Thursday, February 22, 2018

मेहनत से वो मंज़िल पाएँगे —गीत गजल कविता

हम मुश्किलों से टकराकर मुक़द्दर बनाएँगे,
जहाँ गिरती हैं बिजलियाँ, वहीं आशियाँ बसाएँगे।
राह में जो आएँगे पत्थर, रुकावट नहीं बनेंगे
हम ठोकरों से उन्हें रेत में बदल जाएँगे।

हर आँधी से कह देंगेअब डर नहीं लगता,
हमने तूफ़ानों में भी दीपक जलाए हैं।
छाँव की चाह नहीं अब हमें,
हमने धूप में चलकर रास्ते बनाए हैं।

जो आज हँसते हैं हमारी कोशिशों पर,
कल वही तालियाँ बजाएँगे।
हम अपनी मेहनत से वो मंज़िल पाएँगे
जिसे किस्मत भी सलाम ठोकने आएगी।

 



Wednesday, February 7, 2018

प्यार... एक एहसास-कविता

प्यार...
क्या है यह?
सिर्फ़ एक लफ़्ज़ नहीं,
जिसे बाँध लिया जाए
किसी सीमा में,
और खत्म कर दिया जाए
उसकी अंतहीनता को।

प्यार...
कोई वस्तु नहीं,
यह तो एक एहसास है —
एक मौन आश्वासन,
जो धीरे-धीरे
दिल में उतरता है,
मुक्त गगन-सा विचरता है,
और शब्दों को कविता बना देता है।

प्यार...
नयनों में बसा एक सपना है,
जो अनुराग के रंगों से रंगा होता है।
यह चहकता है पक्षी-सा,
अंधेरों को उजालों से भरता है,
नदी-सा कल-कल करता
एक बूँद को सागर बना देता है।

प्यार...
मिलता है सिर्फ़
उस दिल की धड़कन पर,
जहाँ "मैं" से "तू" का सफ़र
एक हो जाता है।
जहाँ अस्तित्व की सीमाएँ मिट जाती हैं,
और काँटों भरी राह भी
फूलों-सी महकने लगती है।

Thursday, January 11, 2018

मन के इतवार - गीत गजल

तन तो मेरा है, पर मन पर अधिकार तुम्हारा है।
हर धड़कन में बसी, बस एक पहचान तुम्हारा है।

मेरी साँसों में महकती,
तेरी चाहत की चंदन-सी खुशबू है;
कहने को तो हृदय मेरा है,
पर इसमें धड़कनें सिर्फ़ तेरे नाम की गूंजती हैं।

तेरी आँखों से जो छलकता है
वो प्रेम, वो अपनापन, बस हमारा है।

मेरे गीतों के हर शब्द में,
तेरी पीड़ा की गूंज है समाई;
कलिकाएँ भी महसूस करती हैं,
भ्रमरों की वो मौन रुलाई।

मैं मुरली की वो धुन हूँ
जिसमें हर स्वर तुम्हारा है।

मिलने की चाह बहुत है,
पर समय की दीवारें आड़े आती हैं;
कुछ दोष नियति का भी है,
जो राहें हमें मिलाने से कतराती हैं।

सोम से शनि तक जीवन मेरा है
पर इतवार सिर्फ़ तुम्हारा है।

 

Wednesday, November 29, 2017

मैं और मेरा प्रियतम हो।



दूर कहीं, अम्बर के नीचे,
गहरा बिखरा झुटपुट हो।
वही सलोनी नदिया-झरना,
झिलमिल जल का सम्पुट हो।

नीरव का स्पन्दन हो केवल,
छितराता सा बादल हो।
तरूवर की छाया सा फैला,
सहज निशा का काजल हो।

दूर दिशा से कर्ण उतरती,
बंसी की मीठी धुन हो।
प्राणों में अविरल अनुनादित,
प्रीत भरा मधु गुंजन हो।

उसी अलौकिक निर्जन स्थल पर,
इठलाता सा यह मन हो।
दूर जगत की दुविधा से,
मैं और मेरा प्रियतम हो।

sabhar- 

Tara Singh Ji


Tuesday, October 24, 2017

मेरे अकेलेपन ने

अकेलापन
द्वार पर बिना दस्तक दिये ही
मेरे घर में घुस आया
और जबरन मेरे साथ
बिस्तर पर लेट गया
मैंने लाख कोशिश की
उसे धक्के दे कर
घर से निकालूँ
पर वो
विचित्र प्राणी की तरह
मुझसे चिपका ही रहा
मैं बालकनी में जा
कुर्सी पर बैठ
लोगों की आवाजाही देखने लगा
शायद अकेलापन
मुझमें से निकल
खुद भी हवाखोरी में
मशगूल हो जाये
पर
लोगों की अफरा-तफरी
देखते ही बनती थी
किसी को बात करने की तो क्या
रुकने की भी फुर्सत नहीं थी
लोग अकेले ही
दौड़े ही चले जा रहे थे
अनजानी मंजिल की ओर
अपने-अपने में ही मस्त
मुझे लगा
इनको तो पहले से ही
अकेलेपन ने जकड़ रखा था
फिर मेरा अकेलापन
कैसे दूर करेंगे
मैं अकेलेपन के साथ ही
कमरे में लौट आया
पर अकेलापन घर के
हर कोने तक
मेरे साथ चला आता था
कौन बाँटता मेरा अकेलापन
बीवी किटी पार्टी में व्यस्त थी
बेटा-बहू काम पर गये थे
और बच्चे स्कूल
वापिस आ कर भी
उन्हें मेरे लिये फुर्सत कहाँ
वो व्यस्त थे
अपने ही कामों में
खेलने-खिलाने में
सीरियल के मोह में
और मैं
अकेला ही भटकता रहूँगा
अपने ही घर में
मैंने चाहा
पड़ोसी की मदद लूँ
पर वो भी तो
इसकी छाया से ग्रसित
इसी लड़ाई में जूझ रहा था
फिर मेरी क्या सहायता करता
सो मैंने
अकेलेपन से ही
दोस्ती कर ली
मेरे अकेलेपन ने
मुझे समझा दिया था
कि आजकल के दौर में
इससे जूझना व्यर्थ था।

sabhar- http://kavita.hindyugm.com/2010/03/akelepan-se-dosti.html