Wednesday, March 26, 2014

मेरी ताकत

मेरी चुप्पी भी आवाज बनती है
आज तुम जितना चाहो बोल लो
हमें हल्का समझने भूल ना कर
चाहो तो अपनी तराजू से तौल लो

राजनीति में महारत तुमको है
कुछ मानवता के पन्ने खोल लो
जात-पात और धर्म पर कब तक
कुछ नई परिभाषाएँ भी जोड़ लो

बहुत बोलते हो एक दूसरे के खिलाफ
भाई कुछ हमारे बारे में भी बोल लो
मेरे पास तो 'वोट' ही एक ताकत है
सत्ता के लिए तो अपना मुखौटा खोल लो..

 

केजरीवाल के वाराणसी दौरे पर

वोट बैंक से इस टिप्पणी का कोई सरोकार नहीं अतः अतिवादी टिप्पणियों का स्वागत नहीं है।**

विचारधाराओं को रक्त से सींचा जाता है। चाहे वो वामपंथ हो दक्षिण पंथ हो या फिर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का झूठा श्रेय लेने वाली कोई भी पार्टी। सबने खून से सींचा है अपनी जड़ों को। ये बात केजरीवाल नहीं जानते जो भारतीय राजनीति की सतह पर बुलबुले की तरह उभरे हैं। डंडा खाने पर बुरका पहन के भागने वाले और कैंडल मार्च की हास्यास्पद और नम्र राजनीति करने वाले लोगों को भी यह समझना चाहिए।

फिर भी आल द बेस्ट।

 

Monday, January 27, 2014

पर मुझे इन्तजार था, उसका |

रोजाना कि तरह, स्टेशन में खड़ा
घडी निहारता, भीड़ को देखता,
कुछ अनमना, कुछ बेचैन होता,
कभी अपनी हाथ कि घडी देखता,
फिर आने वालो से, समय पूछता
कभी पुराना अखबार, देखता, पढता
कभी बिस्कुट खाकर, समय काटता
हालत, एक सी, हर मुसाफिर की
सभी को इन्तजार था, ट्रैन का,
पर मुझे इन्तजार था, उसका |
                                              ढेर सारे सामान, का भार लिए
दौड़ते यात्री को, कुली कोसता
दो पत्र, पढ़कर, मैं कही खो जाता
एक प्यार और दूसरा शिकवा गिला
इसी सोच में, कौन बुरा कौन भला,
पुरानी यादो का, मन में भार लिए
हथेली की लकीरों, की धार लिए
सभी को इन्तजार था, ट्रैन का,
पर मुझे इन्तजार था, उसका |
जब भी बजती, आखिरी शीटी
धड़कने बढ़ जाती, मेरी जोर से
अहसास से कि ट्रैन आएगी
फिर कही, सफ़र अकेला न हो
मझदार में बैंठ, ढूढूं साहिल
पहुचने को अपनी मंजिल
सभी को इन्तजार था, ट्रैन का,
पर मुझे इन्तजार था, उसका |


Thursday, January 2, 2014

नई कहानी क्यूँ नहीं लिखते ?

पीछे दौड़ने को है, हजार खवाहिशे, हजार सपने
कुछ सपने पूरे नहीं होते, कुछ हो नहीं पाते
सब कुछ पाकर भी क्या करोगे ?
तुम अपनी जिंदगी में अपनी तरह क्यूँ नही रहते ?

महँगे मोबाइल,कार, फ्लैट,प्रॉपर्टी इक़ठठा करना
इन्क्रीमेंट, बोनस का हिसाब लगाते रहना
शेयरों के दाम की जाँच कब तक करोगे ?
जो इन सब से दूर ले जाए, वो नौकरी क्यूँ नहीं करते ?

ऐसे तो लाखों किताबें और हजारों फिल्में हैं दुनिया में,
लेकिन तुम्हारी अपनी जिंदगी क्या किसी फिल्म से कम है,
कभी थोड़ा वक़्त निकाल कर,
तुम अपनी कोई सच्ची कहानी क्यूँ नही कहते ?

फेसबुक में पोस्ट अपलोड करते हो
जिंदगी में हमेशा लोड लेकर रहते हो
सोमवार - वीकेंड के लिए बस 5 दिन और
ऐसे ऐसे चुटकले बार-बार कहते हो
हर साल वही पुरानी बाते, कहानिया है
           बची जिंदगी में नई कहानी क्यूँ नहीं लिखते ?

Friday, December 27, 2013

बस्ते का बोझ

पांच वर्ष का रोहन रोता हुआ, अनमना सा,पीठ में भारी बस्ता लिए, थोडा झुका हुआ, मम्मी के साथ ,स्कूल जाने के लिए रिक्शे वाले का इंतजार कर रहा था और शायद मन में ये कहता,                                                                            "नहीं मम्मीमुझे स्कूल नहीं जाना... मेरे बस्ते का बोझ कुछ कम करो" पर उसे तो रोज स्कूल जाना होता ही था

थोड़ी देर में रिक्शा वाला भी आ गया जो अपने रिक्शे में क्षमता से ज्यादा बच्चे पहले से ही बिठा कर लाता और यहाँ से रोहन को ले जाता। इस बात को रोज एक चाय वाला देखता और रिक्शे वाले को देख परेशान हो जाता...

         एक दिन चाय वाले ने रिक्शे वाले से पूछा की, " तुम रोज अपनी क्षमता से ज्यादा बच्चे रिक्शे में ले जाते हो, क्यों अपनी जवानी वक्त से पहले ख़राब कर रहे हो ?"

रिक्शे वाला कुछ नहीं बोल मुस्कुराया और चल दिया...

      फिर वही रोज रोहन का रोना और रिक्शा वाला आता जाता रहा ...

आखिर एक दिन चाय वाले ने जबरजस्ती करके रिक्शे वाले से फिर वही सवाल कर दिया,

"इतना बोझ क्यों उठाते हो?"

इस बात को सुन रिक्शे वाले ने लम्बी आह भरी और जवाब दिया, ...

 "जब पांच साल का बच्चा लगभग दस किलो का वजन रोज उठाता है,  तो मै इनका वजन क्यों नहीं उठा सकता, ये तो किताबो के चाबुक के बीच अपना बचपन गवां रहे है,  मै तो सिर्फ आधी जवानी ही गवाऊंगा"