Wednesday, April 2, 2014

शराबी युवा कैसे देंगे चीन और अमेरिका को टक्कर ?

आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,

आजकल के युवा, महाकवि हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला की इन पंक्तियों को मूर्त रूप देने में जुटे हुए हैं ये बात हम नहीं बल्कि एसोचैम द्वारा किए गए के सर्वे से साफ हुई है.

यूथ कल पर कुछ नहीं छोड़ना चाहता सब कुछ आज ही कर लेना चाहता है. मेट्रो शहरों के बारहवीं में पढ़ने वाले 45 पर्सेंट बच्चे महीने में कम से कम पांच से छह बार शराब पीते हैं. और तो और रहे पिछले 10 साल में टीनेजर्स के बीच शराब की खपत दोगुनी हो गई है.

टीनेजर्स में शराब का चलन सबसे ज्यादा दिल्ली और एनसीआर में है. इसके बाद मुंबई का नंबर है. एक स्टूडेंट साढ़े तीन से चार हजार रुपए शराब पर खर्च करता है. जबकि इतनी रकम वे सॉफ्ट ड्रिंक , चाय , दूध , जूस , कॉफी , मूवी टिकट और किताबों पर नहीं खर्च करते. 70 पर्सेंट टीनेजर्स फेयरवेल , न्यू ईयर , क्रिसमस , वैलंटाइन डे , बर्थडे और दूसरे अवसरों पर शराब पीते हैं। सर्वे के मुताबिक , एक तिहाई टीनेजर्स ने कॉलेज पहुंचने से पहले शराब पी ली थी , जबकि 16 पर्सेंट टीनेजर्स ने 15 साल से पहले ही हाला यानी शराब से दोस्ती कर ली थी.

ज्यादातर टीनेजर्स ने पहली बार शराब दोस्तों के साथ पी थी. इस मामले में लड़कियां भी पीछे नहीं हैं वो भी लड़कों को पूरी टक्कर दे रही हैं. लड़कियों में 40 पर्सेंट ने 15 साल से 17 साल की उम्र में पहली बार शराब पी थी. जिन लड़कियों को अल्कोहल का स्वाद पसंद नहीं , वे फ्रूट फ्लेवर्ड शराब पीती हैं.

आपने फीचर फिल्म कुली में आशा भोसले और शब्बीर कुमार को गाते हुए सुना होगा ….मुझे पीने का शौक नहीं पीता हूं गम भूलाने को.. ये फ़िल्मी गाना है लेकिन आजकल की युवा पीड़ी इसे सच साबित करने में दिन रात जुटी हुई है मजेदार बात है ज्यादातर टीनेजर शराब को टेंशन खत्म करने के लिए पीते हैं.

पर सवाल यह है कि क्या शराब हकीकत में टेंशन दूर भगाती है? आखिर युवा पीढ़ी में इतना दबाव क्यों है जो वो ऐसे रास्ते खोज रही है? इसके लिए कौन से बदलाव जिम्मेदार हैं? क्या हम युवा पीढ़ी को चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार नहीं कर पाए हैं? अगर नहीं तो उसे इसके लिए कैसे तैयार किया जाए? क्या युवा पीढ़ी सही दिशा में बढ रही है? या उन्हें सही दिशा में लाने के प्रयास होने चाहिए.

ये वो सवाल हैं जिनका जवाब समय रहते खोजना ज़रूरी है नहीं तो समाज के मूलभूत ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है. जिस यूथ के दम पर हम अमेरिका और चीन जैसे शक्तिशाली देशों से टक्कर लेने का सुंदर सपना सजा रहे हैं अगर हमारा वही यूथ नशे में डूबा होगा तो हम उनसे कैसे मुकाबला करेंगे.

Wednesday, March 26, 2014

मेरी ताकत

मेरी चुप्पी भी आवाज बनती है
आज तुम जितना चाहो बोल लो
हमें हल्का समझने भूल ना कर
चाहो तो अपनी तराजू से तौल लो

राजनीति में महारत तुमको है
कुछ मानवता के पन्ने खोल लो
जात-पात और धर्म पर कब तक
कुछ नई परिभाषाएँ भी जोड़ लो

बहुत बोलते हो एक दूसरे के खिलाफ
भाई कुछ हमारे बारे में भी बोल लो
मेरे पास तो 'वोट' ही एक ताकत है
सत्ता के लिए तो अपना मुखौटा खोल लो..

 

केजरीवाल के वाराणसी दौरे पर

वोट बैंक से इस टिप्पणी का कोई सरोकार नहीं अतः अतिवादी टिप्पणियों का स्वागत नहीं है।**

विचारधाराओं को रक्त से सींचा जाता है। चाहे वो वामपंथ हो दक्षिण पंथ हो या फिर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का झूठा श्रेय लेने वाली कोई भी पार्टी। सबने खून से सींचा है अपनी जड़ों को। ये बात केजरीवाल नहीं जानते जो भारतीय राजनीति की सतह पर बुलबुले की तरह उभरे हैं। डंडा खाने पर बुरका पहन के भागने वाले और कैंडल मार्च की हास्यास्पद और नम्र राजनीति करने वाले लोगों को भी यह समझना चाहिए।

फिर भी आल द बेस्ट।

 

Monday, January 27, 2014

पर मुझे इन्तजार था, उसका |

रोजाना कि तरह, स्टेशन में खड़ा
घडी निहारता, भीड़ को देखता,
कुछ अनमना, कुछ बेचैन होता,
कभी अपनी हाथ कि घडी देखता,
फिर आने वालो से, समय पूछता
कभी पुराना अखबार, देखता, पढता
कभी बिस्कुट खाकर, समय काटता
हालत, एक सी, हर मुसाफिर की
सभी को इन्तजार था, ट्रैन का,
पर मुझे इन्तजार था, उसका |
                                              ढेर सारे सामान, का भार लिए
दौड़ते यात्री को, कुली कोसता
दो पत्र, पढ़कर, मैं कही खो जाता
एक प्यार और दूसरा शिकवा गिला
इसी सोच में, कौन बुरा कौन भला,
पुरानी यादो का, मन में भार लिए
हथेली की लकीरों, की धार लिए
सभी को इन्तजार था, ट्रैन का,
पर मुझे इन्तजार था, उसका |
जब भी बजती, आखिरी शीटी
धड़कने बढ़ जाती, मेरी जोर से
अहसास से कि ट्रैन आएगी
फिर कही, सफ़र अकेला न हो
मझदार में बैंठ, ढूढूं साहिल
पहुचने को अपनी मंजिल
सभी को इन्तजार था, ट्रैन का,
पर मुझे इन्तजार था, उसका |


Thursday, January 2, 2014

नई कहानी क्यूँ नहीं लिखते ?

पीछे दौड़ने को है, हजार खवाहिशे, हजार सपने
कुछ सपने पूरे नहीं होते, कुछ हो नहीं पाते
सब कुछ पाकर भी क्या करोगे ?
तुम अपनी जिंदगी में अपनी तरह क्यूँ नही रहते ?

महँगे मोबाइल,कार, फ्लैट,प्रॉपर्टी इक़ठठा करना
इन्क्रीमेंट, बोनस का हिसाब लगाते रहना
शेयरों के दाम की जाँच कब तक करोगे ?
जो इन सब से दूर ले जाए, वो नौकरी क्यूँ नहीं करते ?

ऐसे तो लाखों किताबें और हजारों फिल्में हैं दुनिया में,
लेकिन तुम्हारी अपनी जिंदगी क्या किसी फिल्म से कम है,
कभी थोड़ा वक़्त निकाल कर,
तुम अपनी कोई सच्ची कहानी क्यूँ नही कहते ?

फेसबुक में पोस्ट अपलोड करते हो
जिंदगी में हमेशा लोड लेकर रहते हो
सोमवार - वीकेंड के लिए बस 5 दिन और
ऐसे ऐसे चुटकले बार-बार कहते हो
हर साल वही पुरानी बाते, कहानिया है
           बची जिंदगी में नई कहानी क्यूँ नहीं लिखते ?