Tuesday, December 18, 2012

जब तक वो सुनाती रही

मैं  हमेशा  ही  तुमसे  रहा  ,रूठता
तुम  खड़ी  पास  मुझको  मनाती  रही .

मैं  सदा  दूर  तुमसे  रहा , घूमता -
तुम  खड़ी पास  मुझको  बुलाती  रही .
मै  तुम्हारा  हू  या  नहीं  मै  कैसे  बताता 
तुम  खड़ी  पास  मेरे  मुझको  बताती  रही 

जो  था  तुम्हारी,'आँखों'  में  नहीं  समझा 
तुम  खड़ी  पास  मेरे  कुछ  दिखाती  रही 

अब  है  दिल  की   इच्छा  तो  क्या  होगा  फायदा 
अंजन ने सुना  नहीं , जब  तक  वो  सुनाती  रही   

                                                -- अंजन ..... कुछ दिल से 


Monday, October 22, 2012

शारदा देवी मंदिर -मैहर

मैहर का मतलब है, मां का हार।  यहां सति का हार गिरा था।
पुराणों में माना जाता है कि दक्ष प्रजापति की पुत्री सति शिव से विवाह करना चाहती थी। लेकिन राजा दक्ष शिव को भूतों और अघोरियों का साथी मानते थे। फिर भी सति ने अपने पिता की मर्जी के खिलाफ जाकर भगवान शिव से विवाह कर लिया। एक बार राजा दक्ष ने कनखल (हरिद्वार) में बृहस्पति सर्वश् नामक यज्ञ रचाया। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता भगवान शंकर को नहीं बुलाया। शंकरजी की पत्नी और दक्ष की पुत्री सती इससे बहुत आहत हुई। यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा। इस पर दक्ष प्रजापति ने भगवान शंकर को अपशब्द कहे। इस अपमान से पीड़ित हो, सती ने यज्ञ-अग्नि पुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी। भगवान शंकर को जब इस दुर्घटना का पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया। भगवान शंकर ने यज्ञपुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कर कंधे पर उठा लिया और गुस्से में तांडव करने लगे। ब्रह्मांड की भलाई के लिए भगवान विष्णु ने ही सति के अंग को 52 भागों में विभाजित कर दिया। जहाँ-जहाँ सती के शव के विभिन्न अंग और आभूषण गिरे, वहाँ बावन शक्ति पीठो का निर्माण हुआ। अगले जन्म में सती ने हिमवान राजा के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या कर शिवजी को फिर से पति रूप में प्राप्त किया। 

मंदिर का इतिहास
मंदिर के पास में एक प्राचीन शिलालेख है। वहाँ शारदा देवी के साथ भगवान नरसिंह की एक मूर्ति है। इन मूर्तियों नुपुला देवा द्वारा शेक 424 चौत्र कृष्ण पक्ष पर 14 मंगलवार, विक्रम संवत् 559 अर्थात 502 ई. स्थापित किया गया। देवनागिरी लिपि मे चार पंक्तियों वाली यह षिलालेख ''3.5'' से 15 आकार की है। मंदिर मे एक और षिलालेख शैव संत जिससे पता चलता है कि उस समय जैन धर्म का भी ज्ञान था यह षिलालेख 34 31'' आकार का है। माता शारदा की मूर्ति की स्थापना विक्रम संवत 559 को की गई है। मूर्ति पर देवनागरी लिपि में शिलालेख भी अंकित है। इसमें बताया गया है कि सरस्वती के पुत्र दामोदर ही कलियुग के व्यास मुनि कहे जाएगें। दुनिया के जाने माने इतिहासकरा ए कनिंग्घम ने इस मंदिर पर विस्तार में शोध किया है। इस मंदिर में प्राचीन काल से ही बलि देने की प्रथा चली आ रही थी। लेकिन 1922 में सतना के राजा ब्रजनाथ जूदेव ने पशु बलि को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया। यह एक बहुत ही प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है, मैहर नगरी से 5 किलोमीटर दूर त्रिकुट पर्वत पर माता शारदा देवी का वास है। मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को 1063 सीढ़ियां तय करना होता है। पर्वत की चोटी के मध्य में ही शारदा माता का मंदिर स्थापित है। हालांकि पिछले साल से यहां रोप वे की शुरुआत कर दी गई है, जिससे वृद्धों और शारीरिक तौर पर विकलांग लोगों को माता के दर्शन करने में मुश्किल न आये। क्षेत्रीय परंपरा के मुताबिक अल्हा और उदल जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया था, जिसमे उदल की मृत्यु हो गई थी। दोनो भाई शारदा माता के बड़े भक्त हुआ करते थे। इन दोनों ने ही सबसे पहले जंगलों के बीच शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की थी। इसके बाद आल्हा ने इस मंदिर में 12 सालों तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया था। माता ने उन्हें अमरत्व का आशीर्वाद दिया था। आल्हा माता को शारदा माई कह कर पुकारा करता था और तभी से ये मंदिर भी माता शारदा माई के नाम से प्रसिद्ध हो गया। आज भी यही मान्यता है कि माता शारदा के दर्शन हर दिन सबसे पहले आल्हा ही करते हैं। मंदिर के पीछे पहाड़ों के नीचे एक तालाब है जिसे आल्हा तालाब कहा जाता है। यही नहीं तालाब से 2 किलोमीटर और आगे जाने पर एक अखाड़ा मिलता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां आल्हा और उदल कुश्ती लड़ा करते थे।
यातायात 
मैहर मध्यप्रदेश के सतना जिले मे आता है यह राट्रीय राजमार्ग क्रमांक 7 से जुड़ा है। रेल यातायात मे महाकौशल एक्सप्रेस दिल्ली हजरत निजामुद्दीन से सीधा संपर्क है। यह जबलपुर से 162 किमी की दूरी पर है और कटनी जंक्षन से 62 किमी है। सतना जिला से 40 किमी पर स्थित है। 
मैहर घराने
हिंदुस्तानी शस्त्रीय संगीत मे मैहर घराने एक प्रमुख स्थान रखता है। संगीत की द्रुपदशैली का जन्म इसी घराने मे हुआ है। उस्ताद अलाउद्दीन खान (1972 मृत्यु हो गई) इस शैली के सबसे बड़े दिग्गज थे। लंबे समय तक उन्होने यहॉ निवास किया। उनका जन्म त्रिपुरा { अब पष्चिम बंगाल मे } 1862 में हुआ। मैहर के महाराजा के दरबार संगीतकार, और उसके छात्रों में श्रीमती अन्नपूर्णा (अलाउद्दीन खान की बेटी) देवी, उस्ताद अली अकबर खान (अलाउद्दीन खान के पुत्र), पंडित रवि (संगीतकार) शंकर, उस्ताद आशीष खान (अलाउद्दीन खान के पोते), उस्ताद ध्यानेश खान (अलाउद्दीन खान 2 पोता), उस्ताद प्रणेश खान (अलाउद्दीन खान के पोते 3), उस्ताद बहादुर खान (अलाउद्दीन खान के भतीजे), ज्पउपत बारां भट्टाचार्य (अलाउद्दीन खान के पहले छात्र) 

Friday, September 14, 2012

हिंदी दिवस और आम आदमी

एक व्यंग्य

लो भईया 14 सितम्बर का समय आ गया एक और सरकारी दिवस  ,हिंदी दिवस | सभी को सरकारी आदेशानुसार  मन से मनाना है | हमसे फ्रेंडशिप-दिवस,प्रेम-दिवस मनवा लो ,जन्म-तिथि,पुन्य-तिथि मनवा लो यहाँ तक की रास्ट्रीय त्यौहार भी मनवा लो पर हिंदी दिवस को हमसे ना कहो सच कहू इसको मनाना अपनी आत्मा से साक्षात्कार जैसे है हिंदी में काम को बढ़ावा देने वाली घोषणाएँ होंगी, कई कार्यक्रम आयोजित होंगे हिंदी की दुर्दशा पर दिल भी भारी करना पड़ सकता है ,घड़ियाली आँसू भी बहाना पड़ सकता है ,'कल से सिर्फ और सिर्फ हिंदी में काम करूँगा' अपने आप से और लोगो से ये वादा करना पड़ सकता है | लेकिन एक दिन  की बात है दूसरे दिन से फिर न जाने क्या होगा हिंदी का, साल के अन्य दिनों के लिए, ये भगवान ही जानता है  |

ये कोई नई बात नहीं है, 14 सितम्बर 1049 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी  तब से लेकर आज तक ये सिलसिला जारी है | मैं तो एक छोटा सरकारी मुलाजिम ही हूँ, अपने जान पहचान के लोगो और अपने रिश्तेदारों से हिंदी भाषा का हिमायती होने पर अक्सर गाली खाता  हूं |वास्तव में हिंदी तो उन लोगो की भाषा है जिनको अग्रेजी माता आती नहीं या हिंदी बोलने से  ज्यादा ही लगाव है और ऐसे लोगों को लोग-बाग नान-स्टैण्डर्ड करार देते है |मिश्रा जी अग्रेगी में फ़र्राटेदार  बात करते है तो पूरे मोहल्ले में नाम है और एक हम है हिंदी बोलने से घर में भी नाम नहीं है | हमारे दफ्तर में तो चपरासी से लेकर साहब तक सभी हिंदी के नाम पर लम्बे लंबे-चौड़े भाषण देते हैं पर अपने बच्चो को अग्रेगी माध्यम स्कूलों में पढ़ाते है,और उनको दान देकर बढ़ावा भी देते है, लेकिन हिंदी दिवस में हिंदी स्कूलों को बढ़ावा देने के लिए सरकार से गुजारिस करते है |

हमारा बालक शहीद न हो गाव जाये तेल लेने ,हमारे बाप दादा भी कभी जिले के बहार न गए हो पर हमें पाने बच्चो को तो महानगरो में पढाना है,भले ही हम छोटे-बाबु हो पर अपने बच्चो को विदेशो में नौकरी कराना है और ये सब बाते हिंदी से संभव न हो पाएंगी हिंदी के साथ रहेंगे तो हिन्दुस्तानी रह जाएँगे

हमारे लिए शहीदों ने कुर्बानियां देकर आजादी दिलाई और संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत कीराजभाषा होगी । इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाने लगा लेकिन ये कुरबानी हमारे लिए थी हमारे लिए थी हमारे बच्चो के लिए नहीं हम निभा रहे है हिंदी बोलकर और हिदी दिवस मनाकर

एक  दिन काट लो कल से हम अपने ही काम में लग जाएँगे | हिंदी का मालूम नहीं बोल तो लेते ही है ,हिंदी फिल्मे देखते है,समाज के ज्योतिमार्गी धारावाहिक देखते है ,हिंदी गाने सुनते है और यहाँ तक की गाली गलौज में भी कभी हम किसी अन्य भाषा का प्रयोग नहीं करते हमसे बड़ा कोई हिंदी का हिमायती नहीं है ! अब हिंदी दिवस में हम सपथ क्यों ले की कल से हिंदी को बढ़ावा देंगे हिंदी का प्रचार प्रसार करेंगे | हिंदी का प्रचार तो अपने देशो में ही नहीं विदेशो में भी हो रहा है,अमेरिका यूरोपी सरकारे   हिंदी   स्कूल खोल रही है, तो फिर यहाँ  इतना शोर शराबा क्यों | हिंदी दिवस है आएगा और चला जाएगा इसमें इतना घबराना क्यों | हिंदी न बोलेंगे तो सरकारे थोडा गिर जाएंगी ,आलू  प्याज टमाटर के दाम तो वैसे ही रहेंगे जैसे है ,आम जनता तो आम जनता ही रहेगी |   मेरे दादा जी तो कहते थे  अंग्रेज़ी पढ़ें सीखें परंतु साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि अंग्रेज़ी को उतना ही सम्मान दें जितना कि ज़रूरी है, उसको सम्राज्ञी न बनाएँ | लेकिन अब दादा जी कुछ ज्यादा नही बोलते |  अभी   हिंदी में भाषण तैयार कर रहा हू हिंदी दिवस में  देना है |

 

विवेक अंजन श्रीवास्तव 

सरलानगर , मैहर 

 

 

हिंदी दिवस में किर्तिप्रभा और जबलपुर एक्सप्रेस दैनिक हिंदी अख़बार में छपा मेरा लेख

Wednesday, August 29, 2012

मकबूल भेजती थी

किताबो  में  गुलाब  के  फूल  भेजती  थी ,
इशारो  से  क़यामत  के  शूल  भेजती  थी ,
हम  मिल  न  सके,  किनारों  की  तरह ,
वो  मुझे  प्यार  के  मकबूल  भेजती  थी