तुम्हारी आँखे
वैसी नहीं
जिन्हें कह सकूं नशीली
तुम्हारी मुस्कान
भी तो सजावटी नहीं
तुम्हारे दांत नहीं हैं
मोतियों जैसे
शक्लो-सूरत से भी
परी नहीं हो तुम।
पर फिर भी
सबसे बढ़कर हैं
तुम्हारी भावनाएं
अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और जीवन-कर्म के बीच की दूरी को निरंतर कम करने की कोशिश का संघर्ष....
Thursday, April 27, 2017
Wednesday, April 12, 2017
प्रिय नहीं आना अब सपनों में
प्रिय नहीं आना अब सपनों में
स्मृति को तुम्हारे आलिंगन
कर रहने दो मुझे अपनों में
प्रिय नहीं आना अब सपनों में
पल उधेड़े कितने मैंने
उलझे थे उस इंद्र धनुष में
जिसको हमने साथ गढ़ा था
रंग भरे थे रिक्त क्षणों में
प्रिय नहीं आना अब सपनों में
रुमझुम गीतों के नूपुर में
जड़ी जो हमने गुनगुन बातें
उस सुर से बुन मैंने बाँधी
गाँठ स्वप्न और मेरे नयनों में
प्रिय नहीं आना अब सपनों में
कभी खनक उठते हँसते पल
कभी आँसू से सीले लम्हे
कभी मादक सी उन शामों को
बह जाने दो अब झरनों में
प्रिय नहीं आना अब सपनों में
Thursday, February 16, 2017
तब कैसे जीवन बीतेगा
प्रस्तुत है गोपालदास ''नीरज'' की कविता- इतना दानी नहीं ..
पीने को कोरा आश्वासन
नारों की बरसात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा
भीख मांगती भरी जवानी
नही बचा आँखों का पानी
बेशर्मी से बात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा
जातिवाद का जहर घोलते
राष्ट्र वेदी पर स्वार्थ तोलते
अपनो का प्रतिघात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा
आदर्शों की बात पुरानी
संस्कार बस एक कहानी
मानवता पर घात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा
नियम खोखले, तोड़े हैं दम
मैं ही मैं है, नही बचा हम
निज के हित की बात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा
मिलन कहाँ पर होगा..?
प्रस्तुत है गोपालदास ''नीरज'' की कविता
हो भी गया प्रेम हम में तो, बोलो मिलन कहाँ पर होगा..?
मेरा कुर्ता सिला दुखों ने,
बदनामी ने काज निकाले,
तुम जो आँचल ओढ़े उसमें
अम्बर ने खुद जड़े सितारे
मैं केवल पानी ही पानी, तुम केवल मदिरा ही मदिरा
मिट भी गया भेद तन का तो, मन का हवन कहाँ पर होगा
मैं जन्मा इसलिये कि,
थोड़ी उम्र आँसुओं की बढ़ जाए
तुम आई इस हेतु कि मेंहदी
रोज नए कंगन बनवाए,
तुम उदयाचल, मैं अस्ताचल, तुम सुखांत की
मिल भी गए अंक अपने तो रस अवतरण कहाँ पर होगा?
मीलों जहाँ न पता खुशी का,
मै उस आँगन का इकलौता,
तुम उस घर की कली जहाँ
नित होंठ करें गीतों का न्यौता
मेरी उमर अमावस काली और तुम्हारी पूनम गोरी
मिल भी गई राशि अपनी तो बोलो लगन कहाँ पर होगा?
इतना दानी नही समय कि
हर गमले में फूल खिला दे
इतनी भावुक नही जिंदगी
हर खत का उत्तर भिजवा दे
मिलना अपना सरल नही पर फिर भी ये सोचा करता हूँ,
जब ना आदमी प्यार करेगा जाने भुवन कहाँ पर होगा..?
हो भी गया प्रेम हम में तो, बोलो मिलन कहाँ पर होगा..?
Thursday, January 5, 2017
कितने ख्वाब पिघलते हैं.
राहे-मोहब्बत तपती भूमि, जिस्मो-जान पिघलते हैं
आज वफ़ा के मारे राही अंगारों पर चलते हैं।
मेरे मन के नील गगन का रंग कभी ना बदलेगा
देखें तेरे रूप के बादल कितने रंग बदलते हैं।
देख रहे हैं सांझ-सवेरे दिलवालों की बस्ती से
अरमानों की लाशें ले कर कितने लोग निकलते हैं।
खुशियों के परबत पर जब भी गम का सूरज उगता है
आंसू बन कर फ़िर आंखों से कितने ख्वाब पिघलते हैं.



