Saturday, May 29, 2010

हमेशा गाँव ही खुद को शहर में ढाल लेते हैं

गरीबी में भी बच्चे यूँ उड़ाने पाल लेते हैं
ज़रा सी डाल झुक जाए तो झूला डाल लेते हैं

जहाँ में लोग जो ईमान की फसलों पे जिंदा हैं
बड़ी मुश्किल से दो वक्तों की रोटी दाल लेते हैं

शहर ने आज तक भी गाँव से जीना नहीं सीखा
हमेशा गाँव ही खुद को शहर में ढाल लेते हैं

परिंदों को मोहब्बत के कफस में कैद कर लीजे
न जाने लोग उनके वास्ते क्यों जाल लेते हैं

अभी नज़रों में वो बरसों पुराना ख्वाब रक्खा है
कोई भी कीमती सी चीज़ हो संभाल लेते हैं

ये मुमकिन है खुदा को याद करना भूल जाते हों
तुम्हारा नाम लेकिन हर घडी हर हाल लेते हैं

हमें दे दो हमारी ज़िन्दगी के वो पुराने दिन
'रवि' हम तो अभी तक भी पुराना माल लेते हैं


Friday, May 28, 2010

झग्गी नं. 208 से निकला आईएएस

दिल्ली की झुग्गी झोपडी में रहने वाले दिहाडी मजदूर के बेटे हरीश चंदर ने पहले प्रयास में तय किया आईएएस का सफर।
Harish Chander

यह कहानी है एक जिद की, यह दास्तां है एक जुनून की, यह कोशिश है सपने देखने और उन्हें पूरा करने की। यह मिसाल है उस जज्बे की, जिसमें झुग्गी बस्ती में रहते हुए एक दिहाडी मजदूर का बेटा आईएएस अफसर बन गया है। पिता एक दिहाडी मजदूर, मां दूसरों के घर-घर जाकर काम करने वाली बाई। कोई और होता तो शायद कभी का बिखर गया होता, लेकिन दिल्ली के 21 वष्ाीüय हरीश चंदर ने इन्हीं हालात में रहकर वह करिश्मा कर दिखाया, जो संघर्षशील युवाओं के लिए मिसाल बन गया। दिल्ली के ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप की झुग्गी नंबर 208 में रहने वाले हरीश ने पहले ही प्रयास में आईएएस परीक्षा में 309वीं रैंक हासिल की है। संघर्ष की सफलता की कहानी, हरीश चंदर की जुबानी।

मेरा बचपन: चने खाकर गुजारी रातें
मैंने संघर्ष की ऎसी काली कोठरी में जन्म लिया, जहां हर चीज के लिए जद्दोजहद करनी पडती थी। जब से मैंने होश संभाला खुद को किसी न किसी लाइन में ही पाया। कभी पीने के पानी की लाइन में तो कभी राशन की लाइन में। यहां तक कि शौच जाने के लिए भी लाइन में लगना पडता था। झुग्गी में माहौल ऎसा होता था कि पढाई कि बात तो दूर सुबह-शाम का खाना मिल जाए, तो मुकद्दर की बात मानी जाती थी। बाबा (पापा) दिहाडी मजूदर थे। कभी कोई काम मिल जाए तो रोटी नसीब हो जाती थी, नहीं तो घर पर रखे चने खाकर सोने की हमें सभी को आदत थी। झुग्गी में जहां पीने को पानी मयस्सर नहीं होता वहां लाइट की सोचना भी बेमानी है। झोपडी की हालत ऎसी थी कि गर्मी में सूरज, बरसात में पानी और सर्दी में ठंड का सीधा सामना हुआ करता था।

मेरी हिम्मत:  मां और बाबा
मेरे मां-बाबा पूरी तरह निरक्षर हैं, लेकिन उन्होंने मुझे और मेरे तीन भाई-बहनों को पढाने की हरसंभव कोशिश की। लेकिन जिस घर में दो जून का खाना जुटाने के लिए भी मशक्कत होती हो, वहां पढाई कहां तक चल पाती। घर के हालात देख मैं एक किराने की दुकान पर काम करने लगा। लेकिन इसका असर मेरी पढाई पर पडा। दसवीं में मैं फेल होते-होते बचा। उस दौरान एक बार तो मैंने हमेशा के लिए पढाई छोडने की सोच ली। लेकिन मेरी मां, जिन्हें खुद अक्षरों का ज्ञान नहीं था, वो जानती थीं के ये अक्षर ही उसके बेटे का भाग्य बदल सकते हैं। मां ने मुझे पढाने के लिए दुकान से हटाया और खुद दूसरों के घरों में झाडू-पोंछा करने लगी। उनके कमाए पैसों को पढाई में खर्च करने में भी मुझे एक अजीब सा जोश आता था। मैं एक-एक मिनट को भी इस्तेमाल करता था। मेरा मानना है कि आपको अगर किसी काम में पूरी तरह सफल होना है तो आपको उसके लिए पूरी तरह समर्पित होना पडेगा। एक प्रतिशत लापरवाही आपकी पूरी जिंदगी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।

मेरे प्रेरक : मां, गोविंद और धर्मेद्र सर
यूं तो मां मेरी सबसे बडी प्रेरणा रही है, लेकिन मैं जिस एक शख्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हूं और जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया, वह है गोविंद जायसवाल। वही गोविंद जिसके पिता रिक्शा चलाते थे और वह 2007 में आईएएस बना। एक अखबार में गोविंद का इंटरव्यू पढने के बाद मुझे लगा कि अगर वह आईएएस बन सकता है तो मैं क्यूं नहीं मैं बारहवीं तक यह भी नहीं जानता था कि आईएएस होते क्या हैं लेकिन हिंदू कॉलेज से बीए करने के दौरान मित्रों के जरिए जब मुझे इस सेवा के बारे में पता चला, उसी दौरान मैंने आईएएस बनने का मानस बना लिया था। परीक्षा के दौरान राजनीतिक विज्ञान और दर्शन शास्त्र मेरे मुख्य विष्ाय थे। विष्ाय चयन के बाद दिल्ली स्थित पतंजली संस्थान के धर्मेद्र सर ने मेरा मार्गदर्शन किया। उनकी दर्शन शास्त्र पर जबरदस्त पकड है। उनका पढाने का तरीका ही कुछ ऎसा है कि सारे कॉन्सेप्ट खुद ब खुद क्लीयर होते चले जाते हैं। उनका मार्गदर्शन मुझे नहीं मिला होता तो शायद मैं यहां तक नहीं पहुंच पाता।

मेरा जुनून : हार की सोच भी दिमाग में न आए
मैंने जिंदगी के हर मोड पर संघर्ष देखा है, लेकिन कभी परिस्थतियों से हार स्वीकार नहीं की। जब मां ने किराने की दुकान से हटा दिया, उसके बाद कई सालों तक मैंने बच्चों को टयूशन पढाया और खुद भी पढता रहा। इस दौरान न जाने कितने लोगों की उपेक्षा झेली और कितनी ही मुसीबतों का सामना किया। लोग मुझे पास बिठाना भी पसंद नहीं करते थे, क्योंकि मैं झुग्गी से था। लोग यह मानते हैं कि झुग्गियों से केवल अपराधी ही निकलते हैं। मेरी कोशिश ने यह साबित कर दिया कि झुग्गी से अफसर भी निकलते हैं। लोगों ने भले ही मुझे कमजोर माना लेकिन मैं खुद को बेस्ट मानता था। मेरा मानना है कि जब भी खुद पर संदेह हो तो अपने से नीचे वालों को देख लो, हिम्मत खुद ब खुद आ जाएगी। सही बात यह भी है कि यह मेरा पहला ही नहीं आखिरी प्रयास था। अगर मैं इस प्रयास में असफल हो जाता तो मेरे मां-बाबा के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मुझे दोबारा तैयारी करवाते।  
 
मेरी खुशी : बाबूजी का सम्मान
मेरी जिंदगी में सबसे बडा खुशी का पल वह था, जब हर दिन की तरह बाबा मजदूरी करके घर लौटे और उन्हें पता चला कि उनका बेटा आईएएस परीक्षा में पास हो गया है। मुझे फख्र है कि मुझे ऎसे मां-बाप मिले, जिन्होंने हमें कामयाबी दिलाने के लिया अपना सबकुछ होम कर दिया। मुझे आज यह बताते हुए फख्र हो रहा है कि मेरा पता ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप, झुग्गी नंबर 208 है। उस दिन जब टीवी चैनल वाले, पत्रकार बाबा की बाइट ले रहे थे तो उनकी आंसू भरी मुस्कुराहट के सामने मानों मेरी सारी तकलीफें और मेहनत बहुत बौनी हो गई थीं।
 
मेरा संदेश : विल पावर को कमजोर मत होने दो
मेरा मानना है कि एक कामयाब और एक निराश व्यक्ति में ज्ञान का फर्क नहीं होता, फर्क होता है तो सिर्फ इच्छाशक्ति का। हालात कितने ही बुरे हों, घनघोर गरीबी हो। बावजूद इसके आपकी विल पावर मजबूत हो, आप पर हर हाल में कामयाब होने की सनक सवार हो, तो दुनिया की कोई ताकत आपको सफल होने से रोक नहीं सकती। वैसे भी जब हम कठिन कार्यो को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं और उन्हें खुशी और उत्साह से करते हैं तो चमत्कार होते हैं। यूं तो हताशा-निराशा कभी मुझपर हावी नहीं हुई, लेकिन फिर भी कभी परेशान होता था तो नीरज की वो पंक्तियां मुझे हौसला देती हैं, 'मैं तूफानों में चलने का आदी हूं.. '

सीमेंट प्लांट की गर्म गैस से बनेगी बिजली, कारखाने में लगेगा कोजनरेशन बिजली संयत्र




सीमेंट प्लांट की गर्म गैस से बनेगी बिजली, कारखाने में लगेगा कोजनरेशन बिजली संयत्र


इसमें कोयले का इस्तेमाल नहीं होने से हर साल हजारों टन कार्बन गैसें वायुमंडल में जाने से बच सकेंगी। साथ ही गर्म गैसों से तो पर्यावरण बचेगा ही।

कोयला नहीं लगने से लागत चार पांच साल में वसूल हो जाएगी। उसके बाद कारखाने को १९.५ मेगावाट बिजली लगभग निःशुल्क मिल सकेगी।

१९.५ मेगावाट बिजली के लिए हर माह पांच हजार टन कोयले की जरूरत होती है।

म.प्र. का एक सीमेंट प्लांट अपने यहां उत्पन्न होने वाली गर्म गैस से बिजली बनाएगा। इसके लिए वहां दो संयंत्र लगाए जा रहे हैं जिनसे कुल १९.५ मेगावाट बिजली पैदा की जाएगी। ऐसा करने वाला सतना सीमेंट प्रदेश का पहला कारखाना बन जाएगा।

सतना सीमेंट की दो इकाइयों में हर दिन हजारों टन गर्म गैसें पैदा होती हैं जिन्हें चिमनी के जरिये वातावरण में छोड़ा जाता है। मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सुझाव पर सीमेंट कंपनी ने दोनों इकाइयों (सतना सीमेंट और बिड़ला विकास सीमेंट) में पैदा होने वाली गर्म गैसों से बिजली बनाने का फैसला लिया।
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Wednesday, May 26, 2010

आईआईटी में भोपाल का डंका

भोपाल. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान की संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई)-2010 का परिणाम मंगलवार देर रात घोषित हुआ। इसमें भोपाल के राज द्विवेदी ने देशभर में 10वां स्थान हासिल किया है। इतना ही नहीं राज कानपुर परिक्षेत्र के टॉपर भी हैं। वहीं आईआईटी में देशभर में चेन्नई रीजन के अनुमूला जितेंद्र रेड्डी ने टॉप किया है।

गौरतलब है कि सीबीएसई बारहवीं में भी राज ने 95.8 फीसदी अंक हासिल कर शहर में तीसरा स्थान हासिल किया है। राज के पिता सभाकांत द्विवेदी शासकीय वाणिज्य एवं विज्ञान महाविद्यालय, बेनजीर में गणित के प्रोफेसर हैं। भोपाल के ही पवन नागवानी 72वीं रैंक हासिल करने में सफल रहे। 140वां स्थान भोपाल के रोहन पिल्लई और 217वां स्थान कार्तिकेय शर्मा ने हासिल किया है।

भोपाल से लगभग 150 सिलेक्शन हुए हैं।

जेईई में 4 लाख 55 हजार 571 छात्र शामिल हुए थे। इनमें से 13 हजार 104 परीक्षार्थी सफल घोषित हुए। इनमें 1 हजार 467 लड़कियां शामिल हैं। 27 मई से 12 जून तक ऑनलाइन काउंसिलिंग द्वारा आईआईटी में एडमिशन मिलेंगे।


टिप्स: दो साल के लिए मनोरंजन से थोड़ा दूर रहें। हर टॉपिक को पढ़ें, किसी टॉपिक को कमतर न समझें। सवाल का हल न आने पर तुरंत शिक्षकों से संपर्क कर उसका हल जानें।

'2010' रहा टॉपर

2005 80
2006 100
2007 125
2008 125
2009 110
2010 150

सुपर-30 के सभी 30 ने फिर मारी आईआईटी में बाजी


पटना।। प्रतिभाशाली गरीब बच्चों को फ्री में आईआईटी-जेईई की तैयारी कराने वाले कोचिंग सेंटर सुपर-30 के सभ
ी 30 स्टूडेंट्स इस बार भी सफल रहे हैं। ऐसा लगातार तीसरी बार हुआ है कि कोचिंग सेंटर के सभी 30 बच्चों ने आईईटी के एंट्रेस एग्जाम में बाजी मारी है।

सुपर 30 के संस्थापक आनंद ने बुधवार को बताया कि एक बार फिर उनकी संस्था के सभी 30 छात्र आईआईटी-जेईई की परीक्षा में सफल रहे हैं। उन्होंने बताया कि सन् 2002 में स्थापना के बाद से लेकर अब तक उनकी संस्था के कुल 212 बच्चे इंजीनियरिंग एंट्रेस टेस्ट में सफल हुए हैं। सुपर 30 के इन छात्रों की खासियत यह है कि वे सभी गरीब परिवार से ताल्लुक रखते हैं जो किसी भी हालत में फुल टाइम कोचिंग का बोझ नहीं उठा सकते थे।

 

 

 

 


आनंद ने बताया कि वे अब इन बच्चों के आईआईटी में एडमिशन और आगे की शिक्षा जारी रखने के लिए उनके वास्ते एजुकेशन लोन की व्यवस्था करने का प्रयास करेंगे। आनंद आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण खुद कैम्ब्रिज में पढ़ने का मौका गवां खो चुके हैं। वह अपने सुपर 30 के बच्चों को पूरी स्कॉलरशिप देते हैं जिसमें रहना, खाना और यात्रा करना सब कुछ शामिल है।

आईआईटी-जेईई में पास हुए बच्चों में से एक नालंदा जिला निवासी शुभम कुमार है जिसके पिता एक गरीब किसान हैं और उनकी मासिक आय मात्र 2500 रुपये है। उन्होंने कहा कि अगर आनंद जी ने मदद नहीं की होती तो उनका बच्चा इस कॉम्पटिशन में सफल नहीं हो पाता।
 
 
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हर साल देश के 30 होनहार स्टूडेंट्स को आईआईटी कैंपस पहुंचाने वाले सुपर-30 को टाइम मैगजीन ने बेस्
ट ऑफ एशिया 2010 में जगह दी है। टाइम मैगजीन ने कहा कि सुपर 30 का पास होने का रेट 100 पर्सेंट है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें समाज के सबसे गरीब तबके के ऐसे स्टूडेंट्स को जगह मिलती है, जो ऐसी फुलटाइम कोचिंग लेने में समर्थ नहीं होते।
टाइम मैगजीन में आने की उपलब्धि पर सुपर-30 के संस्थापक आनंद कुमार बेहद खुश हैं। वह कहते हैं कि यह खुशी का मौका है, क्योंकि सुपर-30 इस बात का उदाहरण बन गया है कि मानव क्षमता के बल पर क्या हासिल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि गरीबी और सामाजिक शोषण से निजात पाने के लिए शिक्षा ही एकमात्र हथियार है।

आनंद कुमार के इस कोचिंग सेंटर में एंट्रेंस के लिए स्टूडेंट्स को एंट्रेंस देना होता है। साथ ही, यह वचन भी देना होता है कि वे दिन में कम से कम 16 घंटे पढ़ाई करेंगे। साल 2003 से इस सेंटर के 210 में से 182 छात्रों ने आईआईटी एंट्रेंस टेस्ट में कामयाबी हासिल की है। इस सेंटर के संस्थापक आनंद कुमार पैसों की कमी की वजह से कैंब्रिज में पढ़ाई से चूक गए थे। वह अपनी कोचिंग में सभी छात्रों की स्कॉलरशिप, कमरे और आने-जाने का खर्च उठाते हैं।

सुपर-30 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी सराहा है। गांवों के प्रतिभाशाली बच्चों के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू करने के वास्ते मनमोहन सिंह इसी साल फरवरी में आनंद कुमार से मिले थे।