Friday, July 25, 2014

किसे याद हैं बाबा अलाउद्दीन खां!

 

 
 
अलाउद्दीन खां
अलाउद्दीन खां ने पश्चिमी शास्त्रीय संगीत भी सीखा था
मैहर दो बातों के लिए मशहूर है मां शारदा देवी के मंदिर और पद्म विभूषण उस्ताद बाबा अलाउद्दीन खां की कर्मभूमि के रूप मे. बाबा अलाउद्दीन खां का जन्म 1862 मे हुआ था पूर्वी बंगाल में जो आज बांग्लादेश है.

माना जाता है कि वो मियाँ तानसेन की शिष्य परंपरा के अंग थे. उनके कई मशहूर शिष्यों में पंडित रविशंकर और अली अक़बर ख़ान जैसे कलाकार शामिल हैं.

बाबा अलाउद्दीन खां की एक बड़ी उपलब्धि थी मैहर वाद्य वृंद का गठन जिसने न सिर्फ़ एक मुश्किल समय में मैहर के समाज को संगीत से रौशन किया बल्कि आज भी बाबा द्वारा निर्मित सैकड़ों राग रचनाओं का एक मात्र आईना है.

मैहर देखने में भारत के किसी भी क़स्बे से अलग नहीं है. लेकिन यहाँ माहौल में उस्ताद बाबा अलाउद्दीन खां की रूह बसती है. लोग उन्हें बाबा के नाम से ही पुकारते हैं, मानो एक निजी रिश्ता क़ायम करना चाहते हों, बाबा के साथ और मैहर की विरासत के साथ.

सवाल यह नहीं है कि ऐसा क्या था बाबा में, सवाल यह है कि ऐसा क्या नहीं था? बाबा अलाउद्दीन ख़ाँ को भारतीय संगीत का पितामह कहा जाता है.

और यह राह चलता आदमी भी यहाँ बता देता है कि बाबा जिस भी वाद्य को छूते वो उनका ग़ुलाम बन जाता था.

कहते हैं बाबा 200 से ज़्यादा भारतीय और पश्चिमी वाद्य बजाते थे. मगर अधिक जाने जाते थे सरोद, सितार वादन और अपनी ध्रुपद गायकी के लिए.

यादें

मैहर के महाराज बृजनाथ सिंह बीसवीं सदी की शुरुआत में उन्हें मैहर लाए थे. लेकिन बाबा जितना दरबार में बजाते थे उससे कहीं अधिक नियमित रूप से मां शारदा देवी के मंदिर में गाते थे.

बाबा के बेटे अली अकबर ख़ान मशहूर सरोद वादक हैं

बाबा की यादें या कहें तो मैहर का संगीत इतिहास आज किस्सों में ज़िंदा है. डॉक्टर कैलाश जैन का परिवार बाबा के क़रीब था.

वे कहते हैं जब उनकी सगाई हो रही थी तो बाबा को नहीं बुलाया गया था. लेकिन जब रात को सगाई में भैरवी गायी जा रही थी जो बाबा को सुनाई दी क्यों कि उनका घर नज़दीक ही था.

बाबा समारोह में पहुंचे और कहा यह इस समय का राग नहीं है. इस समय का राग मैं गा कर सुनाता हूं. और फिर उन्होंने दो घंटे गाया.

आज मैहर में बाबा अलाउद्दीन खां का घर उनकी सादा जीवन शैली और सर्वधर्म सरोकार का परिचय देता है. घर के दो नाम हैं-मदीना भवन और शांति कुटीर.

बाबा के कमरे में उनके वाद्यों के साथ दीवारों पर मढ़ी हैं उनके प्रसिद्ध शिष्यों की तस्वीरें. उनके बेटे और प्रख्यात सरोद वादक अली अकबर ख़ान और पंडित रविशंकर.

बाबा के शिष्यों की सूची तो यहाँ बस शुरु होती है, इसमें जुडते जाते हैं नाम, बांसुरी वादक पन्नालाल घोष, उनकी बेटी अन्नपूर्णा देवी जिन्होंने पंडित रविशंकर से शादी ही नहीं की बल्कि उन्हें सिखाया भी और पंडित हरि प्रसाद चौरसिया.

बाबा अलाउद्दीन खां ने केवल इन महान संगीतकारों को ही नहीं संवारा बल्कि मैहर को संगीत की ऐसी परंपरा दी जो आज भी क़ायम है.

वाद्य वृंद

मैहर वाद्य वृंद अपनी तरह का अनूठा ऑर्केस्ट्रा है. इसकी स्थापना का भी क़िस्सा है. डॉक्टर कैलाश जैन बताते हैं कि 1918-19 में मैहर में प्लेग की महामारी फैलने से कई लोग मारे गए और कई बच्चे अनाथ हो गये.

बाबा ने इन बच्चों को अपने घर में इकट्ठा किया और उनके गुणों के अनुसार उन्हें किसी ना किसी वाद्य को बजाने की शिक्षा दी और इसी तरह अस्तित्व में आया मैहर वाद्य वृंद.

बाबा अलाउद्दीन खां ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ पश्चिमी शास्त्रीय संगीत भी सीखा था और क्लेरनेट, वायलिन और चेलो जैसे पश्चिमी वाद्यों को अपने वाद्यवृंद में शामिल भी किया.

उन्होंने बंदूकों की नाल से एक अनूठे वाद्य नलतरंग का आविष्कार किया. हमने मैहर वाद्द वृंद के एक सदस्य जीपी पांडे से भी मुलाक़ात की और जानना चाहा क्या ख़ूबी है इस ऑर्केस्ट्रा की.

जीपी पांडे कहते हैं कि यह ऑर्केस्ट्रा आज भी बाबा की सैंकड़ों रचनाओं को ऐसे ही बजाता है जैसे बाबा के समय में बजाया जाता था.

यानी हर वाद्य से एक साथ एक ही सुर निकलता है और शायद यह एक मात्र ऐसा ऑर्केस्ट्रा है जिसमें वादक बिना नोटेशन या स्वरलिपि के बजाते हैं.

Friday, July 18, 2014

सफ़र लगती है

जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं
देखना ये है कि अब आग किधर लगती है
लम्हे-लम्हे में बसी है तिरी यादों की महक
आज की रात तो खुशबू का सफ़र लगती है


क़ोशिशें मुझको मिटाने की मुबारक़ हों मगर

मिटते-मिटते भी मैं मिटने का मज़ा ले जाऊंगा

शोहरतें जिनकी वजह से दोस्त-दुश्मन हो गए


सब यहीं रह जाएंगी मैं साथ क्या ले जाऊंगा

Kumar Vishwas 

Thursday, May 1, 2014

हार्दिक शुभकामनाएं।

दीपावली के शुभ अवसर पर आपको और आपके परिवार को मेरी  तरफ़ से हार्दिक शुभकामनाएं।
लक्ष्मी जी सदा आपके घर पर निवास करें और आप पर सुख समृद्दि की वर्षा हो।

इस दीपावली विशेष ध्यान दें:

* पटाखों का कम से कम प्रयोग करके, पर्यावरण को वायु प्रदुषण से बचाएं।
* बच्चों को अपनी उपस्थिति मे ही आतिशबाजी जलाने दें।
* आतिशबाजी जलाते समय पानी की बाल्टी पास मे रखें।
* आतिशबाजी जलाते समय सूती कपड़े पहने।
* अपनी जरुरत के मुताबिक ही सामान खरीदें, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बहकावे मे ना आएं।

सुख औ' समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, आते रहिए, पढते रहिए ......

Wednesday, April 2, 2014

शराबी युवा कैसे देंगे चीन और अमेरिका को टक्कर ?

आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,

आजकल के युवा, महाकवि हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला की इन पंक्तियों को मूर्त रूप देने में जुटे हुए हैं ये बात हम नहीं बल्कि एसोचैम द्वारा किए गए के सर्वे से साफ हुई है.

यूथ कल पर कुछ नहीं छोड़ना चाहता सब कुछ आज ही कर लेना चाहता है. मेट्रो शहरों के बारहवीं में पढ़ने वाले 45 पर्सेंट बच्चे महीने में कम से कम पांच से छह बार शराब पीते हैं. और तो और रहे पिछले 10 साल में टीनेजर्स के बीच शराब की खपत दोगुनी हो गई है.

टीनेजर्स में शराब का चलन सबसे ज्यादा दिल्ली और एनसीआर में है. इसके बाद मुंबई का नंबर है. एक स्टूडेंट साढ़े तीन से चार हजार रुपए शराब पर खर्च करता है. जबकि इतनी रकम वे सॉफ्ट ड्रिंक , चाय , दूध , जूस , कॉफी , मूवी टिकट और किताबों पर नहीं खर्च करते. 70 पर्सेंट टीनेजर्स फेयरवेल , न्यू ईयर , क्रिसमस , वैलंटाइन डे , बर्थडे और दूसरे अवसरों पर शराब पीते हैं। सर्वे के मुताबिक , एक तिहाई टीनेजर्स ने कॉलेज पहुंचने से पहले शराब पी ली थी , जबकि 16 पर्सेंट टीनेजर्स ने 15 साल से पहले ही हाला यानी शराब से दोस्ती कर ली थी.

ज्यादातर टीनेजर्स ने पहली बार शराब दोस्तों के साथ पी थी. इस मामले में लड़कियां भी पीछे नहीं हैं वो भी लड़कों को पूरी टक्कर दे रही हैं. लड़कियों में 40 पर्सेंट ने 15 साल से 17 साल की उम्र में पहली बार शराब पी थी. जिन लड़कियों को अल्कोहल का स्वाद पसंद नहीं , वे फ्रूट फ्लेवर्ड शराब पीती हैं.

आपने फीचर फिल्म कुली में आशा भोसले और शब्बीर कुमार को गाते हुए सुना होगा ….मुझे पीने का शौक नहीं पीता हूं गम भूलाने को.. ये फ़िल्मी गाना है लेकिन आजकल की युवा पीड़ी इसे सच साबित करने में दिन रात जुटी हुई है मजेदार बात है ज्यादातर टीनेजर शराब को टेंशन खत्म करने के लिए पीते हैं.

पर सवाल यह है कि क्या शराब हकीकत में टेंशन दूर भगाती है? आखिर युवा पीढ़ी में इतना दबाव क्यों है जो वो ऐसे रास्ते खोज रही है? इसके लिए कौन से बदलाव जिम्मेदार हैं? क्या हम युवा पीढ़ी को चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार नहीं कर पाए हैं? अगर नहीं तो उसे इसके लिए कैसे तैयार किया जाए? क्या युवा पीढ़ी सही दिशा में बढ रही है? या उन्हें सही दिशा में लाने के प्रयास होने चाहिए.

ये वो सवाल हैं जिनका जवाब समय रहते खोजना ज़रूरी है नहीं तो समाज के मूलभूत ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है. जिस यूथ के दम पर हम अमेरिका और चीन जैसे शक्तिशाली देशों से टक्कर लेने का सुंदर सपना सजा रहे हैं अगर हमारा वही यूथ नशे में डूबा होगा तो हम उनसे कैसे मुकाबला करेंगे.

Wednesday, March 26, 2014

मेरी ताकत

मेरी चुप्पी भी आवाज बनती है
आज तुम जितना चाहो बोल लो
हमें हल्का समझने भूल ना कर
चाहो तो अपनी तराजू से तौल लो

राजनीति में महारत तुमको है
कुछ मानवता के पन्ने खोल लो
जात-पात और धर्म पर कब तक
कुछ नई परिभाषाएँ भी जोड़ लो

बहुत बोलते हो एक दूसरे के खिलाफ
भाई कुछ हमारे बारे में भी बोल लो
मेरे पास तो 'वोट' ही एक ताकत है
सत्ता के लिए तो अपना मुखौटा खोल लो..