेत्र में अव्वल?

इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, या आईटी, या सूचना प्रौद्योगिकी के संसार का एक जाना-माना ब्रांड है- भारत। आईटी पेशेवरों की संख्या के हिसाब से दुनिया में भारत दूसरे नंबर पर आता है। भारत से अधिक आईटी पेशेवर केवल अमेरिका में हैं।

साथ ही भारत इंजीनियरों की संख्या के हिसाब से दुनिया में पहले नंबर पर आता है। भारत में हर साल पाँच-साढ़े पाँच लाख इंजीनियर बन रहे हैं। और दूसरी शाखाओं के भी बहुत सारे इंजीनियर आईटी के बढ़ते प्रभाव और बढ़ती माँग को देखते हुए आईटी क्षेत्र से जुड़ते जा रहे हैं और वो भी भारत के आईटी पेशेवरों की फौज का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

आईटी क्षेत्र में भारतीय इंजीनियरों के दबदबे का आलम ये है कि आज जहाँ भारत के आईटी पेशेवर दुनिया के कोने-कोने में नजर आते हैं, वहीं दुनिया के कोने-कोने से लोग आईटी सेवाओं के लिए भारतीय कंपनियों से आस लगाए रहते हैं।

मगर क्यों है भारत आईटी क्षेत्र में अव्वल? सिर्फ संयोग ने सफलता दिलाई भारत को या भारतीयों ने सचमुच कुछ खास परिश्रम और प्रयास करके ये नाम और मुकाम अर्जित किया है?

कारण कई हैं, कारक कई हैं- भारतीय पेशेवर इंजीनियरों की सफलता की इस यात्रा में कुछ रास्तों को बनाना पड़ा, तो कहीं कुछ राहें खुद निकलती चली गईं।

 
शुरुआत : भारत की इस आईटी यात्रा की शुरुआत हुई चार-पाँच दशक पहले। ऐसे समय, जब भारत में योग्य इंजीनियर तो बन गए मगर उनकी योग्यता को परखने या उनके निखरने के लिए तब देश में कोई अवसर नहीं थे।

ऐसे में भारतीय इंजीनियरों ने विदेशों की ओर कदम बढ़ाए, खासतौर पर अमेरिका में जहाँ योग्यता की परख भी होती थी, निखरने का मौक़ा भी मिलता था। आहिस्ता-आहिस्ता भारतीय इंजीनियरों ने वहाँ अपनी योग्यता और परिश्रम से स्थान बनाना शुरू किया और धीरे-धीरे वे स्थापित होने लगे।

अमेरिका में एक सॉफ्टवेयर डेवलपर के तौर पर शुरुआत करने के बाद दो टेक्नोलॉजी कंपनियाँ शुरू करने वाले, ड्यूक विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग विभाग में प्राध्यापक प्रोफेसर विवेक वधवा बताते हैं कि भारतीयों ने एक-दूसरे की सहायता के साथ-साथ नेटवर्क बनाना शुरू किया और फिर वो आगे निकलते चले गए।

विवेक वधवा कहते हैं, 'डॉटकॉम क्रांति के समय सिलिकन वैली में 16 प्रतिशत नई कंपनियाँ भारतीयों ने खोली जो बहुत बड़ी बात है क्योंकि आबादी के हिसाब से भारतीय लोग अमेरिकी आबादी का केवल एक प्रतिशत हिस्सा थे।'

भारतीय पेशेवर इंजीनियरों ने आहिस्ता-आहिस्ता अमेरिका में जड़ें जमा लीं, फिर समय के साथ-साथ तकनीकें बदली, सोच बदली समीकरण बदले। अमेरिका गए भारतीय पेशेवरों का आत्मविश्वास बढ़ा, वो लोग जो नौकरियाँ करने गए थे, अब दूसरों को नौकरियाँ देने और दिलाने की भूमिका में उतर आए, ऐसे में उन्हें याद आईं- अपनी पुरानी जड़ें।

 
जड़ से जुड़ाव : वे इंजीनियर जो अमेरिका में पाँव जमा चुके थे और जिनका भारत से नाता बना हुआ था उन्होंने पाया कि एक ओर जहाँ भारत में योग्य इंजीनियरों के लिए रास्ते सीमित हैं, वहीं अमेरिका में काम का अंबार लगा है, और लोग नहीं हैं।

पिछले दो दशक से सिलिकन वैली में काम कर रहे आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र मनीष चंद्रा कहते हैं, '80 के दशक के अंत तक ऐसे भारतीय इंजीनियर जो अमेरिका में जम चुके थे उन्होंने भारत के ऐसे इंजीनियरों के बारे में सोचना किया जिनके लिए भारत में नौकरियाँ नहीं थीं।'

मनीष बताते हैं कि भारतीय पेशेवरों के अमेरिका में दबदबा बनने की शुरुआत इसतरह से हुई कि पहले-पहले भारतीय इंजीनियरों ने अस्थई वीजा पर अमेरिका जाकर काम करना शुरू किया।

अस्सी-नब्बे के दशक का ये वो समय था जब दुनिया तेजी से बदल रही थी और जैसे-जैसे वर्ष 2000 करीब आया, वाई-टू-के नामक एक घटना ने आईटी क्षेत्र में अचानक जबरदस्त अवसर पैदा कर दिए।

मनीष कहते हैं, '80 के दशक से 2000 तक तकनीक काफी बदली और भारतीय उसका हिस्सा थे। ऐसे में वाई-टू-के घटना के समय जब वर्ष 2000 में ये हुआ कि सारे कंप्यूटर बदले जाएँगे तो आईटी का काम अचानक बढ़ गया।'

 
इंग्लिश-क्वालिटि-क्वांटिटि : मगर सवाल ये उठता है कि ऐसे समय में जब तकनीक की दुनिया बदल रही थी तो बाकी देश क्यों पीछे रह गए और भारत क्यों आगे निकल गया?

आईआईटी कानपुर के पूर्व प्राध्यापक और वर्तमान में बंगलोर स्थित इंटरनेशनल इंस्टीच्युट ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के निदेशक प्रोफेसर एस सदगोपन इसके तीन कारण गिनाते हैं और इसका नाम उन्होंने दिया है- 'इक्यूक्यू एडवांटेज' यानी इंग्लिश क्वालिटि क्वांटिटि।

प्रोफेसर सदगोपन कहते हैं, 'आज भारत हर साल साढ़े पाँच लाख इंजीनियर बना रहा है, दुनिया में और कहीं इतनी बड़ी संख्या में इंजीनियर नहीं बनते, फिर भारत में अंग्रेजी का भी अच्छा-खासा चलन है- तो क्वालिटि-क्वांटिटि और इंग्लिश- तीनों मिलकर भारत को लाभ पहुँचा रहे हैं।'

प्रोफेसर सदगोपन के अनुसार इ-क्यू-क्यू ऐडवांटेज के कारण ही भारत दूसरे देशों जैसे चीन, फिलीपींस, ऑयरलैंड और इसराइल जैसे देशों से आगे निकल जाता है।

प्रोफेसर सदगोपन कहते हैं, 'चीन क्वांटिटि और क्वालिटि के मामले में भारत से बेहतर है मगर उनकी समस्या अभी तक अंग्रेजी की है; फिलीपींस क्वालिटि में पिछड़ता है और ऑयरलैंड-इसराइल क्वांटिटि में भारत की बराबरी नहीं कर पाते।'

ऑउटसोर्सिंग का फायदा : भारत के आईटी क्षेत्र की एक अलग पहचान ये रही है कि ऑउटसोर्सिंग ने उसे विश्व में एक अलग स्थान दिलाया है। ऑउटसोर्सिंग- यानी दूसरे देशों के काम को ऐसे देशों में करवाना जहाँ लागत कम हो- भारत इसका आदर्श केंद्र बना।

आईआईटी दिल्ली में प्राध्यापक रहे और वर्तमान में दिल्ली स्थित इंद्रप्र्स्थ इंस्टिच्यूट ऑफ इन्‍फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के निदेशक प्रोफेसर पंकज जलोटे कहते हैं कि भारत को पहल करने का लाभ हुआ।

प्रोफेसर जलोटे कहते हैं, '25 साल पहले भारत में जब ऑउटसोर्सिंग शुरू हुई तो तब किसी और देश की निगाह इसपर नहीं थी, तो भारत को पहल करने का निश्चित रूप से फायदा हुआ।'

प्रोफेसर जलोटे के अनुसार बाद के वर्षों जब टेलीकॉम की सुविधा सस्ती हुई तो ऑउटसोर्सिंग का काम और आसान हो गया और भारत आगे निकलता चला गया।

मिला-जुलाकर आईटी क्षेत्र में पूरे विश्वपटल पर दबदबा रखनेवाली भारत की प्रतिष्ठा का श्रेय निश्चित रूप से उन पेशेवर इंजीनियरों को जाता है जिन्होंने अपने पुरुषार्थ और परिश्रम के बल-बूते सात समुंदर पार जाकर अवसरों को तलाशा।

आज वही भारतीय दुनिया के लिए अवसर बना रहे हैं।

Thursday, November 15, 2018

तुम्हारे लिए, तुम्हारे बिना।

कविता बेहद भावुक, कोमल और स्मृतियों से भरी हुई हैजैसे किसी अधूरे मिलन की खुशबू हवा में तैर रही हो। मैंने आपकी मूल भावना को सहेजते हुए इसे थोड़ा तराशा है ताकि प्रवाह और सौंदर्य और भी निखर सके:

 


खिले थे गुलाबी, नीले,
हरे और जामुनी फूल
हर उस जगह
जहाँ छुआ था तुमने मुझे।

महक उठी थी केसर
जहाँ चूमा था तुमने,
और बहने लगी थी
मेरे भीतर कोई नशीली बयार
जब मुस्कुराए थे तुम।

भीग गई थी मेरे मन की तमन्ना
जब उठकर चुपचाप चल दिए थे तुम।
मैं अब भी उड़ रही हूँ
यादों के भँवर में
एक अकेले पीपल के पत्ते की तरह।

तुम रहे हो ना?
थामने आज मुझे ख्वाबों में?
मेरे दिल का उदास कोना
नींद में खो जाना चाहता है,
और मन
कहीं तुम्हारे बिना,
बस तुम्हारे लिए भटक जाना चाहता है।

 

 

Wednesday, October 3, 2018

प्यार-प्यार सा मिल जाना।

कविता बेहद कोमल, भावनाओं से भरी और लयात्मक हैजैसे प्रेम की हर छोटी-छोटी अनुभूति को शब्दों में पिरो दिया गया हो। मैंने आपकी मूल भावनाओं को सहेजते हुए इसे थोड़ा तराशा है ताकि प्रवाह और सौंदर्य और भी निखर सके:

 

हल्के-हल्के हाथों से तुम्हारा
हल्का-हल्का वो सहलाना,
बहके-बहके मौसम में हमारा
धीरे-धीरे बहक जाना।

ठंडी-ठंडी साँसों में तुम्हारा
ठंडा-ठंडा वो जादू,
भीगी-भीगी बातों में मेरा
भीगा-भीगा अफ़साना।

प्यारे-प्यारे जज़्बातों में तुम्हारा
प्यारा-प्यारा खिल जाना,
ख्वाब-ख्वाब सी चाँदनी में
ख्वाब-सा हो जाना।

रात-रात की तन्हाई में हमारा
रात-रात भर ना सोना,
कली-कली की ख़ुशबू में मेरा
कली-कली सा बिखर जाना।

प्यार-प्यार की बातों में हमारा
प्यार-प्यार सा मिल जाना।

 

Friday, September 14, 2018

प्रेम की अनुगूँज है।

प्रेम एक अनुभूति है
शाश्वत रिश्तों के मर्म की
सुर्ख जोड़े में लिपटे गर्व की
विरक्ति से उपजे दर्द की
प्रेम अनुभूति है।

प्रेम एक रिश्ता है
दिलों के इकरार का
ममत्व के दुलार का
मानवता की पुकार का
प्रेम एक रिश्ता है।

प्रेम दिखता है
किसी मासूम-सी मुस्कान में
नवविवाहिता की माँग में
वीरों की आन-बान में
प्रेम दिखता है।

प्रेम की अनुगूँज है
दिल के झंकृ‍त तारों में
बागों में बहारों में
फागुन की मस्त फुहारों में
प्रेम की अनुगूँज है।

sabhar- विनीता मोटलानी

Thursday, August 9, 2018

सबसे पहली चिड़िया की कहानी


सबसे पहली कहानी मैंने चिड़िया की सुनी थी जो दाल का दाना चुगकर लाती है और चावल का दाना चुगकर लाए कौवे के साथ मिलकर खिचड़ी बनाती है। कौआ चिड़िया को नहाने भेज देता है और अपने हिस्से की खिचड़ी खाने के बाद चिड़िया के हिस्से की खिचड़ी भी चट कर जाता है।

इस कहानी ने सहज ही चिड़िया के प्रति एक आत्मीयता जगा दी। सुबह से शाम तक घर में उसकी चहचहाट मोहक लगती थी। घर में ही उसका घोंसला था। चिड़िया और शायद उसका चिड़ा जब अपने नन्हे बच्चे के लिए चोंच में भरकर कुछ लाते थे और वात्सल्य और ममता से उसे खिलाते थे तो एक अजब विस्मय रचते थे। वे उसे उड़ना सिखाते थे। उससे अपनी भाषा में शायद बात करते थे और थोड़े-थोड़े अंतराल पर हमारे घर में चिड़िया के साथ-साथ एक मोहक चहचहाट उतरा करती थी। आज सोचता हूँ तो लगता है कि वह सब कितना सुंदर था।

चिड़िया हमारे करीब रखे दाने चुगती थी लेकिन हमारे जरा से हिलने से भी घबरा उठती थी और फुदककर कपड़े सुखाने के तार पर जा बैठती थी। घर में कोई एक दो नहीं बीसियों चिड़ियाँ उतर आती थीं। फुदकती थीं। चुगती थीं और उड़ जाती थीं।

दुनिया में मनुष्यों के अलावा तमाम पशु-पक्षियों का दिन भोजन की तलाश में ही बीतता है। नन्ही गौरेया के साथ भी ऐसा ही होता होगा। लेकिन पता नहीं क्यों उनके भोजन इकट्ठा करने, सहज आवेग के साथ घोंसला बनाने के लिए तिनका लाने के लिए उड़ने और फिर तेजी से लौटकर उसे दूसरे तिनकों के साथ जोड़कर रख देने में हमें एक आत्मीय खेल नजर आता रहा है पर जब हम नन्ही गौरेया की मेहनत का हिसाब लगाते हैं तो उसके नन्हे सामर्थ्य को देखकर द्रवित हो जाते हैं

उसका फुदकना, नृत्य करना, गर्दन घुमाकर और उठाकर देखना, फुर्ती और चौकन्नापन हमारे बचपन के घरों में चहक और खुशी भरता रहा है।

आज गौरेया हमारे घरों से गायब होती जा रही हैं। जैसे बड़े शहरों में तो उनकी संख्या तेजी से घट रही है। यही हालात रहे तो हो सकता है चिड़िया कविताओं और चित्रों में ही सीमित होकर रह जाए और आने वाली पीढ़ियाँ चिड़ियों के चित्रों को देखकर उस तरह विस्मित हों जैसे हम डायनासोरों के चित्रों को देखकर आश्चर्य से भर उठते हैं।

क्या पता? लेकिन यह एक सच्चाई है जिसे महानगरों में रहने वाले हम लोग जानते हैं। दुनिया भर में गौरेया कम हो रही हैं। विदेशों में लोग जानते हैं कि कितने वर्षों में कितनी चिड़िया कम हुई हैं लेकिन हमारे देश में इसका कोई अध्ययन नहीं हुआ है।

संतोष की बात है कि सरकार का ध्यान अब इस ओर गया है और उसने शानिवार 20 मार्च को दिल्ली में गौरेया दिवस मनाने का फैसला किया। नेचर फॉरएवर सोसायटी ने कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सहयोग से इस दिवस को शहर में गौरेया की संख्या में तेजी से आ रही कमी पर केंद्रित कर दिया है और लोगों से कहा है कि वे सोचें कि यह घरेलू नन्ही चिड़िया आखिर क्यों गायब होती जा रही है और हम सब मिलकर क्या करें कि हमारे शहरों में गौरेया और उसकी मासूम चहचहाट बनी रहे।

ऐसे ही गिद्ध भी तेजी से गायब हो रहे हैं और आज उनकी इतनी कम संख्या बची है कि मरे हुए जानवरों के सड़े हुए माँस को सफाचट कर हमारे पर्यावरण को साफ और संतुलित रखने की समस्या बनी हुई है।

बढ़ता औद्योगिकीरण, शहरीकरण और फसलों में कीटनाशकों का अंधाधुँध प्रयोग गिद्धों की मौत और उनके गायब होने के कारण रहे हैं। शुक्र है कि पिछले सालों में गिद्धों की एक ऐसी प्रजाति जिसे विलुप्त मान लिया गया था, फिर से देखने में आई और पर्यावरण प्रेमी इस बात से खुश हुए कि प्रकृति ने मरे हुए ढोर-डंगरों आदि को खाने का जो काम एक तरह के सफाईकर्मी पक्षी गिद्ध को सौंपा है, वह अभी बचा हुआ है।